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किसान बाजार बनाम कसाई बाजार

Tue, 06 Jun 2017 06:13 PM IST
मेनका गांधी
मेनका गांधी Updated Tue, 06 Jun 2017 06:13 PM IST
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Farmer's Market vs Butcherier Market
मेनका गांधी

पशु बाजार को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने नियम जारी किए थे। नियमों को बिना पढ़े और ठीक से समझे हुए केरल में केंद्र सरकार के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई। वहां कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से एक बछड़े को मारकर उसके मांस का वितरण किया। यह घटना विकृत मानसिकता को प्रदर्शित करती है। केरल में कोई पशु बाजार नहीं है, सो यह भगवान ही जानता है कि वे लोग किस बात से इतना खफा थे। केरल ही ऐसी जगह है, जहां बिना किसी कारण के कुत्तों, गाय, महिलाओं, बच्चों और दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मार दिया जाता है। 

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पश्चिम बंगाल में इससे थोड़ा कम शोर-शराबा हुआ है और तमिलनाडु में मामूली विरोध दर्ज किया गया। ऐसा इसलिए, क्योंकि इन जगहों में अवैध पशु बाजार का संचालन होता है और वहां से गर्भवती, बीमार और कमजोर पशुओं को केरल भेजा जाता है। 
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मगर नए नियमों से देश के बाकी हिस्सों में राहत की सांस ली गई। मैं यह स्पष्ट करूंगी कि आखिर ये नियम लंबे समय से क्यों जरूरी थे। दिवंगत पर्यावरण मंत्री अनिल दवे यदि अपनी कुछ विरासत छोड़ गए हैं, तो वह यही नियम हैं। 
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विभाजन के बाद सरकार ने अपने किसानों को भिन्नतरह से मदद करने की कोशिश की थी। इसी के तहत सरकारी जमीन पर छोटे-छोटे ग्रामीण बाजार स्थापित किए गए, ताकि किसान पशुओं की खरीद-बिक्री कर सकें। ये बाजार बहुत स्थानीय किस्म के थे, जिनमें कोई ग्रामीण एक यो दो पशु लेकर आता और पड़ोस के किसी अन्य गांव का कोई और किसान उन्हें खरीद लेता। कीमतें कम होती थीं, थोड़ा मोलभाव होता था, मगर आखिर में हर कोई खुश होता था। बाजार में पशुओं के लिए पानी के नाद होते थे और पेड़ों की छाया होती थी। हफ्ते के बाकी दिन उन्हीं जगहों पर सब्जियों, बर्तनों और कपड़ों का व्यापार होता था। ये शांतिपूर्ण जगहें हुआ करती थीं। 

वर्षों बाद ये जगहें हिंसा का केंद्र बन गईं। पहली बात कि बाजार सरकारी जगहों के बजाए निजी लोगों की जमीन पर लगने लगे, जिसका वे किराया वसूलने लगे। ये बाजार किसानों के लिए नहीं रह गए। अब वहां न पेड़ों की छाया रही और न ही पशुओं के लिए नाद। अब ऐसी जगहों पर पशुओं को घसीटकर लाया जाता है और घंटों उन्हें धूप में रखा जाता है। इसका नियंत्रण खरीद-फरोख्त करने वाले माफिया के हाथों में होता है और इस कारोबार से पुलिस भी अवैध तरीके से हफ्ता वसूलती है। 

यहां लाई जाने वाली गायों और भैंसों को मारने के लिए की जाने वाली खरीद-फरोख्त पर नियम रोक लगाता है। भारत में आज एक भी पशु नहीं बचा है, जो 16 वर्ष का हो, जोकि काटे जाने के लिए की जाने वाली खरीदी-बिक्री की वैध उम्र है। इसलिए ये अब 'किसान' बाजार नहीं रहे, बल्कि कसाई बाजार हो गए हैं। कानून कहता है कि सिर्फ किसान ही पशुओं की खरीदी-बिक्री कर सकता है। मगर वहां आसपास एक किसान तक नजर नहीं आएगा। पशुओं के छोटे व्यापारी कसाइयों को पशु बेचते हैं। कानून कहता है कि किसी व्यक्ति को दो से अधिक पशु नहीं बेचे जा सकते। अभी तो व्यापारी एक खरीदार को सौ-सौ पशु बेच डालते हैं, भले ही उसके पास एक एकड़ जमीन भी न हो। वह सौ पशुओं का क्या करेगा यह सबको पता है।

कानून कहता है कि ग्रामीण बाजारों के पास एक भी ट्रक नहीं आना चाहिए, क्योंकि इसके पीछे यही विचार है कि ये स्थानीय बाजार हैं। मगर ऐसे हर पशु बाजारों को ट्रक तक घेरे रहते हैं और उनमें बर्बरता के साथ ठूंस-ठूंसकर पशुओं को रखा जाता है। जहां स्थानीय प्रशासन कुछ कड़ाई करता दिखता है, वहां बाजार से आधा किलोमीटर दूर तक ट्रक खड़े किए जाते हैं। कसाईखाने स्थानीय नहीं हैं। वे कई जिलों की दूरी पर और कई बार दूसरे राज्यों में हैं। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के कसाई राजस्थान जाते हैं, तो बिहार के कसाई हरियाणा।

इन बाजारों में पूरी तरह से माफिया का नियंत्रण है और जिला प्रशासन वहां से आंखें मूंदे रहता है, या फिर फतेहाबाद की तरह इस बर्बरता का हिस्सा बन जाता है। अब यह साप्ताहिक मामला नहीं रह गया, बल्कि अब तो यह स्थायी बाजार बन गए हैं, जैसा कि बरेली के नवाबगंज में है। 

इन बाजारों के इस पतन की वजह यह है कि अब ऐसे जानवर बचे नहीं, जिन्हें किसान खरीद सकें। कसाइयों ने बेतहाशा दाम बढ़ा दिए हैं और कोई सच्चा किसान जो खेती के लिए पशु खरीदना चाहता है, वह इसकी कीमत ही वहन नहीं कर सकता। इसीलिए छोटे किसान कंगाल होते जा रहे हैं, क्योंकि वे अपनी छोटे जोत में मशीनीकृत खेती वहन नहीं कर सकते। 

नया नियम कहता है कि जिला प्रशासन, पशु चिकित्सक, वन अधिकारी, एसपी, एसपीसीए (सोसाइटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स), तहसीलदार, दो पशु कल्याण संगठन और चार अन्य लोग मिलकर बाजार समिति का गठन करेंगे। यह समिति सुनिश्चित करेगी कि पशुओं के लिए छाया, पानी, भोजन और छोटे तथा गर्भवती पशुओं के लिए अलग बाड़े हों और सफाई की व्यवस्था हो। बाजार में नियत संख्या से अधिक पशु न हों। व्यापारी और खरीदार व्यापार के लिए आवेदन भरेंगे, जिसे निरस्त भी किया जा सकता है। प्रत्येक बाजार में वेटेनरी इंस्पेक्टर होगा और प्रत्येक पशु की जांच की जाएगी ताकि उसकी उम्र और यदि उसे कोई बीमारी हो तो उसका पता चल सके।

न तो किसी पशु की सींग काटी जाएगी और न ही किसी पशु के थनों को सील किया जाएगा। किसी भी पशु को ऑक्सीटॉसिन जैसे इंजेक्शन नहीं लगाए जाएंगे। खरीदी-बिक्री के रिकॉर्ड इस हलफनामे के साथ रखे जाएंगे कि पशु का उपयोग खेतिहर कार्य के लिए होगा। 


इस नियम में आखिर आपत्तिजनक क्या है? कसाई मारने के लिए पशुओं की खरीद अब भी कर सकते हैं, इसके लिए वे किसान बाजार का उपयोग नहीं कर सकते। यह एक अच्छा नियम है, मैं पर्यावरण मंत्रालय को इसके लिए बधाई देती हूं। किसान पिछले बीस वर्षों से ऐसे नियम की मांग कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। आखिर उनके मंत्रियों के कसाईखाने हैं, और इसका विरोध भी कांग्रेसी वकील ने ही किया है। 

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