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मुद्दों पर हावी होते चेहरे

Tue, 07 Mar 2017 07:36 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Tue, 07 Mar 2017 07:36 PM IST
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Faces dominate over issues
नीरजा चौधरी

अब हमारे देश में चुनाव तेजी से नेता पर आधारित होते जा रहे हैं और इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जैसे बनते जा रहे हैं। लोग पार्टी के बजाय चेहरा देखकर मतदान करते हैं। उत्तर प्रदेश का यह चुनाव भी इससे अलग नहीं है। चूंकि नरेंद्र मोदी और अखिलेश यादव, दोनों जनता के बीच काफी लोकप्रिय हैं और खुद को लोगों के साथ बेहतर ढंग से जोड़ पाते हैं, इसलिए यह चुनाव प्रधानमंत्री बनाम मुख्यमंत्री का चुनाव बन गया।

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लोगों में नेता के साथ तादात्म की ऐसी प्रवृत्ति थी कि जब वे भाजपा के प्रति समर्थन जताते, तो पार्टी का नाम लेने के बजाय कहते कि हम मोदी को वोट दे रहे हैं। यानी नरेंद्र मोदी भाजपा के पर्याय बन गए हैं और उनकी छवि पार्टी से भी बड़ी हो गई है। कई लोगों के मुताबिक, भाजपा उत्तर प्रदेश में दौड़ में नहीं हो सकती थी, लेकिन मोदी के कारण वह दौड़ में है। वह न केवल हर निर्वाचन क्षेत्र में लड़ाई में शामिल है, बल्कि प्रचार के अंत होते-होते वह दूसरों से आगे दिखती है।
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जहां तक अखिलेश यादव की बात है, तो सपा को पांच साल के सत्ता विरोधी आक्रोश का सामना करना पड़ रहा होता। पर इसके बजाय प्रधानमंत्री ने अपने मुख्य विरोधी के रूप में अखिलेश यादव और सपा-कांग्रेस गठबंधन पर हमला किया। इसलिए अखिलेश मायावती के बजाय प्रधानमंत्री पर ज्यादा हमलावर हुए। लखनऊ के एक ब्राह्मण टैक्सी चालक ने बताया कि मुख्यमंत्री अखिलेश ने पारिवारिक झगड़े के जरिये अपनी पार्टी को 'नयापन' दिया और इस प्रक्रिया में उन्होंने दिखाया कि वह अपने पिता मुलायम सिंह यादव की छाया से बाहर निकल सकते हैं। अच्छी बात यह है कि पिछले ढाई वर्षों में उन्होंने विभिन्न परियोजनाओं का काम हाथ में लिया और उन्हें पूरा करके दिखाया। लोग अपनी आंखों से देख और अनुभव कर सकते हैं कि उनके द्वारा शुरू की गई विभिन्न हेल्पलाइन काम कर रही हैं। इस तरह उन्होंने काम करने वाले नेता के रूप में अपनी छवि बनाई।
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और मोदी की तरह उन्होंने कुशलतापूर्वक अपने काम को भुनाया, यही कारण है कि आज सब यह स्वीकार करते हैं कि 'भैया ने काम तो किया है।' इसलिए वह पूर्वांचल में एक के बाद एक रैली करते चले गए। इस चुनाव में उन्होंने 230 रैलियां कीं। चंदौली, मिर्जापुर और सोनभद्र जिलों में मैंने उनकी रैलियां देखीं-स्पष्ट रूप से उन्हें देखने, सुनने, हाथ लहराकर उनका स्वागत करने, उनसे हाथ मिलाने के लिए लोग झुंड बनाकर आए। और यह वैसे लोगों की भीड़ नहीं थी, जो कभी-कभी पांच साल सत्ता में बैठे लोगों को देखने भर के लिए आते हैं। वे पूरे उत्साह के साथ उनकी पंचलाइन पर प्रतिक्रिया जता रहे थे।

यह उनका चेहरा ही था, जिसे उन्होंने पिछले तीस महीनों में गढ़ा और उसका उपयोग करते हुए उन्होंने जिन क्षेत्रों में सपा के उम्मीदवार कमजोर थे, वहां लोगों से अपील की कि आप प्रत्याशी को भूल जाइए और अखिलेश के लिए वोट कीजिए। और यह उनका चेहरा ही था, जिसकी वजह से लोग कह रहे थे कि हम अपने प्रत्याशी को पसंद नहीं करते, पर अखिलेश यादव को सुनने के बाद हम अपना विचार बदलने के बारे में सोच रहे हैं। इस चुनाव में अखिलेश की सबसे बड़ी समस्या अपने विधायकों के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान थी। जाहिर तौर पर वह उनमें से 150 से ज्यादा को बदलना चाहते थे, पर चुनाव पूर्व घटनाओं के कारण इसके लिए उन्हें समय नहीं मिला।

 यही समस्या नरेंद्र मोदी के साथ थी। भाजपा ने प्रधानमंत्री को प्रचार के लिए तैनात कर दिया, जिन्होंने वाराणसी में तीन दिन बिताए, जबकि यह है तो आखिर एक राज्य का चुनाव ही। उन्होंने काशी में अखिलेश-राहुल गांधी और डिंपल यादव के रोड-शो के प्रभाव को खत्म करने के लिए दो रोड-शो किए और छोटी-छोटी बैठकें कीं। और उन्होंने भाजपा में टिकट काटने से उपजे विद्रोह को सुलझाने की कोशिश भी की, जिसमें वाराणसी दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के सात बार के विधायक के टिकट कटने से भारी नाराजगी थी। प्रधानमंत्री स्वयं यादवों का समर्थन पाने और यादवों को सपा से अलग करने के लिए वाराणसी के निकट यादव मठ गए, जैसा कि उन्होंने 2014 में भी किया था।

इसी कारण मुलायम सिंह सपा के लिए जौनपुर जिले में अखिलेश के पक्ष में प्रचार करने के लिए विवश हुए और मोदी पर हमला करते हुए तीखे शब्दों (ठग) का प्रयोग किया। मुलायम सिंह ने यादव प्रत्याशी का प्रचार करते हुए पूरे समुदाय को संदेश दिया कि वह सपा के साथ जुड़े रहें।

इस चुनावी संघर्ष की तीसरी स्तंभ मायावती ने केमिस्ट्री के बजाय राजनीतिक गणित का ज्यादा प्रतिनिधित्व किया। वह एक मान्य चेहरा हैं और अपने समर्थकों का उन्हें गुप्त समर्थन प्राप्त है। दलितों के लिए बसपा अकेला स्वर्ग है, खासकर जाटव समुदाय के लिए, जिससे वह ताल्लुक रखती हैं। फैजाबाद में खेत में काम करने वाली दलित महिलाओं ने बताया, अतीत में भी यही उनका जीवन था और भविष्य में यही उनका जीवन रहेगा, मायावती हो या नहीं हो, वे सिर्फ बसपा को ही वोट देंगी, क्योंकि यह उनकी पार्टी है। जो दलित 2014 में मायावती का साथ छोड़ गए थे, इस बार लगता है कि वे उनके साथ हैं।


दूसरे राज्यों में भी कहानी अलग नहीं है। पंजाब में जब कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह पर दांव लगाया, तभी पार्टी में गति आई। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली के वोटरों ने भरोसा जताया था। उसी तरह पंजाब में भी युवा, गरीब और दलित तबके के लोग उनके साथ हैं। अगला चुनाव दिसंबर में गुजरात में होने वाला है, जो गृह प्रदेश होने के कारण प्रधानमंत्री के लिए अहम है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत प्रधानमंत्री को अजेय बना देगी और वह एक बार फिर पार्टी के प्रमुख प्रचारक बन सकते हैं। गुजरात में कांग्रेस के पास कोई वैसा चेहरा नहीं है, जो जीत दिला दे। जो सवाल राजनीतिक हलकों में किया जा रहा है, वह यह कि यदि केजरीवाल पंजाब में जीत जाते हैं, तो क्या वह गुजरात में वैकल्पिक चेहरा बनेंगे? उन्होंने पहले ही अपनी पैदल सेना को राज्य में जमीन तैयार करने दिया है। यानी आने वाले समय में चुनाव में चेहरे हावी रहेंगे।

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