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चिंता : मानवीय प्राथमिकताओं के लिए न दी जाए पर्यावरण की बलि, जलवायु परिवर्तन से गहराया संकट

Mon, 08 May 2023 06:05 AM IST
Vir Singh वीर सिंह
Updated Mon, 08 May 2023 06:05 AM IST
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सार

मार्च में देश के 13 राज्यों और एक केंद्र-शासित प्रदेश में गर्म हवाओं के थपेड़ों का अनुभव हुआ। पर मई के आगमन के साथ वर्षा की ऐसी झड़ी लगी, जैसे मानसून में लगती है। बढ़ती मोटरकारों की संख्या, सड़कों का जाल, इंफ्रास्ट्रक्चर, नगरीकरण, पर्यटन आदि विश्व की प्राथमिकताएं हैं, जो पर्यावरण की बलि लेकर पनपती हैं।

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Environment should not be sacrificed for human priorities, crisis deepens due to climate change
बढ़ती मोटरकारों की संख्या (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

हर वर्ष मौसम और जलवायु नए-नए रंग दिखा रहे हैं। फरवरी अप्रत्याशित रूप से गर्म रही और विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र के अध्ययन के अनुसार, मार्च में देश के 13 राज्यों और एक केंद्र-शासित प्रदेश में गर्म हवाओं के थपेड़ों का अनुभव हुआ। लेकिन मई के आगमन के साथ वर्षा की ऐसी झड़ी लगी, जैसे मानसून में लगती है। चार मई को तो दिल्ली का न्यूनतम तापमान अप्रत्याशित रूप से 15.8 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया। अब आने वाले महीनों में जलवायु जल, वायु और रक्त में उबाल लाने के लिए तत्पर है।



विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) ने विगत दिनों एक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2022 में ग्रह का औसतन तापमान 1850-1900 के बीच की अवधि (पूर्व-औद्योगिक काल) की तुलना में 1.15 डिग्री सेल्सियस अधिक था। डब्लूएमओ का यह भी कहना है कि 2015 से 2022 के आठ वर्ष 1850 के बाद से सबसे गर्म थे, और ऐसा ला नीना के निरंतर तीन वर्ष तक घटते रहने के उपरांत हुआ, जिसके कारण वैश्विक तापमान कम होने की आशा थी। अब हम ला नीना के विपरीत चरण अल नीनो की ओर अग्रसर हैं, जिसके कारण वैश्विक तापमान बढ़ने के योग बनते हैं।


जलवायु परिवर्तन कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है। पर्यावरण के सभी घटकों का अबाध गति से होता प्रदूषण, अत्याधिक कार्बन उत्सर्जन, और धरती की हरियाली के तेजी से सिमटने के कारण पृथ्वी पर पारिस्थितिक विघटन के उभरते दृश्यों में हैं जलवायु परिवर्तन की जड़ें। ग्रह के सभी मानव, हस्तक्षेप से सुरक्षित प्राकृतिक पारिस्थितिक परिवेश जीवों की विविधता से लकदक हैं। इन परिवेशों में पारस्परिकता और सामंजस्य के साथ पारिस्थितिक संतुलन स्थापित करते पेड़-पौधों, जंतुओं, और सूक्ष्म जीवों की जीवन-भरी अनुगूंज जीवन के एक सत्य से साक्षात्कार कराती है, जिसे पारिस्थितिक अखंडता कहते हैं।

पारिस्थितिक अखंडता सार्वभौमिक नैसर्गिक विकास का एक लक्ष्य है,  जिससे धरती पर जीवन और जीवन प्रक्रियाओं की अक्षुण्णता सुनिश्चित रहती है। इस ब्रह्मांड में विकास से कुछ भी अछूता रहे, ऐसा असंभव है। एक व्यक्ति, संपूर्ण जीवन और ब्रह्मांड का विकास अपनी गति, अपनी लय से चलता है। पारिस्थितिक चरमोत्कर्ष के माध्यम से विकास पारिस्थितिक संतुलन स्थापित करते हुए पारिस्थितिक अखंडता की स्थिति सृजित करता है। पारिस्थितिक अखंडता पृथ्वी के जैवमंडल का सार है। जैवमंडल के विघटन के साथ हम पृथ्वी पर सतत रूप से जीवन के फूलने-फलने की कल्पना नहीं कर सकते। निरंतर पारिस्थितिकीय विघटन के फलस्वरूप उपजा जलवायु परिवर्तन मानव जगत के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है।

भारतीय सभ्यता की जड़ें अरण्य संस्कृति में हैं। इसलिए अतीत में पारिस्थितिक अखंडता की समस्या का कोई प्रश्न ही नहीं था। अब हमारी सभ्यता उस सामाजिक-आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में भागीदार है, जो प्राकृतिक संसाधनों के अकूत दोहन पर निर्भर करती है, जिससे पारिस्थितिक विघटन होता है और जो वायुमंडल, जलमंडल और भूमंडल के रासायनिक संविधान को बदल डालता है। यदि हम अपनी जीवन-शैली का विश्लेषण करें, तो निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमारी नैतिकता पतन के कगार पर है। यह एक विकट वैश्विक समस्या है, जो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने वाले सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ विकटतम होती जाती है। 

अतीत में भी मौसमों ने बहुत कहर ढाए हैं, लेकिन हम जलवायु प्रणाली के शिकार कदाचित ही हुए होंगे। अतीत में हम और पृथ्वी के सभी जीव जीवन-अनुकूल जलवायु में फलते-फूलते और अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों का विकास करते रहे हैं। लेकिन अब हम बारंबार जलवायु प्रणाली का अनवरत शिकार होने को बाध्य हैं, क्योंकि जैवमंडल का ऊर्जा बजट प्रतिकूल हो गया है। पृथ्वी का बढ़ता तापमान जलवायु प्रणाली को उग्र कर रहा है, और संपूर्ण जीव जगत को अधिकाधिक तनाव ग्रस्त करने की ओर अग्रसर है। 

पृथ्वी का औसतन ताप 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है और आशंका है कि 2035 में यह बढ़कर 1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगा। कितने भी प्रयास कर लिए जाएं, सृष्टि के ताप को 1.5 डिग्री सेल्सियस के ऊपर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता। मूल कारण है ग्रह की पारिस्थितिक अखंडता का क्रमिक रूप से टूटना, जिसके मूल में है पर्यावरण नैतिकता का घोर संकट। विस्फोटक रूप से बढ़ती मोटरकारों की संख्या, सड़कों का जाल, इंफ्रास्ट्रक्चर, औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, पर्यटन, आर्थिक वृद्धि, जीडीपी आदि विश्व की प्राथमिकताएं हैं, जो पर्यावरण की बलि लेकर पनपती हैं। सत्य यह भी है कि मानव समझता है कि पर्यावरण उसके जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है, पर उसकी जीवन प्रणाली का यह अंतिम मुद्दा है। यही पर्यावरण नैतिकता का संकट है, और पारिस्थितिक अखंडता के क्रमशः टूटते जाने का मूल कारण भी। 

नैतिकता ही मनुष्य की जीवन कलाओं की आत्मा है, जिसके बल पर सभ्यताओं का उदय हुआ है और सभ्यताएं संस्कृतियों से अलंकृत हुई हैं। हमारे काल में पर्यावरण संकट के साथ नैतिकता का एक और आयाम जुड़ गया—पर्यावरण नैतिकता। हमारे पर्यावरण में जो भी कुछ है, वह केवल मानव प्रजाति तक सीमित नहीं है। पर्यावरण सभी जीवों (वनस्पतियों, जंतुओं और सूक्ष्म जीवों) तथा उन भौतिक तत्वों के तालमेल से बना है, जिनसे सभी जीव जीवन पाते हैं, और अपने स्वाभाविक गुणों का विकास करते हैं। मानव जाति के समग्र अस्तित्व और कल्याण के लिए पर्यावरण और उसमें व्याप्त सभी जीवों का अस्तित्व और कल्याण भी महत्वपूर्ण और अपरिहार्य है। यही पर्यावरणीय नैतिकता है। 

पर्यावरण नैतिकता पर्यावरण दर्शन का एक पहलू है, जो हमें पर्यावरण की महत्ता समझाने, मानव का व्यवहार सभी जीवों के प्रति हितकारी बनाने, और पर्यावरण संरक्षण के प्रति गहरा बोध विकसित करने के लिए अनिवार्य है। पर्यावरण नैतिकता पारिस्थितिक अखंडता का मार्ग प्रशस्त करती है।

पारिस्थितिक आपदा और उससे पोषित जलवायु परिवर्तन के कालचक्र में फंसी दुनिया पर्यावरण नैतिकता की अलख जगाकर अपने लिए आशाओं से भरे सुनहरे भविष्य के पुनर्निर्माण की नींव रख सकती है।

  -प्रोफेसर एमेरिटस, पर्यावरण विज्ञान, जी बी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय।

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