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पर्यावरण: हिमालय ने अपनी चुप्पी तोड़ दी है... बढ़ते जलवायु संकट को उजागर कर रहीं आपदाएं

Sat, 30 Aug 2025 06:50 AM IST
Seema Javed सीमा जावेद
Updated Sat, 30 Aug 2025 06:50 AM IST
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सार
धराली और किश्तवाड़ जैसी आपदाएं दुनिया की सबसे युवा पर्वत शृंखला को प्रभावित करने वाले बढ़ते जलवायु संकट को उजागर करती हैं।
 
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Environment Issues The Himalayas have broken their silence disasters are exposing the growing climate crisis
धराली में सर्च अभियान (फाइल) - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

सदियों से मौन खड़े हिमालय ने अब अपनी चुप्पी तोड़ दी और इसकी कीमत हमारी परिकल्पना से परे है। नाजुक पारिस्थितिक तंत्र वाले हिमालयी क्षेत्र में अगस्त में अचानक एक के बाद एक भारी बारिश, बादल फटने, भू-स्खलनों से हुई तबाही के विनाशकारी मंजर आए दिन सामने आ रहे हैं। पांच अगस्त को एक गगनचुंबी जलधारा उत्तराखंड के धराली की गलियों में उतर गई और जो भी उसके सामने आया, उसे बहा ले गई।



अभी इस मुसीबत से उबर भी नहीं पाए थे कि अचानक किश्तवाड़, कश्मीर (14 अगस्त) में  भीषण बादल फटने से अचानक आई बाढ़ में अनेक लोग मारे गए और लापता हुए। तीर्थयात्रा मार्ग पर भारी तबाही हुई। फिर कठुआ जिले में बॉर्डर से सटे इलाके में तीन जगह बादल फटे और जमीन कांपने लगी। जोद घाटी इलाके में भू-स्खलन के बाद शहर से संपर्क टूट गया। हिमाचल प्रदेश में मानसून की बारिश से तबाही थम नहीं रही है। ये घटनाएं दुनिया की सबसे युवा पर्वत शृंखला को प्रभावित करने वाले बढ़ते जलवायु संकट को उजागर करती हैं।


वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि तेजी से बदलते मौसम के मिजाज, गर्म होते महासागर और अनियंत्रित विकास जोखिम को बढ़ा रहे हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने एशिया में जलवायु की स्थिति रिपोर्ट जारी की, जिसमें बताया गया कि 2024 में एशिया वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहा है। एशिया का 2024 का तापमान 1991-2020 के औसत से 1.04 डिग्री सेल्सियस अधिक था, तथा 1961-1990 के बाद से तापमान वृद्धि की दर दोगुनी हो गई है।

वातावरण से गर्मी सोखकर समुद्री लहरों के गर्म होने से हिंद महासागर तेजी से गर्म हो रहा है, और इससे गंभीर चिंताएं पैदा हो रही हैं। जलवायु मॉडल 2020 से 2100 तक 1.7 से 3.8 डिग्री सेल्सियस प्रति शताब्दी की दर से और अधिक तेजी से गर्म होने का अनुमान लगाते हैं। इस गर्माहट के चलते वाष्पीकरण तीव्र हो रहा है और वातावरण में नमी बढ़ रही है। नमी के बढ़ने से मानसून का पैटर्न बदल रहा है।

असामान्य तापमान के कारण वायुमंडल में नमी बढ़ जाती है, जिसके कारण हिमालय में बादल फटने या इसी तरह की अन्य घटनाएं अधिक तीव्र और लगातार हो रही हैं। तापमान में हर डिग्री की वृद्धि से हवा में नमी धारण करने की क्षमता सात फीसदी बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन हिमालय में मानसून के पैटर्न को नया रूप दे रहा है। मध्य पूर्व की गर्म होती जलवायु दक्षिण-पश्चिमी हवाओं को उत्तर की ओर मोड़ रही है, जिससे पहाड़ों में अधिक नमी आ रही है। इससे बादल फटने की घटनाएं तेज हो रही हैं, क्योंकि पहाड़ नम हवा को ऊपर धकेल रहे हैं और विशाल संवहनीय बादल बना रहे हैं।

हमारे चूल्हों से उठता धुआं, खेतों में जलाई जा रही पराली, और गाड़ियों से निकलता धुआं, यानी 'ब्लैक कार्बन हिमालय को तेजी से खा रहा है और इसके ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं—हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियर 14.9-15.1 मीटर प्रति वर्ष पीछे हट रहे हैं, जिससे अस्थिर झीलें और भू-स्खलन का खतरा बढ़ रहा है। अकेले उच्च पर्वतीय एशिया (1999-2018) में ग्लेशियर से संबंधित 127 बड़े भू-स्खलन दर्ज किए गए। तेजी से ग्लेशियर पिघलने से पर्वतीय ढलान अस्थिर हो रहे हैं और हिमनद झीलें भर रही हैं। इसके अलावा, जनसंख्या में तीव्र वृद्धि ने भी हिमालय के संसाधनों पर दबाव डाला है।

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