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एक मिथक के बहाने: क्या हाथियों के भी कब्रिस्तान होते हैं, बंगाल में मिले अवशेषों से शोधकर्ता भी असमंजस में

Sun, 24 Mar 2024 07:47 AM IST
गुलाम अहमद लूसी ए बेट्स/लियाने प्रूप्स
लूसी ए बेट्स/लियाने प्रूप्स Published by: गुलाम अहमद Updated Sun, 24 Mar 2024 07:47 AM IST
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सार
हाथियों को अपने मृत बच्चों के शरीर को ले जाते देखा गया है। जब वे किसी अन्य हाथी के या फिर किसी अन्य प्रजाति के शव के पास से गुजरते हैं, तो उनका व्यवहार अक्सर बदल जाता है।
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Elephant calves have been found buried in West Bengal, Do they have cemeteries
हाथी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

क्या हाथियों के भी कब्रिस्तान होते हैं? विश्व की कुछ संस्कृतियों में ऐसे लोकप्रिय मिथक जरूर मिलते हैं, लेकिन इनके प्रमाण अब तक नहीं मिले थे। लेकिन हाल ही में एशियाई हाथियों की एक कब्रगाह के पुरावशेषों ने पुरानी बहस को फिर जन्म दिया है कि क्या हाथियों को भी दफनाया जाता था? जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा में प्रकाशित शोध में दो वैज्ञानिकों ने इससे जुड़े पांच उदाहरणों का जिक्र किया है। भारत में बंगाल का वह क्षेत्र, जहां चाय के बागान मिलते हैं, वहां काफी गहराई में छोटे हाथियों की एक कब्र मिली है।


खास बात है कि यहां मिले अवशेषों में हाथी के चारों पैर ऊपर की ओर हैं। यह देखकर शोधकर्ता भी असमंजस में हैं। हालांकि उनका कहना है कि हाथियों की असामान्य स्थिति की कई वजहें हो सकती हैं। कई हाथियों के पैरों के आसपास की जमीन का संकुचित होना और मृत्यु के बाद घसीटे जाने का संकेत देती चोटें, सभी हाथियों को जान-बूझ कर दफनाने की प्रथाओं की ओर इशारा करती हैं। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या हाथियों के समुदाय में मृत्यु के बाद अपने साथी को दफनाने की व्यवस्था होती है। अगर यह सही है कि जानवरों में भी मृत्यु और दुख की समझ होती है, तो इसका मतलब तो यही है कि मनुष्य उतना भी अनूठा नहीं, जितना उसे अमूमन समझा जाता है।


पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि हमारे होमिनिड पूर्वज कम से कम एक लाख साल या शायद इससे भी ज्यादा समय से मृतकों को दफनाते रहे हैं। कालांतर में कुछ संस्कृतियों में शवों को जलाने का उपक्रम शुरू किया गया। हालांकि शवों को प्रकृति में विलीन करना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इस प्रक्रिया के जरिये उस वक्त के लोगों के दिमाग में क्या चलता होगा या उनकी भावनाएं कैसी होती होंगी, यह अनुमान लगाना महत्वपूर्ण है। हमारे पूर्वजों के लिए दफनाना केवल शवों का निपटान नहीं था, बल्कि अपने दुख की अभिव्यक्ति और जो गुजर चुके हैं, उनके प्रति सम्मान भी था। विभिन्न संस्कृतियों में मरे हुए लोगों को याद रखने के तरीकों के रूप में लोग उनके अंतिम संस्कार में अपना समय और प्रयास लगाते हैं। जाहिर है कि दफनाना भी हमारी भावना और सहानुभूति का स्पष्ट संकेत है।

माना जाता है कि मृत्यु के उपरांत हमारी प्रतिक्रियाएं मानवता को दर्शाती हैं। लेकिन आज तक किसी पशु प्रजाति में मृत्यु को लेकर प्रतिक्रिया में ऐसा सामाजिक प्रतिनिधित्व नहीं दिखा है। लोक परंपराओं और सदियों से चले आ रहे किस्से-कहानियों को छोड़ दें, तो किसी भी पशु प्रजाति में अपने मृतकों को व्यवस्थित रूप से दफनाने के प्रमाण नहीं मिलते हैं।

क्या हाथी को जान-बूझ कर दफनाया गया
यह निष्कर्ष निकालना कि हाथियों के समुदाय में कभी अंत्येष्टि की रस्म होती होगी, जल्दबाजी होगा। विचार के स्तर पर यह भले ही दिलचस्प लगे, लेकिन व्यवहार में इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता। यह भी हो सकता है कि हाथियों का समूह कहीं जा रहा हो और हाथियों के कुछ बच्चे खाई में गिर गए हों। हालांकि हाथियों की भावनाओं के बारे में जो बातें हम जानते हैं, वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। हाथियों को अपने मृत बच्चों के शरीर को ले जाते देखा गया है। जब वे किसी अन्य हाथी या फिर किसी अन्य प्रजाति के शव के पास से गुजरते हैं, तो उनका व्यवहार अक्सर बदल जाता है।

ऐसे अवसरों पर हाथी अमूमन मृत हाथी के शरीर की चुपचाप जांच करते हैं, सिर झुकाकर उसके अंगों को सूंघते हैं या शायद छूते हैं, शव को हिलाने या जगाने की कोशिश करते हैं और दुर्लभ अवसरों पर यह भी हो सकता है कि वे उस पर मिट्टी या पेड़ की पत्तियां या तने डालने की कोशिश करते हों। ये ठीक वैसी ही प्रतिक्रियाएं हैं, जो मनुष्य शोक की अवस्था में दिखाते हैं।

मृत्यु को समझना
मृत साथियों के प्रति दिलचस्पी दिखाने वाले अकेले हाथी नहीं हैं। कौवों में भी यही प्रवृत्ति दिखती है। वे भी मृत कौवे को बीच में रखकर एकत्रित होते हैं, जिसे उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के रूप में पहचाना जाता है। ऐसा महसूस होता है कि कौवों का यह जमावड़ा उन्हें किसी खतरे से बचने के बारे में जानने का अवसर प्रदान करता है कि ऐसा न हो कि वे भी उसी स्थिति में पहुंच जाएं। इसके अलावा, चींटियां भी अपने मृतकों को दूर कर देती हैं। चींटियां दरअसल मृत चींटियों द्वारा स्रावित होने वाले रसायनों से उन्हें पहचानती हैं। चींटियों की कुछ प्रजातियों में तो मृत चींटियों को दफनाने की भी परंपरा दिखती है, ताकि बीमारी के स्थानांतरण की आशंका को सीमित किया जा सके।

हालांकि शोधकर्ता भी यह मानते हैं कि चींटियों या हाथियों के इस व्यवहार का मतलब यह कतई नहीं निकालना चाहिए कि उन्हें जिंदगी या मौत की कोई समझ है। 1950 के दशक में जीव विज्ञानी और कीट विज्ञानी ईओ विल्सन ने एक प्रयोग के तहत जीवित चींटियों पर एक खास रसायन लगाया, नतीजा यह हुआ कि बाकी चींटियां उनके साथ मृत जैसा ही व्यवहार करने लगीं। बाकी चींटियों ने उन्हें पकड़ कर बाहर खींच लिया और झुंड से अलग फेंक दिया।

रसायनों के प्रति कुछ ऐसी ही प्रतिक्रियाएं चूहों में भी देखी गईं। चूहे भी मृत चूहों से आने वाली खास गंध पर प्रतिक्रिया देते हैं। यहां तक कि जिन लकड़ियों से गंध आने लगती है, चूहे उन पर भी वैसी ही प्रतिक्रिया देते हैं। हालांकि चूहे और चींटियों के ये उदाहरण स्पष्ट तौर पर मनुष्य या हाथियों सहित कई प्रजातियों में दिखने वाले शोक व्यवहार से अलग हैं। जहां तक हाथियों की बात है, तो यह कहना फिलहाल मुश्किल है कि हाथी वास्तव में अपने मृत साथियों को दफनाते हैं या नहीं, लेकिन परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु पर उनकी भावनात्मक प्रतिक्रियाएं जरूर देखने लायक होती हैं।

क्या हाथी रोते हैं
मनुष्य कई भावनात्मक वजहों से रोते हैं, जैसे दर्द, भय, उदासी या अकेलापन। हाथी भी इन सभी का अनुभव करते हैं और इंटरनेट पर कई रील्स में आप हाथियों को रोते हुए देख भी सकते हैं। लेकिन उन्हें होने वाले दुख और उनकी आंखों के आंसुओं में अब तक कोई संबंध स्थापित नहीं हो पाया है। किसी अन्य जानवर की तुलना में हाथी अपने समूह के दूसरे सदस्यों के प्रति ज्यादा सहानुभूति रखने के लिए जाने जाते हैं। वे दूसरे हाथियों की रक्षा करते हैं, उन्हें आराम देते हैं, कमजोर हाथियों की मदद करते हैं, इत्यादि। अगर कभी जानवरों के आंसुओं और उनकी भावनाओं में कोई संबंध मिले, तो शायद हाथी इसके लिए पहले उम्मीदवार होंगे। हाथियों के आंसुओं के कारण दरअसल जैविक होते हैं। मनुष्यों और अन्य स्तनधारियों की आंखों में जब कोई कचरा जाता है, तो आंसू उन्हें बाहर निकालते हैं, जबकि हाथियों में आंसुओं की इस व्यवस्था की कमी होती है, इसलिए उनके आंसू निकलते रहते हैं।
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