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ट्रंप, अफगानिस्तान और भारत: रूस के साथ मिलकर अफगानी अर्थव्यवस्था में प्रभावी चीनी हस्तक्षेप, सबके लिए चिंताजनक

Thu, 20 Feb 2025 04:43 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Thu, 20 Feb 2025 04:43 AM IST
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सार
जब विभिन्न राष्ट्र अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर ट्रंप की वापसी के साथ तालमेल बिठा रहे हैं, भारत की नजर इस पर होगी कि वह खासकर अफगानिस्तान को लेकर क्या रुख दिखाते हैं। चीन, रूस के साथ मिलकर अफगानी अर्थव्यवस्था में प्रभावी हस्तक्षेप कर रहा है, जो अमेरिका व भारत, दोनों के लिए चिंता का विषय है।
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Donald Trump regime Afghanistan and India Effective Chinese intervention in the Afghan economy with Russia
डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ऐसे समय में, जब विभिन्न राष्ट्र अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के साथ तालमेल बिठा रहे हैं, भारत की प्रमुख चिंता यह है कि ट्रंप प्रशासन दक्षिण एशिया में सीमा पार प्रभावों के प्रति कितना संवेदनशील और सहयोगी होगा, जो इस्लामवादी और अलगाववादी ताकतों को प्रोत्साहित करता है। पाकिस्तान की नजर जम्मू-कश्मीर में आतंकी समूहों के जरिये अशांति पैदा करने पर केंद्रित है। वह या तो उन्हें नियंत्रित करने में असमर्थ है या अनिच्छुक है या दोनों है। बांग्लादेश में शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद से भारत का पूर्वी इलाका एक बार फिर संवेदनशील हो उठा है। इसने भारत पर खतरे की भावना को फिर से हवा दी है, क्योंकि आईएसआई के साथ मिलकर पाकिस्तान ढाका के नए शासकों से घनिष्ठता बढ़ा रहा है। बांग्लादेश की नई सरकार में इस्लामवादी विचारधारा को मानने वाले लोग शामिल हैं, जो अपनी राजनीतिक और वैचारिक मजबूरियों के कारण स्वाभाविक रूप से भारत विरोधी हैं। ऐसे में, भारत को सबसे बुरे हालात के लिए तैयार रहना चाहिए। हालांकि बाइडन प्रशासन ढाका में बदलावों का समर्थन कर रहा था, ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की हालिया अमेरिकी यात्रा के दौरान कहा भी है कि बांग्लादेश का फैसला उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ दिया है। हालांकि, उनकी इस टिप्पणी के अब कई अर्थ निकाले जा रहे हैं।



अफगानिस्तान में अमेरिका और चीन के हित भारत के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। हालांकि भारत ने गरीब अफगानों के दुख को कम करने के लिए फिर से काम करना शुरू कर दिया है, जिससे जटिलता और बढ़ गई है। वर्ष 2021 में अमेरिका के हटने के बाद से स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन आया है, लेकिन भारत की चिंताएं बनी हुई हैं। अफगानिस्तान के नए शासक भारत से सहयोग मांग रहे हैं, लेकिन उनमें हक्कानी नेटवर्क भी शामिल है, जिसने पाकिस्तान के इशारे पर अतीत में भारत के खिलाफ काम किया था। वे आतंकवादी गुटों, खासकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) पर लगाम लगाने में असमर्थ हैं, जिसे वे पनाह देते हैं। साथ ही वे अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) से लड़ रहे हैं, जिनके कारण अफगानिस्तान आतंकवाद का केंद्र बन गया है। इस क्षेत्र और भारत के लिए यह गंभीर चिंता की बात है कि अमेरिकी सेना 2021 में अपने पीछे भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद छोड़ गई है। वे हथियार एक तरफ भारत के जम्मू-कश्मीर, तो दूसरी तरफ ईरान तक पहुंच गए हैं। इस बीच, काबुल पर आरोप है कि उसने टीटीपी को प्रवेश की अनुमति दे दी है, जो पाकिस्तानी सुरक्षा बलों से लड़ रहा है। निर्वासन में रहने वाले पूर्व अफगान सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, 30 फीसदी अमेरिकी सैन्य उपकरण अल-कायदा और आईएसकेपी के हाथों में चले गए हैं। तालिबान शासित अफगानिस्तान 7.12 अरब डॉलर के सैन्य उपकरणों की सौदेबाजी के लिए तैयार है, लेकिन अपनी शर्तों पर। यह राशि अमेरिका के लिए नगण्य लग सकती है, लेकिन ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान उपकरणों की वापसी को प्रतिष्ठा का मुद्दा बना दिया था। अमेरिका की घरेलू राजनीति 2021 की वापसी के दौरान मारे गए लोगों को सम्मानित करने का निर्देश देती है।


पांच फरवरी को इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ संयुक्त मीडिया वार्ता में ट्रंप ने अफगानिस्तान पर पूछे गए एक तीखे सवाल को टाल दिया। अब अफगानों के पुनर्वास से जुड़े अमेरिकी विदेश विभाग कार्यालय को अप्रैल तक बंद करने की खबर आ रही है, जिससे लाखों लोगों के जीवन पर असर पड़ेगा। तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने दावा किया है कि अमेरिका द्वारा छोड़े गए हथियार और उपकरण ‘अब पूरी तरह से तालिबान के नियंत्रण में हैं। इन हथियारों का इस्तेमाल हमारी स्वतंत्रता, आजादी और इस्लामी व्यवस्था की रक्षा के लिए किया जाएगा। अगर कोई उन्हें वापस चाहता है, तो हम बातचीत करेंगे, लेकिन अपनी शर्तों पर।’ ऐसी ‘शर्तें’ संभावित भावी वार्ता का हिस्सा हो सकती हैं। लेकिन अब तक, अफगान मीडिया और विश्लेषकों का कहना है कि हथियार और उपकरण अमेरिका को वापस करना ‘व्यावहारिक’ नहीं होगा। यह ‘संभव नहीं’ है, क्योंकि उपकरण उन समूहों के हाथों में हैं, जो काबुल शासकों और अमेरिका, दोनों के लिए शत्रुतापूर्ण हैं। इसके अलावा, ट्रंप का सामना चीन से है, जो रूस के साथ मिलकर अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, तालिबान के शासन में पहले से भी ज्यादा गरीबी झेल रहे अफगानिस्तान को धन की सख्त जरूरत है। हाल के हफ्तों में मुद्रा में तेजी से गिरावट आई है। जनवरी में, तालिबान ने विनिमय दरों को प्रबंधित करने के इसी तरह के प्रयास में 6.2 करोड़ डॉलर की नीलामी की। अफगानी मुद्रा के अवमूल्यन का आंशिक कारण अमेरिका से मिलने वाली वित्तीय सहायता में कमी है, क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने अफगानिस्तान को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता में कटौती कर दी है।

कूटनीतिक पर्यवेक्षक इसे वरिष्ठ अफगान नेताओं की खाड़ी की यात्राओं से जोड़ते हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों के तहत यात्रा करने से रोक दिया गया था, जब ट्रंप ने पदभार संभाला था। वे जाहिर तौर पर हज करने के लिए थे। इसे सुविधाजनक बनाने के लिए, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रतिबंध समिति ने संकल्प 1988 के तहत यात्रा छूट जारी की। इनमें प्रतिबंधित हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख और कार्यवाहक आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी, कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी तथा कार्यवाहक हज एवं धार्मिक मामलों के मंत्री नूर मोहम्मद साकिब शामिल थे। सरकारी प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद के अनुसार, हक्कानी ने संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ ‘क्षेत्रीय स्थिरता और अफगानिस्तान की आर्थिक क्षमताओं’ पर चर्चा की।

सभी जानते हैं कि तालिबान विभिन्न सरकारों के साथ बातचीत करने के लिए यूएई, सऊदी अरब और कतर में अपनी राजनयिक उपस्थिति बनाए रखता है। पिछले महीने भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री के साथ ऐसी ही एक बैठक हुई थी। पर्यवेक्षकों का कहना है कि विश्व समुदाय अफगानिस्तान के लोगों की तकलीफों को कम करने, उसके अलगाव को खत्म करने के लिए तैयार है। उम्मीद है कि यह किसी न किसी स्तर पर तालिबान को अपनी महिलाओं और अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार करने के लिए राजी करेगा।     

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