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मुद्रा: डॉलर का घटता वैश्विक दबदबा और रुपये का बढ़ता रुतबा

Wed, 12 Apr 2023 06:57 AM IST
P.S. Vohra पी. एस वोहरा
Updated Wed, 12 Apr 2023 06:57 AM IST
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सार
आईएमएफ की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक मुद्रा संग्रहण में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी पहले के मुकाबले घट गई है।
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declining of US Dollar Dominance and Rise of rupee in global trade new BRICS currency replace dollar
डॉलर - फोटो : पिक्साबे

विस्तार

आर्थिक जगत में इन दिनों इस बात पर गहन विमर्श चल रहा है कि आने वाले समय में अमेरिकी मुद्रा डॉलर का वैश्विक दबदबा कम हो जाएगा। चर्चाओं के इस दौर में कई दूसरे देशों की मुद्राओं का नाम वैश्विक मुद्रा के रूप में लिया जा रहा है। इसमें चीन की मुद्रा युआन का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। दूसरी तरफ यह भी सोच है कि आगामी अगस्त में ब्रिक्स देशों की बैठक में निश्चित रूप से डॉलर के विरुद्ध किसी नई मुद्रा का उदय होगा। इस चर्चा की शुरुआत तब हुई, जब यह देखा गया कि पिछले कुछ अर्से से अमेरिकी मुद्रा डॉलर का संग्रहण बड़ी तेजी से घट रहा है।



इस संदर्भ में आईएमएफ की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1999 तक जहां वैश्विक मुद्रा संग्रहण में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी से अधिक थी, वह वर्ष 2022 में घटकर 59 फीसदी रह गई है। डॉलर के बाद सबसे अधिक संग्रहण यूरो का है।


अगर डॉलर का वैश्विक दबदबा कम होता है या उसके विकल्प के रूप में किसी अन्य मुद्रा को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिलती है, तो निश्चित रूप से यह पिछली एक शताब्दी में अमेरिका की वैश्विक साख मंे बहुत बड़ी गिरावट होगी। इसके लिए स्पष्ट रूप से अमेरिका की आर्थिक नीतियां ही दोषी हैं। सभी मुल्क अमेरिकी डॉलर की आक्रामकता से सदैव परेशान रहते हैं। मसलन, इन दिनों अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी से डॉलर वैश्विक स्तर पर बहुत मजबूत हुआ, जिससे सभी देशों की मुद्राएं अत्यंत कमजोर हुईं। इससे सभी देशों के आयात महंगे हुए, जिसने अंततः घरेलू बाजारों में तेजी से महंगाई बढ़ाई। इसलिए कई मुल्क अमेरिका के बजाय अब दूसरे विकसित देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहे हैं तथा उन मुल्कों की विदेशी मुद्राओं के संग्रहण को प्राथमिकता दे रहे हैं।

वास्तव में यह चर्चा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का ही हिस्सा है। रूस-यूक्रेन युद्ध में वैश्विक स्तर पर अमेरिकी रुख को रूस और चीन, दोनों मिलकर मजबूती से जवाब देना चाहते हैं। इसलिए सबसे पहले चीन ने अमेरिकी डॉलर के अपने भारी-भरकम संग्रहण को अपनी मुद्रा युआन में परिवर्तित किया। फिर रूस द्वारा वैश्विक स्तर पर इस बात को प्रमुखता से उठाया जाने लगा कि आने वाले समय में चीन की मुद्रा युआन को डॉलर की जगह लेनी चाहिए। हालांकि वैश्विक स्तर पर कुल विदेशी मुद्रा भंडार में चीन की मुद्रा का हिस्सा मात्र पांच फीसदी के आसपास ही है।

आगामी अगस्त में होने वाली ब्रिक्स देशों की बैठक में डॉलर के विरुद्ध अन्य मुद्रा का विकल्प अवश्य चर्चा में रहेगा। लेकिन ब्रिक्स बैठक में भारत कभी भी युआन को डॉलर के विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि इसके पीछे विभिन्न आर्थिक तथा राजनीतिक कारण हैं। चीन व रूस की प्रगाढ़ दोस्ती के पीछे मुख्य निशाना भारत है। इसलिए ब्रिक्स के अंतर्गत चीन की मुद्रा को डॉलर के विकल्प के रूप में शायद ही देखा जाए।

अब अगर भारत के विदेशी मुद्रा संग्रहण की बात की जाए, जो इन दिनों 530 अरब डॉलर के आसपास है, तो उसमें सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर का ही है। भारत की आर्थिक नीतियों का झुकाव अमेरिका की तरफ ज्यादा रहता है। हालांकि अमेरिकी डॉलर की आक्रामकता से कई बार भारतीय शेयर बाजार अचानक गिर जाता है और घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ जाती है। रही बात भारतीय रुपये के डॉलर का विकल्प बनने की, तो अभी यह आसान नहीं है।

गौरतलब है कि किसी भी देश की मुद्रा को वैश्विक मुद्रा के रूप में पहचान हेतु उस देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था होना व आर्थिक नीतियों में प्रगतिशीलता जरूरी है। भारत में ये दोनों बातें हैं और भारत विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था भी है, परंतु अभी उसे एक लंबा सफर तय करना है, क्योंकि भारत का निर्यात बहुत कम है। इसलिए ऐसा नहीं लगता है कि भारत किसी अन्य मुद्रा को डॉलर के विकल्प के रूप में समर्थन देगा।

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