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जानना जरूरी है: दंडकारण्य की उत्पत्ति कैसे हुई? शुक्राचार्य के शाप और रामायण के प्रसंगों से जुड़ी है कथा
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विस्तार
सतयुग में वैवस्वत मनु का इस पृथ्वी पर शासन था। उनके पुत्र का नाम इक्ष्वाकु था। मनु ने इक्ष्वाकु को भूमंडल पर अभिषिक्त करके कहा, ‘पृथ्वी के राजवंशों के अधिपति बनो और दंड के द्वारा प्रजा की रक्षा करो। अपराधियों को शास्त्रीय विधि के अनुसार दंड दिया जाए, तो राजा स्वर्ग में जाता है। इसलिए दंड का अकारण प्रयोग न करना।’ इस तरह पुत्र को उपदेश देकर महाराज मनु ब्रह्मलोक को सिधार गए। इक्ष्वाकु का सबसे छोटा पुत्र सर्वगुण संपन्न था। इक्ष्वाकु ने उसका नाम दंड रखा और विंध्यगिरि के दो शिखरों के बीच में उसे रहने के लिए मधुमत्त नाम का एक नगर दे दिया। दंड ने अनेक वर्षों तक राज किया।
एक दिन राजा दंड शुक्राचार्य के आश्रम पहुंचा, तो उसने देखा कि आचार्य की अत्यंत सुंदर कन्या अरजा वन में घूम रही है। उसे देखकर दंड काम से पीड़ित होकर उस कन्या के पास गया और बोला, ‘सुंदरी! तुम कहां से आई हो? तुम किसकी कन्या हो? मैं तुम्हारा दास हूं। मुझे अंगीकार कर लो।’ अरजा बोली, ‘राजेंद्र! मैं शुक्राचार्य की पुत्री अरजा हूं। मेरे पिता आपके गुरु हैं। अतः धर्म के नाते मैं आपकी गुरु-बहन हूं। इसलिए आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए। मेरे पिता अत्यंत क्रोधी हैं। वे आपको शाप से भस्म कर सकते हैं। अतः आप मेरे पिता के पास जाइए और उनसे मेरे लिए याचना कीजिए। विपरीत आचरण करने पर आप पर घोर संकट आ सकता है।
दंड बोला, ‘सुंदरी! तुम्हें पाने के बाद मेरा वध हो जाए, तो भी मुझे स्वीकार है। तुम मुझे अस्वीकार मत करो।’ ऐसा कहकर राजा दंड ने अरजा को बाहुपाश में कस लिया।
अरजा बहुत छटपटाई, किंतु दंड उसे एकांत स्थान पर ले गया और वहां उसके साथ बलपूर्वक संबंध बनाया। फिर अपने नगर को चल दिया। अरजा रोती हुई पिता के पास आई। उसके पिता शुक्राचार्य उस समय सरोवर पर स्नान करने के लिए गए थे। आश्रम पहुंचकर उन्होंने अरजा की दयनीय दशा देखी। वह अपने तपोबल से तुरंत ही सारा रहस्य जान गए।
शुक्राचार्य क्रोध से भर उठे। बोले, ‘धर्म के विपरीत आचरण करने वाले राजा दंड के ऊपर भयंकर विपत्ति आने वाली है। वह खोटी बुद्धिवाला पापी राजा अपने देश और सेना सहित नष्ट हो जाएगा। उसके सौ योजन लंबे-चौड़े राज्य में धूल की वर्षा होगी। वहां रहने वाले जितने भी प्राणी हैं, सबका नाश हो जाएगा। जहां तक दंड का राज्य है, वहां तक सात रात तक धूल की निरंतर वर्षा होती रहेगी।’
इस प्रकार शाप देकर शुक्राचार्य ने अपने शिष्यों से कहा, ‘तुम लोग इस राज्य की सीमा से बाहर चले जाओ।’ उनकी आज्ञा पाते ही आश्रमवासी सीमा से बाहर जाकर रहने लगे। फिर शुक्राचार्य अरजा से बोले, ‘पुत्री! तू अपने चित्त को एकाग्र करके इसी आश्रम में निवास कर। यह चार कोस के विस्तार वाला सुंदर शोभा-संपन्न सरोवर है। तू सात्विक जीवन व्यतीत करती हुई सौ वर्षों तक यहीं रह।’ पिता का आदेश सुन अरजा ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। वह बहुत दुखी थी। शुक्राचार्य, अरजा को यह सब कहकर वहां से दूसरे आश्रम के लिए प्रस्थान कर गए।
शुक्राचार्य के कथनानुसार विंध्यगिरि के शिखरों पर फैले हुए राजा दंड के समूचे राज्य में धूल की भारी वर्षा हुई और वह राज्य एक सप्ताह के भीतर ही निर्जन वन में बदल गया। तभी से वह विशाल वन ‘दंडकारण्य’ कहलाता है। यह कथा पद्मपुराण के सृष्टि खंड में मिलती है। अनेक वर्षों तक दंडकारण्य निर्जन पड़ा रहा। वह भयानक वन धीरे-धीरे राक्षसों का निवास स्थान बन गया। कालांतर में, राक्षस राज रावण ने अपनी बहन शूर्पणखा को दंडकारण्य की स्वामिनी बना दिया था और वह अपने भाइयों-खर और दूषण के साथ यहां रहने लगी। त्रेता युग में भगवान श्रीराम, अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वनवास पर निकले, तो इसी दंडकारण्य के भीतर पंचवटी नामक स्थान पर उन्होंने कुटिया बनाई और रहने लगे। इस स्थान पर शूर्पणखा की राम और लक्ष्मण से मुठभेड़ हुई, जिसके बाद रावण ने सीता जी का अपहरण कर लिया था।