{"_id":"6888149a7fbf9378a40a06eb","slug":"cleanliness-how-to-keep-cities-clean-we-can-learn-its-tricks-from-indore-residents-2025-07-29","type":"story","status":"publish","title_hn":"स्वच्छता: शहर स्वच्छ कैसे रखे जाते हैं? इंदौरवासियों से सीख सकते हैं इसके गुर","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
स्वच्छता: शहर स्वच्छ कैसे रखे जाते हैं? इंदौरवासियों से सीख सकते हैं इसके गुर
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
स्वच्छता।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
चटोरों का शहर, अपनी संस्कृति और धरोहर को सहेजे रखने वाला इलाका, अदब के साथ पेश आने वालों से भरा मिनी मुंबई कहलाने वाला शहर एक बार फिर देश में अव्वल आया। मालवा के इस शहर के लोग एक-दूसरे को बधाई देते यह कहते नहीं अघाते ‘भिया अपणो इंदौर चकाचक तो हुई ग्यो, अपणों इंदौर फिर टॉप आय्यो...।’ स्वच्छ सर्वेक्षण 2024 के नतीजों को लेकर यहां के लोगों को निश्चिंतता थी, क्योंकि इसके लिए वे हर दिन जुटे रहते थे।
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने इस बार कई बरसों से स्वच्छ सर्वेक्षण में अव्वल रहने वाले शहरों के लिए सुपर स्वच्छता लीग की शुरुआत की, ताकि जो शहर हर बार टॉप कर रहे हैं, वे आदतन बदल चुके हैं और इनका मुकाबला स्वच्छ सर्वेक्षण में दूसरे शहरों से होगा, तो और सुधार होगा। लेकिन सुपर स्वच्छता लीग में भी इंदौर ने ही टॉप किया। इंदौर की यह उपलब्धि महज प्रशासनिक प्रयास नहीं है, बल्कि वहां के प्रत्येक नागरिक की भी सामूहिक जिम्मेदारी की दौड़ है। दरअसल, मालवा के इस शहर की फितरत ही ऐसी है कि जो ठाना उसे पाना।
इंदौर ने तीन-आर पर काम किया। रिड्यूस, रीयूज और िरसाइकल, लेकिन अब एक और आर यानी रिप्रोड्यूस पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इंदौर में कचरे से नई उपयोगी चीजें बनेंगी। जैविक कचरे से खाद, प्लास्टिक और अन्य अनुपयोगी वस्तुओं को रिसाइकल कर नए उत्पाद बन रहे हैं। इंदौर में कचरा अब कचरा नहीं, कमाई का जरिया भी बन गया है।
इंदौर ने अभी से आगे भी अपनी बादशाहत बरकरार रखने की तैयारी भी शुरू कर दी है। नगर निगम ने जीरो लैंड फ्री सिटी की ओर भी कदम बढ़ा दिए हैं। इसके जरिये न केवल प्रोसेसिंग के बाद बचने वाले करीब पांच प्रतिशत अनुपयोगी सूखे कचरे को जमीन के नीचे दबाकर एक लेयर तैयार की जाएगी, इससे जमीन में लैंड फिलिंग का काम होगा। नगर निगम की कोशिश वेस्ट मैटेरियल से बिजली बनाने की भी है। अभी इंदौर में ट्रीटेड सीवर वाटर के जरिये भवन निर्माण के क्षेत्र में इसका उपयोग कर अच्छी शुरुआत की गई है, जिसके बेहतर नतीजों के साथ कमाई भी हो रही है। इस तरह इंदौर में घरों के बाथरूम और किचन के खराब पानी का सदुपयोग भी बड़ा कामयाब रहा।
इंदौर का स्वच्छता में परचम फहराने के पीछे आज की मेहनत तो है, पर असल शुरुआत 1913 में होलकर राज्य में तभी हो गई थी, जब शहर में गंदगी करने वालों पर जुर्माना लगने लगा था। 1970-80 के दशक में जब इंदौर नया आकार ले रहा था और कॉलोनियों की शुरुआत हुई, तब भी सफाई को खूब तवज्जो दी गई। बेशक इंदौर की कॉलोनियों का चकाचक होना 2014 के बाद सफाई को लेकर शुरू हुए राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बन गया है, जब पहली बार देश में इसको लेकर स्वच्छ शहर अवॉर्ड की शुरुआत हुई।
भारत में पहली बार घर-घर डस्टबीनों में कचरा संग्रह कराने की मुहिम इंदौर से ही शुरू हुई, जो मील का पत्थर भी साबित हुई। बाद में गीले-सूखे कचरे संग्रह की शुरुआत हुई। गीले कचरे के शोधन के लिए आसपास संयंत्र लगाए गए। दिल्ली समेत दूसरे कई महानगरों सरीखे इंदौर में भी देवगुराड़िया गांव के पास कचरे के ढेर मुंह चिढ़ाते थे। वहां पंद्रह लाख टन कचरे को खत्म करने की शुरुआती पहल से सभी का ध्यान इंदौर की ओर गया और पहली बार 2017 में इंदौर ने देश के स्वच्छ शहर का खिताब न केवल अपने नाम किया, बल्कि आज तक बरकरार भी रखा।
इंदौर नगर निगम का वार्षिक बजट आठ हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा है। इसमें दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा स्वच्छता के लिए बताए जा रहे हैं। इसी में वेतन एवं अन्य विविध व्यय भी शामिल हैं। यहां के लोगों से उपयोगकर्ता यानी यूजर चार्ज शुल्क भी बहुत मामूली वसूला जाता है। झुग्गी-झोपड़ियों से 60 रुपये, मध्यम वर्ग से 90 रुपये और संपन्नों से 150 रुपये हर घर का मासिक शुल्क लिया जाता है। निश्चित रूप से यह न केवल जनभागीदारी है, बल्कि इससे जिम्मेदारी भी बनती है।
शहर के साफ-सफाई में अव्वल आने से लोगों की मानसिकता बदली है। इंदौरियों में स्वच्छता का संस्कार इस कदर समा गया है कि वे खुद भी इधर-उधर कचरा नहीं फेंकते और दूसरों को भी नहीं फेंकने देते। कूड़ा तो दूर, लोगों की सड़कों पर जहां-तहां थूकने की आदत भी बदल गई है। इससे लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार के अलावा दूसरे फायदे भी नजर आ रहे हैं, जहां स्थायी संपत्तियों की दरें बढ़ रही हैं, वहीं निवेशक भी इंदौर की तरफ आकृष्ट हो रहे हैं। वाकई इंदौर दूसरे शहरों के लिए मिसाल बन गया है। कितना अच्छा होता कि सब इंदौर मॉडल को अपनाते। हां, बधाई इंदौर के साथ-साथ उन सभी को बनती है, जिन्होंने किसी न किसी श्रेणी में स्थान हासिल किया है।