फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Chinese view on foreign aid is very different world believes this is time of India know why

अर्थव्यवस्था: विदेशी मदद के मामले में चीनी नजरिया बहुत अलग, पूरी दुनिया का मानना है कि यह भारत का समय है...

Tue, 06 Aug 2024 04:53 AM IST
Jitendra Uttam जितेंद्र उत्तम
Updated Tue, 06 Aug 2024 04:53 AM IST
विज्ञापन
सार
विदेशी सहायता के मामले में चीन और भारत के दृष्टिकोण में बहुत फर्क है। चीन बड़ी परियोजनाओं की फंडिंग करता है, जबकि भारत  छोटी परियोजनाओं को वित्तपोषित करता है। वैश्विक आर्थिक प्रतिकूलताएं चीन के लिए बाधा बन रही हैं, ऐसे में पूरी दुनिया का मानना है कि यह भारत का समय है।
loader
Chinese view on foreign aid is very different world believes this is time of India know why
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भारत की वैश्विक स्थिति अच्छी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाल ही में टोक्यो में हुई क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में चीन को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा गया कि हिंद-प्रशांत देश में किसी की दबंगई स्वीकार नहीं की जाएगी। क्वाड के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त बयान जारी कर कहा, 'हम स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत के लिए ‘क्वाड’ की दृढ़ प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हैं।' लेकिन दक्षिण एशिया में हालिया आर्थिक उथल-पुथल (श्रीलंका एवं पाकिस्तान में गंभीर आर्थिक संकट के साथ बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती) ने बीजिंग के लिए इस विशाल एवं अविकसित क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अनुकूल स्थितियां पैदा कर दी हैं। कोविड काल के दौरान दुनिया भर में बड़े पैमाने पर तरलता के प्रवाह ने मुद्रास्फीति के माहौल को जन्म दिया, जिससे अमेरिकी डॉलर का मूल्य बढ़ गया। मजबूत अमेरिकी मुद्रा ने कई दक्षिणी एशियाई देशों को आर्थिक संकट में डाल दिया।


इससे श्रीलंका और पाकिस्तान में भारी आर्थिक संकट पैदा हो गया। इन देशों की आर्थिक कमजोरियों पर नजर रखने वाला चीन दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार करने के लिए सैन्य, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक साधनों का उपयोग करने पर तुला है। बीजिंग का लक्ष्य प्रमुख एशियाई शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करना, हिंद महासागर के विशाल संसाधनों तक पहुंच बनाना, भारत को घेरना, महत्वपूर्ण समुद्री संचार लाइनों को सुरक्षित करना तथा झिंजियांग व तिब्बत जैसे अस्थिर क्षेत्रों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। भारत और भूटान को छोड़कर इस क्षेत्र के अधिकांश देश बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) में शामिल हैं। 


चीन इस क्षेत्र के कई देशों की बड़ी आधारभूत परियोजनाओं के निर्माण में मदद कर रहा है, और इसके लिए उसने उन देशों को कर्ज दिया है। ये कर्ज चीन के रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं और इस क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़ाने में मदद करते हैं। क्या बीजिंग भारत को घेरने के लिए गठबंधनों का जाल बुन रहा है?

कैलिफोर्निया स्थित आरएएनडी कॉर्पोरेशन के वरिष्ठ रक्षा विश्लेषक प्रोफेसर डेरेक ग्रासमैन का मानना है कि ‘भारत दक्षिण एशिया में चीन से आर्थिक प्रतिस्पर्धा में हार नहीं रहा, बल्कि जीत भी सकता है।’ खबरों से पता चलता है कि भारत दक्षिण एशिया के पसंदीदा ऋणदाता के रूप में चीन को चुनौती देने की योजना बना रहा है और उसके बीआरआई के पीछे छिपे इरादे का मुकाबला करना चाहता है। श्रीलंका और पाकिस्तान की आर्थिक विफलता के बाद, नई दिल्ली ने पड़ोसी देशों को ऋण देने में भारी वृद्धि करने के अपने प्रयासों को तेज कर दिया है। दक्षिण एशियाई समकक्षों को वैकल्पिक ऋण सुविधा प्रदान करने वाले देश के रूप में भारत के उभार के कारण अरबों डॉलर के निवेश वाली बड़ी आधारभूत परियोजनाओं की फंडिंग करने में चीन की रुचि कम हो रही है।

आंकड़ों से पता चलता है कि एक ऋणदाता के रूप में भारत की भूमिका में बहुत तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से भारत सरकार की ऋण सहायता का मूल्य लगभग तीन गुना बढ़कर 32.5 अरब डॉलर हो गया है। हालांकि भारत इस मामले में चीन से बहुत पीछे है, लेकिन आजादी के बाद से इसकी विदेशी सहायता 55 अरब डॉलर से दोगुनी होकर 107 अरब डॉलर हो गई है। भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना है कि भारत ने लगभग 600 परियोजनाओं के लिए 300 से अधिक क्रेडिट लाइनें बढ़ाई हैं।
भारत द्वारा वित्तपोषित छोटी परियोजनाओं में व्यापक सामाजिक भागीदारी और बड़ी राजनीतिक पहुंच है।

विदेशी सहायता के मामले में चीन और भारत के दृष्टिकोण में बहुत अंतर है। चीन बड़ी-बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की फंडिंग करता है, जबकि भारत क्रेडिट लाइनों पर ध्यान केंद्रित करता है, ताकि जरूरत के हिसाब से छोटी-छोटी परियोजनाओं को वित्तपोषित किया जा सके, जो स्थानीय आबादी के लिए मददगार और गरीबी उन्मूलन में सहायक हो सकती हैं। भारत में कई लोगों का मानना है कि चीन ऋण-जाल कूटनीति अपना रहा है, जो दूसरों की संपत्तियों पर नियंत्रण के उद्देश्य से कर्ज देता है।

नई दिल्ली द्वारा ऋण की नरम शर्तों और आवश्यकता-आधारित छोटी क्रेडिट लाइनों ने भारत के प्रति सद्भावना पैदा की है। नतीजतन नई दिल्ली को श्रीलंका के उत्तरी भाग में कुछ ऊर्जा परियोजनाएं मिलीं, जो पहले चीनी डेवलपर के पास थीं। फिर भी, दक्षिण एशिया में कई देश भारत को चीनी ऋण का प्रभावी विकल्प नहीं मानते हैं। मसलन, मालदीव के विपक्ष ने इंडिया आउट कैंपेन चलाया और कहा कि भारत द्वारा वित्तपोषित परियोजनाएं द्वीपसमूह में अपनी सैन्य पैठ से ध्यान हटाने के लिए हैं।

विदेशी सहायता में निजी कंपनियों को भागीदार बनाने के लिए मोदी सरकार ने 2015 में विदेश में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए रियायती ऋण देने की योजना शुरू की। भारत के एक्जिम बैंक के ऋण में चीनी ऋणों की तुलना में अधिक रियायती शर्तें होती हैं। प्रधानमंत्री मोदी भारत के हर उस कारोबारी घराने के करीब रहे हैं, जो विकासोन्मुख व राष्ट्रवादी है और बड़ा दांव लगाने को तैयार है। इनमें वे भारतीय कंपनियां भी शामिल हैं, जिन्होंने विदेशों में महत्वपूर्ण कारोबार स्थापित किया है।

दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर चीन की लगातार बढ़ती छाया के बावजूद भारत का पड़ोसी देशों पर प्रभाव बना हुआ है। क्षेत्र के  कई देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक और भाषायी संबंध हैं, जिससे लगता है कि दक्षिण एशिया पर चीन के 
प्रभाव की सीमाएं हैं। सुस्त आर्थिक वृद्धि और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के कारण चीन को दक्षिण एशिया में अपनी पहुंच बढ़ाने में बाधाओं का एहसास हो रहा है। भारत पड़ोसी देशों में अपना खोया हुआ गौरव फिर से हासिल करने के लिए उपयुक्त मौके तलाश रहा है। वैश्विक आर्थिक प्रतिकूलताएं चीन के राजनीतिक-आर्थिक प्रभाव के लिए बाधा बन रही हैं, ऐसे में पूरी दुनिया कहती है कि यह भारत का समय है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed