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चिंता: क्या कूनो में 'कैद' में हैं चीते, कई मौतों के बाद उठ रहे हैं ऐसे सवाल

Thu, 11 May 2023 06:57 AM IST
गुलाम अहमद ऋषभ मिश्रा
ऋषभ मिश्रा Published by: गुलाम अहमद Updated Thu, 11 May 2023 06:57 AM IST
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सार
पिछले साल 20 चीतों को कूनो नेशनल पार्क में लाया गया था, जिनमें से तीन चीतों की मौत हो चुकी है। इससे कई सवाल खड़े होते हैं।
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cheetah death at Kuno National Park raising questions
चीता - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कोरोना महामारी के बाद अचानक दिल के दौरे से लोगों की जान जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन हार्ट अटैक सिर्फ इंसानों को नहीं आता है, बल्कि चीतों को भी आता है। हाल ही में मध्य प्रदेश के 'कूनो नेशनल पार्क' में 'उदय' नाम के चीते की मौत की घटना सामने आई है। कूनो नेशनल पार्क के अधिकारियों के अनुसार,  22 अप्रैल तक उदय चिकित्सीय जांच में स्वस्थ पाया गया था। लेकिन 23 अप्रैल की सुबह जब उसकी तबीयत बिगड़ी, तो चिकित्सीय सहायता के लिए उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया। हैरान करने वाली बात यह है कि उसकी मौत 'हार्ट अटैक' से हुई, जिसकी पुष्टि शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हुई है।



गौरतलब है कि बीते सितंबर में नामीबिया से आठ चीते आने के बाद दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते कूनो नेशनल पार्क में लाए गए थे। छह साल का उदय भी उनमें से एक था। इससे पहले मादा चीता साशा की भी रहस्यमय तरीके से मौत हुई थी। साशा में थकान और कमजोरी के वैसे ही लक्षण दिखे थे, जैसे उदय में दिखाई दिए थे। इलाज के दौरान साशा ने भी दम तोड़ दिया था। दावा किया गया कि साशा भारत लाए जाने से पहले ही किडनी की बीमारी से पीड़ित थी। अब कूनो नेशनल पार्क में लाए गए तीसरे चीते 'दक्षा' की भी मौत हो गई, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए। 'दक्षा' की मौत दो अन्य चीतों के साथ झड़प में हुई है।


पिछले साल 20 चीतों को नेशनल पार्क में लाया गया था, जिनमें से तीन की मौत हो चुकी है। तीन चीतों की मौत ने कई सवालों को जन्म दे दिया है। पहला सवाल तो यही कि आखिर चीतों की मौत की असली वजह क्या है। और दूसरा इससे भी बड़ा यह है कि भारत में चीते आगे जीवित बचेंगे भी या नहीं?

वैज्ञानिक एवं डॉक्टरों का कहना है कि चीतों में कम उम्र में ही किडनी खराब होने के मामले सामने आने लगते हैं, जो आगे चलकर जानलेवा बन जाते हैं। मादा चीता साशा की मौत भी किडनी खराब होने की वजह से ही हुई थी। लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर साशा की किडनी फेल कैसे हो गई? अगर यहां लाए जाने केे पहले ही मादा चीता साशा किडनी की बीमारी से जूझ रही थी, तो फिर उसे लाया ही क्यों गया था, जबकि सबको अच्छी तरह पता था कि अच्छे-भले चीतों को भारत लाने के बाद कई परेशानी हो सकती है।

तो क्या साशा को भारत लाने के बाद किडनी की बीमारी हुई थी? इसका जवाब अमेरिका के 'नेशनल सेंटर ऑफ बायोटेक्नोलॉजी इनफार्मेशन' के एक शोध में मिलता है। यह शोध 1967 से 2014 के दौरान 243 ऐसे चीतों पर अध्ययन का निचोड़ है, जो कैद में रह रहे थे। अध्ययन में पाया गया कि कैद में रहने वाले 64 फीसदी चीतों को किडनी की बीमारी थी, जबकि खुले में रहने वाले मात्र तीन फीसदी चीतों को किडनी की बीमारी की आशंका थी। कैद में रहने वाले चीतों की किडनी में हानिकारक रसायन खतरनाक स्तर पर बढ़े हुए पाए गए।

शोध में यह भी पाया गया कि कैद में रहने वाले चीते अक्सर तनाव में रहते हैं, जिसका असर उनकी किडनी पर पड़ता है। यानी इंसान की तरह चीते भी डिप्रेशन के शिकार होते हैं और कई बार यह डिप्रेशन उनकी जान ले लेता है। आशंका जताई जा रही है कि भारत में तीन चीतों की मौत के पीछे डिप्रेशन ही एकमात्र कारण होता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि एक चीते को सामान्य गतिविधि के लिए 100 वर्ग किलोमीटर का इलाका चाहिए होता है। जबकि कूनो नेशनल पार्क में मादा चीता शाशा को पांच वर्ग किलोमीटर इलाके में छोड़ा गया था। दूसरी तरफ उदय जिस बाड़े में रखा गया था, वह महज 1,500 वर्ग मीटर था। यानी कि मारे गए दोनों चीते कैद में थे। अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि पांच चीतों को (तीन मादा और दो नर) जून में मानसून की शुरुआत से पहले कूनो नेशनल पार्क के बाहर छोड़ा जाएगा। लगातार हो रही चीतों की मौत का स्थायी एवं त्वरित समाधान खोजा जाना अब बहुत जरूरी हो गया है।

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