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बीमारू राज्यों की बदलती तस्वीर

Sun, 15 Apr 2018 07:39 PM IST
वरुण गांधी , भाजपा सांसद
वरुण गांधी , भाजपा सांसद Updated Sun, 15 Apr 2018 07:39 PM IST
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Changing picture of BIMARU States
महिला

तैंतीस साल पहले आशीष बोस द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को सौंपी रिपोर्ट में उत्तर भारत के चार बड़े राज्यों (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) को ‘बीमारू’ राज्य की अपमानजनक पहचान दी गई थी। इसके बाद इस शब्द का बार-बार इस्तेमाल किया गया तथा उत्तर भारतीय राज्यों को हमेशा के लिए बीमार मान लिया गया और उनको गरीबी व बेरोजगारी का ताना दिया गया। इसके साथ ही विंध्य और नर्मदा से रेखांकित ‘आर्यावर्त’ का उत्तर-दक्षिण का विभाजन, जो कभी एक भौगोलिक विभाजन था, सामाजिक-आर्थिक दीवारों से और स्थायी हो गया।


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ऐसा नहीं है कि उत्तर और दक्षिण कई मामलों में एक दूसरे से अलग नहीं हैं। अब भी भाषा और विकास का विभाजन है। पोट्टी श्रीरामलू के अनशन के चलते मद्रास स्टेट के उत्तरी हिस्से के तेलुगू भाषी 16 जिलों को अलग कर आंध्र प्रदेश बनाया गया। केरल, जिसका अक्सर उदाहरण दिया जाता है-मानव विकास सूचकांक में पहले पायदान पर है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तर भारतीय राज्य हमेशा की तरह निचले पायदान पर हैं (विश्व बैंक की 2016 की रिपोर्ट)। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में केरल अब भी अग्रणी है, जहां साक्षरता दर 95 फीसदी है और औसत स्कूली पढ़ाई आठ साल (इसकी तुलना में उत्तरी राज्यों में सिर्फ चार साल) है। केरल में सिर्फ 0.6 फीसदी बच्चों की एक साल से कम आयु में मृत्यु होती है, जबकि राष्ट्रीय आंकड़ा 4.1 फीसदी है; यहां 95 फीसदी घरों में शौचालय है (2011 की जनगणना)। इसके साथ ही केरल में तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर स्वास्थ्य सेवा सुविधा उपलब्ध है, जिसका नतीजा है कि वहां के लोगों की औसत आयु 75 साल से अधिक है।

लेकिन यह अधूरी तस्वीर है, और राज्यों को विविधता के पैमानों पर परख पाने में नाकाम है। वर्ष 1960 में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और पंजाब में प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे ज्यादा थी, जबकि गुजरात और तमिलनाडु भी शीर्ष पांच में शामिल थे। अब केरल की प्रतिव्यक्ति आय सबसे ज्यादा है, और महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक व तमिलनाडु इसके पीछे हैं। धीरे-धीरे इन राज्यों की अर्थव्यवस्था मध्यम स्तर के देशों के बराबर पहुंच चुकी है-महाराष्ट्र की जीडीपी 400 अरब डॉलर है, जबकि गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक के साथ उत्तर प्रदेश की जीडीपी 200 अरब डॉलर से ऊपर है (वित्त मंत्रालय, 2016)। इस बीच छोटे राज्यों की हालत में लगातार सुधार हो रहा है-त्रिपुरा की प्रति व्यक्ति आय 1984 से 2014 के दौरान छह गुना बढ़ चुकी है, इसी तरह हिमाचल की भी प्रति व्यक्ति आय चार गुना बढ़ चुकी है।

गरीबी में कमी धीरे-धीरे पूर्वी राज्यों की विशेषता बनती जा रही है। बिहार की प्रति व्यक्ति आय में, जो निश्चय ही बहुत निचले स्तर (राष्ट्रीय आर्थिक सर्वे 2016 के अनुसार साल 2016 में इसकी प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 26,801 थी, जबकि उत्तर प्रदेश की 38,234 थी; केरल की इससे तीन-चार गुना ज्यादा थी) पर थी, सबसे तेज बढ़ोतरी हुई है। ओडिशा ने, जो कभी भारत में गरीबी के पोस्टर जैसा था, उत्तर प्रदेश और बिहार से तेजी से गरीबी में कमी लाई है। ये राज्य संरचनात्मक बदलाव कर रहे हैं और लगातार ऊंची विकास दर हासिल कर रहे हैं। नीति आयोग के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार ने गरीबी को मात देते हुए गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को, जो 2005 में 54.4 फीसदी थी, घटाकर 2012 में 33.7 फीसदी पर ला दिया है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक, ओडिशा ने अपने यहां यह आंकड़ा 57.2 फीसदी से घटाकर 32.6 फीसदी पर ला दिया है। इसके साथ ही 2010 से 2012 की अवधि में यहां दिहाड़ी कामगारों की मजदूरी में 17 फीसदी का इजाफा हुआ है।

अब बीमारू होना स्थायी बीमारी नहीं है। बेशक उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य अब भी केंद्र से मिलने वाली आर्थिक मदद पर निर्भर हैं, पर राजस्थान ने खुद को इससे उबार लिया है तथा तेजी से आर्थिक तरक्की की है। इस उभार को राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं के परस्पर संपर्क के साथ जोड़कर देखें-काम के सिलसिले में आंतरिक प्रवासन 2011 और 2016 के दौरान दोगुना होकर 90 लाख हो गया (भारतीय रेलवे, 2016 की रिपोर्ट)।

ऐसी अवधारणाएं बनाने में भौगोलिक रूप से भारत के केंद्र और बाहरी किनारों पर स्थित राज्यों की स्थिति पर भी ध्यान नहीं दिया गया। यहां तक कि विकास के मोर्चे पर भी, पिछड़े कहे वाले राज्यों ने, अलग मानकों पर विकास का एक मॉडल पेश किया है। गांवों में शौचालय बनाने में पश्चिम बंगाल की सफलता उल्लेखनीय है। बीते दशक में इसके गांवों में 95 फीसदी घरों में शौचालय निर्माण के पीछे खुले में शौच न करने के लिए सघन जन-जागरूकता अभियान है। इसने सदियों पुराने चलन को खत्म करने वाले इस राज्य को आदर्श बना दिया है। दूसरी तरफ मध्य प्रदेश जैसे राज्य साबित कर रहे हैं कि उद्योग में निवेश के मुकाबले कृषि में निवेश से ज्यादा तेजी से गरीबी कम होती है। हम अक्सर केंद्र में राष्ट्रीय कृषि बजट की बात करते हैं, यह मध्य प्रदेश में एक दशक से एक ऐतिहासिक तथ्य है। मध्य प्रदेश के कृषि मंत्रालय की साल 2016 की रिपोर्ट बताती है कि इस राज्य ने एक दशक में सिंचित भूमि में 3.5 गुना का इजाफा किया है। देवास का माइक्रो-इरिगेशन का मॉडल महाराष्ट्र और राजस्थान के किसान भी अपना रहे हैं।

हम जैसे-जैसे साझा आर्थिक भविष्य की तरफ बढ़ेंगे, हमें निश्चय ही भारत को उत्तर-दक्षिण के ध्रुवों में बांट देनेवाली पुरानी अवधारणाओं से आजाद होना होगा, और व्यापक दृष्टि के साथ नीतिपरक समाधान तथा कारोबारी मॉडल का सहारा लेना होगा, जो हर राज्य में समान रूप से जिला स्तर तक लागू होगा। नीति-निर्माताओं को विकास के मोर्चे पर परंपरागत उपायों से हटकर नए रास्ते तलाशने होंगे, और सोचना होगा कि बुनियादी बदलाव किस तरह लाए जा सकते हैं।

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