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चुनौती का समय: थोक महंगाई 42 माह में सर्वाधिक, पश्चिम एशिया संकट और लंबा खिंचने पर भारत को दबाव झेलना पड़ेगा

Sat, 16 May 2026 05:37 AM IST
Jyoti Bhaskar अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Jyoti Bhaskar Updated Sat, 16 May 2026 05:37 AM IST
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सार
भारत में थोक महंगाई का 42 महीनों के उच्चतम स्तर पर जा चुकी है। पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम भी बढ़े हैं। ईरान और अमेरिका का टकराव 75+ दिन से जारी है। ऐसे में अगर पश्चिम एशिया संकट और लंबा खिंचा तो भारत कई मोर्चों पर दबाव झेलना पड़ेगा।
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Challenging Time Wholesale Inflation max in 42-Months India will Face Pressure if West Asia Crisis Protracts
ईरान की लड़ाई लाई महंगाई - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

पेट्रोल-डीजल की कीमत में बढ़ोतरी, थोक महंगाई का 42 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंचना, डॉलर के मुकाबले रुपये का नए निचले स्तर पर फिसलना और प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देशवासियों से संयम बरतने की अपील करना-ये अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि उस वैश्विक उथल-पुथल के परस्पर जुड़े हुए संकेत हैं, जिसकी जड़ें पश्चिम एशियाई युद्ध में छिपी हैं।



वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई मार्च में 3.88 फीसदी से बढ़कर अप्रैल में 8.3 फीसदी हो चुकी है। यह देखते हुए कि इससे पहले 2022 में यह आंकड़ा आठ के पार गया था, खुदरा स्तर पर कीमतें बढ़ाने के लिए सरकार पर पड़ रहे दबाव को समझा जा सकता है। इससे दो चिंताएं जुड़ी हैं। एक, यह आंकड़ा बाजार की 4.4 फीसदी के आसपास की उम्मीदों से कहीं अधिक है, और दूसरा, अगर थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो फिर उत्पादक इसका बोझ उपभोक्ताओं पर ही डालते हैं। निहितार्थ यह है कि पहले ही खाद्य वस्तुओं की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं और यदि ईंधन महंगा होता रहा, तो परिवहन लागत बढ़ने से दाल, सब्जी, दूध और रोजमर्रा के अन्य सामान महंगे होंगे और आम आदमी की रसोई पर दबाव बढ़ता जाएगा।


रुपये का कमजोर होते जाना इसी संकट की दूसरी अहम कड़ी है। दरअसल, जब भी वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की ओर भागते हैं। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है। चूंकि तेल का भुगतान डॉलर में किया जाता है, इसलिए रुपये की कमजोरी तेल आयात बिल को बढ़ा देती है। इससे एक दुष्चक्र पैदा होता है, जिसमें तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ती है, महंगाई से मुद्रा कमजोर होती है और कमजोर मुद्रा फिर आयात को और महंगा बनाती है।

चिंता की बात यह भी है कि इस वर्ष खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में रुपया एशिया में अव्वल रहा है, जो अब तक करीब छह फीसदी टूट चुका है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा संयम बरतने की सलाह को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जो सिर्फ राजनीतिक अपील नहीं, बल्कि यथार्थ की स्वीकारोक्ति भी है। तथ्य यह है कि अगर पश्चिम एशियाई संकट लंबा खिंचता है, तो भारत को कई मोर्चों पर दबाव झेलना पड़ेगा। अर्थव्यवस्था के लिए निस्संदेह यह चुनौती का समय है, देखना यह है कि यह चुनौती कितनी बड़ी होने वाली है।

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