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बुद्ध जयंती: साझा संस्कृति के प्रतीक हैं बुद्ध, माने जाते हैं भगवान विष्णु के अवतार
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बुद्ध जयंती
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विस्तार
बीती ढाई सहस्राब्दियों से जिस दर्शन की गूंज व्यापक रूप से छाई है, वह बौद्ध दर्शन है। शुरू में यह दार्शनिक प्रस्थान मात्र था, जो धीरे-धीरे धर्म के रूप में परिवर्तित हो गया और अनेक लोग इससे जुड़ते गए। बौद्ध दर्शन चिंतन-मूलक है। जो बुद्ध के चिंतन में आया, वही बौद्ध दर्शन का आधार है। बौद्ध दर्शन के उपदेश में बुद्ध की करुणा ही एकमात्र कारण है। उनके अनुसार सत्य के दो प्रकार हैं— पारमार्थिक एवं सांवृतिक। पारमार्थिक सत्य ही शून्य है और सांवृतिक है संसार का सत्य। जितने भी सांवृतिक सत्य हैं, वे क्षणभंगुर हैं। पारमार्थिक सत्य के साक्षात्कार से ही जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा मिल सकता है। बुद्ध के उपदेशों के अनुसार, पंचशील के अनुष्ठान एवं दार्शनिक ज्ञान के अभ्यास से निर्वाण प्राप्त होता है।
गौतम बुद्ध ने अपने अनुयायियों को कठोरता से पंचशील के पालन की प्रेरणा दी है। उनके मत से पंचशील के पालन से व्यक्ति की आत्मिक उन्नति होती है और वह ज्ञान पाने के योग्य होता है। ये पंचशील हैं—हिंसा न करना, चोरी न करना, व्यभिचार न करना, झूठ न बोलना एवं नशा न करना।
प्राय: लोग धर्मराज के नाम से महाभारत के पांडुपुत्र युधिष्ठिर को जानते हैं। यह अल्पज्ञात है कि गौतम बुद्ध ने स्वयं को 'धर्मराज' कहा है और धर्म-चक्र चलाने वाला माना है। ईसा की कई शताब्दियों पूर्व गौतम बुद्ध ने अपने पहले के लोगों का मत प्रकाशित कर दिया था कि नरक कोई एक स्थान नहीं है, प्रत्युत वह किसी वर्ण के लिए निर्धारित कर्मों के करने की अक्षमता का द्योतक है।
प्राचीन बौद्ध ग्रंथों तथा फाहियान व ह्वेनसांग जैसे पर्यटकों ने गया एवं उरुबिल्ला या उरुबेला (जहां बुद्ध ने छह वर्षों तक कठिन तप किया और उन्हें सम्बोधि प्राप्त हुई थी) में अंतर बताया है, तथापि गयामाहात्म्य ने महाबोधि तरु को तीर्थस्थलों में गिना है और कहा है कि तीर्थयात्रियों को उसकी यात्रा करनी चाहिए और यह बात आज तक मानी जाती है। हिंदुओं और बौद्धों के तीर्थ कब अलग-अलग हो गए, यह कहना कठिन है। बौद्धों की मान्यता है कि बोधिवृक्ष के समीप ही बुद्ध को परम ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह बोधिवृक्ष विश्व का सबसे प्राचीन ऐतिहासिक वृक्ष है। इसकी एक शाखा अशोक द्वारा लंका भेजी गई थी और लंका के कंडी नामक स्थान का पीपल इसी वृक्ष की शाखा या इसका वंशज है।
भारतवर्ष में बौद्ध धर्म का लुप्त हो जाना एक अति विचित्र घटना है। यद्यपि बुद्ध ने वेद एवं ब्राह्मणों के आधिपत्य को न माना, न ही व्यक्तिगत आत्मा एवं परमात्मा के अस्तित्व में विश्वास किया, किंतु उन्होंने कर्म एवं पुनर्जन्म तथा विरक्ति एवं इच्छारहित होने पर संस्कारों से छुटकारा पाने के सिद्धांतों में विश्वास किया। कश्मीरी संस्कृत कवि क्षेमेंद्र द्वारा 1166 ईस्वी में लिखे दशावतार-चरित में एवं जयदेव द्वारा 1180 ईस्वी में लिखे गीतगोविंद में बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया है। 10वीं सदी में बुद्ध सारे भारतवर्ष में विष्णु के अवतार के रूप में विख्यात हो चुके थे।
बौद्धों में अंत्येष्टि-क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरनेवाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बानसुत्त में बौद्ध धर्म के महान प्रस्थापक की अंत्येष्टि-क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है। राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रंथों एवं जन्म-गाथाओं में अंत्येष्टि का वर्णन मिलता है, किंतु कहीं भी प्रचलित धार्मिक-क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जाता है कि बौद्ध अंत्येष्टि-क्रिया यद्यपि सरल है, तथापि वह वैदिक आश्वलायन—गृह्यसूत्र से बहुत मिलती-जुलती है।
महापरिनिब्बानसुत्त के अनुसार, बौद्धों के चार तीर्थ-स्थल हैं— लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनारा (कुशीनगर)। ये भगवान बुद्ध के जन्म-स्थान, सम्बोधि-स्थल, धर्मचक्र-प्रवर्तन-स्थल एवं निर्वाण स्थल हैं। गौतम बुद्ध ने गया में सम्बोधि प्राप्त करने के उपरांत वाराणसी के मृगदाव अर्थात सारनाथ में आकर धर्मचक्र प्रवर्तन किया।