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पड़ोस: सुनियोजित है बांग्लादेश का भारत विरोध, बेमानी है इस माहौल में अधिक उम्मीद
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बांग्लादेश में भारत विरोध की तस्वीर
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
यह मामला पिछले साल अगस्त में शुरू हुआ, जब बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना जान बचाकर भारत आ गईं। इसके बाद बांग्लादेश में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। मौत की सजा का ऐलान होने के तुरंत बाद ही, यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने भारत पर हसीना को वापस भेजने का दबाव बनाना शुरू किया, ताकि वह बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के फैसले का सामना कर सकें। जब यह साफ हो गया कि भारत हसीना को वापस नहीं भेजेगा और यूनुस व उसके इस्लामी समर्थकों की बात नहीं मानेगा, तो कट्टरपंथी लोग सड़कों पर उतर आए और हसीना को शरण देने के लिए भारत पर दोष मढ़ने लगे।
ठीक इसी बीच, बांग्लादेश राइफल्स में 2009 के विद्रोह की जांच करने वाले आयोग की रिपोर्ट जारी हुई। रिपोर्ट में विद्रोह के लिए अवामी लीग सरकार को दोषी ठहराया गया और इसमें भारत का हाथ होने की बात भी कही गई। हालांकि, ऐसा होने का अंदेशा तभी हो गया था, जब यूनुस सरकार ने बांग्लादेश राइफल्स विद्रोह में संलिप्तता के आरोप में सजा काट रहे 178 सीमा रक्षक सैनिकों को जेल से रिहा कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप सेना के 57 कमांडरों सहित 74 लोगों की हत्या हुई थी। गौरतलब है कि अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली तत्कालीन अवामी लीग सरकार ने मुकदमे चलाकर सैकड़ों सीमा रक्षकों को दंडित किया था। इनमें 139 बीडीआर सैनिकों को सजा-ए-मौत, 146 को आजीवन कारावास और 256 को तीन से 10 साल तक के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
यूनुस द्वारा बनाए गए जांच आयोग की अगुवाई बांग्लादेश राइफल्स के पूर्व प्रमुख मेजर-जनरल फजलुर रहमान ने की थी। फजलुर वही अधिकारी हैं, जिन्होंने 2001 में अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के साथ कई खूनी मुठभेड़ें भड़काई थीं। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2009 के इस नरसंहार का सबसे बड़ा फायदा भारत को हुआ। रिपोर्ट में भारतीय संलिप्तता के सबूत होने का दावा भी किया गया है और कहा गया कि नई दिल्ली के पास बांग्लादेश को अस्थिर करने के मकसद थे। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय विशेष सैन्य बलों ने चुपचाप बांग्लादेश की सीमा में घुसपैठ की और हत्याओं में सीधे तौर पर हिस्सा लिया। रिपोर्ट में शेख हसीना पर विद्रोह को हरी झंडी देने का आरोप लगाया गया है।
अब यह बात तर्क से परे है कि नई बनी अवामी लीग सरकार सत्ता संभालने के 50 दिनों के भीतर ही अपनी ही सीमा सुरक्षा बलों में विद्रोह कराएगी, जिससे गृहयुद्ध छिड़ने का खतरा पैदा हो सकता था। असल में, स्वतंत्र बांग्लादेश के इतिहास में अवामी लीग खुद ऐसे खतरनाक नरसंहारों का शिकार रही है। 1975 में हुए नरसंहार में पार्टी के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान और उनके लगभग पूरे परिवार की हत्या कर दी गई थी। बाद में पार्टी के चार शीर्ष नेताओं को भी मार दिया गया था। इसके बाद 2004 में ग्रेनेड हमले में शेख हसीना तो बाल-बाल बच गईं, लेकिन पार्टी के करीब 30 नेता और कार्यकर्ता मारे गए थे।
बांग्लादेश राइफल्स की जांच आयोग की रिपोर्ट ने भारत विरोधी बयानबाजी को हवा देने का काम किया, जिसने अब इंकलाब मंच के अध्यक्ष उस्मान हादी की हत्या के बाद हिंसक रूप ले लिया है। हादी पिछले साल जुलाई-अगस्त के उस आंदोलन में मुखर थे, जिसने हसीना की सरकार गिरा दी थी। हाल ही में, हादी ने उस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल किया था, जहां से आमतौर पर बीएनपी के दिग्गज नेता मिर्जा अब्बास सांसद चुने जाते रहे हैं। इसलिए यूनुस और जमात-ए-इस्लामी में उनके समर्थक हादी की हत्या का इस्तेमाल एकसाथ अवामी लीग व भारत और बीएनपी नेता मिर्जा अब्बास, दोनों पर हमला करने के लिए कर सकते हैं। यूनुस के छात्र-युवा संगठन और जमात-ए-इस्लामी ने ठीक यही किया। अब्बास को परेशान किया गया, जिसके बाद उन्हें अपना घर खाली करना पड़ा। वहीं, अवामी लीग के नेताओं, जैसे मोहिबुल हसन चौधरी नौफेल, के घरों में तोड़फोड़ की गई।
इसी बीच, पूरे बांग्लादेश में भारतीय दूतावासों और वीजा केंद्रों पर हमले किए गए। यूनुस के एक पूर्व सलाहकार, सरजिस आलम ने तो यह भी सुझाव दिया कि जब तक ‘भारत उस्मान हादी के हत्यारे को वापस नहीं सौंप देता’, तब तक भारत के राजनयिक मिशन बंद कर दिए जाने चाहिए। यह सुनियोजित भारत-विरोधी माहौल आगामी 12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनावों से पहले जमात-ए-इस्लामी और छोटी इस्लामी पार्टियों को सड़कों पर उतरकर राजनीतिक समर्थन जुटाने में मदद करने के मकसद से बनाया जा रहा है।
जमात-ए-इस्लामी के लिए, जो पिछले पचास साल से बांग्लादेश की राजनीति के हाशिये पर रही है, क्योंकि 1971 के मुक्ति युद्ध के दौरान उस पर पाकिस्तानी नरसंहार में शामिल होने के आरोप लगे थे, भारत-विरोध ही सत्ता तक पहुंचने का लगभग एकमात्र राजनीतिक हथियार बन गया है। इसी साल की शुरुआत में जमात-ए-इस्लामी के एक नेता, मोहम्मद ताहिर, ने अमेरिका दौरे के दौरान न्यूयॉर्क में एक सार्वजनिक भाषण में, मोहम्मद यूनुस की मौजूदगी में, भारत के खिलाफ 50 लाख समर्थकों के साथ जिहाद की धमकी तक दे दी थी।
अवामी लीग पर प्रतिबंध लगने और बीएनपी की स्थिति सुधारने की बेताब कोशिशों के बीच, जमात-ए-इस्लामी के नेताओं को लगता है कि सत्ता हासिल करने का यह उनके लिए सबसे अच्छा मौका है। हिंसा उनके लिए दोनों ही हालात में फायदेमंद साबित होती है। अगर हालात बिगड़ जाते हैं और संसद चुनाव टालने पड़ते हैं, तो जमात-ए-इस्लामी यूनुस प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाए रखेगी और इस देरी का इस्तेमाल अपनी ताकत और बढ़ाने के लिए करेगी। लेकिन अगर फरवरी में तय समय पर चुनाव होते हैं, तो यह हिंसा उनके दबदबे को कायम रखते हुए, चुनाव में उनकी आसान जीत का मार्ग प्रशस्त करेगी।
भारत के लिए इस्लामी शासन की आशंका बेहद चिंताजनक है। इसी वजह से विदेश मामलों की संसदीय समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, वह 1971 के मुक्ति युद्ध के बाद से भारत के सामने सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है। फिलहाल की स्थितियों में भारत के पास पूरब में विकल्प खत्म होते दिख रहे हैं।