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सवाल: लोकतंत्र से दूर जाता बांग्लादेश, सेना की नाराजगी के बीच कितना विश्वसनीय युनूस का चुनावी दावा

Wed, 18 Jun 2025 07:45 AM IST
Anand Kumar आनंद कुमार
Updated Wed, 18 Jun 2025 07:45 AM IST
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सार
यूनुस की सरकार यह दावा कर रही है कि वह बांग्लादेश के इतिहास का सबसे ‘निष्पक्ष’ चुनाव कराएगी। परंतु जब देश की सबसे प्रमुख पार्टी चुनाव से बाहर हो, जब राजनीतिक हिंसा चरम पर हो, जब सेना नाराज हो और चुनाव की तिथि भी एक साल आगे खिसका दी गई हो, तो इस दावे की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है।
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Bangladesh is moving away from democracy, how credible is Muhammad Yunus' election claim amid army displeasure
मोहम्मद यूनुस, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार - फोटो : X @ChiefAdviserGoB

विस्तार

बांग्लादेश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति अत्यंत जटिल और अस्थिर होती जा रही है, और इसके केंद्र में हैं अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस। हाल ही में उन्होंने 2026 की अप्रैल के पहले भाग में आम चुनाव करवाने की घोषणा की है। हालांकि, यह घोषणा लोकतंत्र की दिशा में एक कदम के रूप में प्रस्तुत की गई है, लेकिन वस्तुस्थिति इससे कहीं अधिक चिंताजनक है। यूनुस की सरकार ने देश की सबसे पुरानी और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी राजनीतिक पार्टी, अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और चुनाव की वैधता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।



अवामी लीग बांग्लादेश की राजनीति में केवल एक पार्टी नहीं है, यह उस ऐतिहासिक आंदोलन का प्रतीक है, जिसके बल पर बांग्लादेश को स्वतंत्रता मिली। इसके बिना कोई भी राष्ट्रीय चुनाव न केवल अपूर्ण होगा, बल्कि उसकी वैधता भी संदेह के घेरे में आ जाएगी। यूनुस द्वारा घोषित चुनाव प्रक्रिया अगर इस पार्टी को बाहर रखकर कराई जाती है, तो यह निष्पक्ष और समावेशी नहीं मानी जा सकती। इससे राजनीतिक संकट और गहराएगा और देश में स्थायित्व के बजाय और अधिक अराजकता फैल सकती है। मोहम्मद यूनुस सात अगस्त, 2024 को अंतरिम सरकार के नेता बने, जब छात्रों के नेतृत्व में हुए जनांदोलन ने प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से बाहर कर दिया। उस समय व्यापक हिंसा हुई, जिसमें सुरक्षा बलों द्वारा 300 से अधिक लोगों की हत्या कर दी गई थी।


इस आंदोलन की शुरुआत सरकारी नौकरियों में 1971 के स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को आरक्षण देने के खिलाफ हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन व्यापक राजनीतिक असंतोष का रूप ले बैठा। शेख हसीना के भारत भागकर आने के बाद यूनुस की अगुवाई में अंतरिम सरकार ने सुधार, न्याय और चुनाव को अपना मुख्य एजेंडा बताया। परंतु जिस तरह से यूनुस की सरकार ने अवामी लीग को प्रतिबंधित किया है, उससे उसकी मंशा पर सवाल उठते हैं। उसने यह कदम मई 2025 में उठाया। इसके लिए ‘एंटी-टेररिज्म एक्ट‘ और ‘इंटरनेशनल क्राइम्स टि्रब्यूनल एक्ट’ का सहारा लिया गया। पार्टी को 2024 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और लगभग 1,400 लोगों की मृत्यु के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराया गया। यह एक अत्यंत कठोर और विवादास्पद निर्णय है, क्योंकि यह पूरी पार्टी को एक ही ब्रश से रंग देता है, जबकि लोकतंत्र में सामूहिक दंड की अवधारणा स्वीकार्य नहीं है।

बांग्लादेश की राजनीति में इस समय एक नई ताकत उभर रही है-नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी), जिसे छात्र आंदोलन से बल मिला है। परंतु एनसीपी की अंतरिम सरकार के प्रति नजदीकी और अवामी लीग के खिलाफ उसके आंदोलनों के कारण इसे ‘राजा की पार्टी’ कहा जाने लगा है। इससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में असंतुलन पैदा हुआ है और राजनीतिक हिंसा भी तेज हुई है। एनसीपी और बीएनपी समर्थकों के बीच हुए टकरावों में अब तक 70 से 80 लोगों की जान जा चुकी है।

इस अस्थिरता के बीच बांग्लादेश की सेना भी अपना धैर्य खोती दिख रही है। सेना प्रमुख वकार-उज-जमान ने दिसंबर, 2025 तक चुनाव कराने की सार्वजनिक मांग रखी है और यूनुस पर सेना के मामलों में हस्तक्षेप और चुनावों में देरी करने का आरोप लगाया है। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि यूनुस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन नहीं करते, तो सेना खुद आपातकाल घोषित कर चुनाव करा सकती है। यह बयान स्पष्ट चेतावनी है कि अगर यूनुस का रवैया नहीं बदला, तो सैन्य हस्तक्षेप संभव है।

विदेश नीति के मोर्चे पर भी यूनुस की टिप्पणियां विवादित रही हैं। चीन यात्रा के दौरान उनके बयान, कि पूर्वोत्तर भारत ‘लैंडलॉक्ड’ है और बांग्लादेश ‘ओशन गार्डियन’ बन सकता है, ने भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव पैदा किया है। इससे न केवल भारत असहज हुआ है, बल्कि बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में भी उनके इरादों पर सवाल खड़े हो गए हैं। विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अंतरिम सरकार को तटस्थ और संयमित रहना चाहिए था, विशेषकर जब उनकी भूमिका केवल चुनाव कराने और सत्ता हस्तांतरण तक सीमित होनी चाहिए।

यूनुस की सरकार यह दावा कर रही है कि वह बांग्लादेश के इतिहास का सबसे ‘स्वच्छ, निष्पक्ष और प्रतिनिधित्वकारी’ चुनाव कराएगी। परंतु जब देश की सबसे प्रमुख पार्टी चुनाव से बाहर हो, जब राजनीतिक हिंसा चरम पर हो, जब सेना नाराज हो और चुनाव की तिथि भी एक साल आगे खिसका दी गई हो, तो इस दावे की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है। अवामी लीग को अपराधी ठहराने और प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया भी न्यायिक से अधिक राजनीतिक प्रतीत होती है, खासकर जब इसी बीच जमात-ए-इस्लामी पर से प्रतिबंध हटा लिया गया है।

इसके अतिरिक्त, चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर भी संदेह उठ रहे हैं। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग को बीएनपी-झुकाव वाला बताया है और उसकी संरचना में बदलाव करने की मांग की है। साथ ही, अप्रैल 2026 में चुनाव कराने का प्रस्ताव भी अव्यावहारिक लगता है, क्योंकि उस समय स्कूल की परीक्षाएं होती हैं, प्री-मानसून तूफानों का खतरा होता है और चुनाव के लिए आवश्यक प्रशासनिक सहयोग नहीं मिल पाता। बांग्लादेश में पारंपरिक रूप से दिसंबर में चुनाव कराए जाते रहे हैं, और वही तिथि उपयुक्त मानी जाती है।

अगर बांग्लादेश को राजनीतिक स्थिरता और लोकतंत्र की बहाली की दिशा में आगे बढ़ना है, तो यूनुस को अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव लाना होगा। अवामी लीग को चुनाव प्रक्रिया में वापस लाना ही एकमात्र रास्ता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि अगली सरकार को व्यापक जन समर्थन प्राप्त हो। अन्यथा, यह चुनाव न तो जनादेश को प्रतिबिंबित करेगा, न ही देश में स्थायित्व लाएगा। बांग्लादेश पहले ही गहरे संकट में है-अब समय है कि अंतरिम सरकार राजनीतिक संवाद को फिर से शुरू करे, सभी पक्षों को शामिल करे और अपने वादों को निभाए। अन्यथा देश एक बार फिर अराजकता के गर्त में चला जाएगा, जहां से उबरना कठिन होगा। 

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