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वह लिखो, जिसके विशेषज्ञ कहलाओ
Sat, 30 May 2026 08:32 AM IST
Pavan
बनारसीदास चतुर्वेदी
बनारसीदास चतुर्वेदी
Published by: Pavan
Updated Sat, 30 May 2026 08:32 AM IST
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सार
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रामानंद चट्टोपाध्याय की पॉलिटिकल मैगजीन (1934)
- फोटो :
अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
1912 में मेरा प्रथम लेख ‘स्वावलंबन’ नवजीवन में छपा था। नवजीवन अखबार केशवदेव जी शास्त्री बनारस से निकालते थे। उन्हें लोग बिल्कुल भूल चुके हैं। अच्छे संपादक थे। स्वामी सत्यदेव ने अपनी जीवनी में उनका जिक्र किया है। क्रांतिकारी मूवमेंट में पहले रहे थे। वह छोड़-छाड़ के बनारस पहुंच गए थे। लेकिन जिसे पत्रकारिता का प्रारंभ कहना चाहिए, वह मेरा ‘फिजी द्वीप में 21 वर्ष’ से ही हुआ। मैंने दिन-रात प्रवासी भारतीयों की चिंता करनी शुरू की और पूरे 22 बरस उन्हीं के काम में लगा रहा और क्योंकि इस विषय पर लिखने वाले थोड़े थे, इस काम ने अलग पहचान दी।‘एक आदमी ने किसी अनुभवी पत्रकार से पूछा था कि पत्रकारिता में प्रवेश कैसे किया जाए? उन्होंने कहा-किसी विशेष अध्ययन द्वारा! अगर तुम आलुओं में इंट्रेस्टेड हो, तो आलुओं के बारे में इतना लिखो कि जब आलू महत्वपूर्ण हों, तो तुम महत्वपूर्ण हो जाओ। तो प्रवासी भारतीयों का कॉज मेरे लिए अत्यंत फलदायक सिद्ध हुआ। मैं लीडर में लेख लिखने लगा। सी वाई चिंतामणि बड़े प्रोत्साहन देने वाले आदमी थे। उन्होंने मेरी पुस्तक प्रवासी भारतवासी पर लीडिंग आर्टिकल लिखा था। 6 रुपये कॉलम मुझे लीडर से मिलता था और 6 कॉलम तक छापने की हमारे लिए अनुमति थी, तो 36 रुपये की आमदनी उन दिनों अच्छी मानी जा सकती थी, जो मुझको लीडर से होती थी।
इसी तरह गणेश शंकर विद्यार्थी ने बहुत से लेख छापे थे। मुझे लिखा था कि-‘दूसरों के लिए अखबार के पारिश्रमिक की रेट यही है, लेकिन तुम्हारे लिए कोई नियम नहीं है।’ असल में बात यह थी कि मेरी साहित्यिक रचनाएं कम प्रकाश में आई थीं। पहले मैंने केशवचंद्र सेन की बायोग्राफी लिखी थी। रानाडे की बायोग्राफी लिखी, फिजी द्वीप में 21 वर्ष लिखी थी, प्रवासी भारतवासी आउट ऑफ डेट हो चुकी थी। तो मेरे बारे में यह बात मशहूर थी कि ये प्रोपेगेंडिस्ट हैं। लेकिन जब ज्ञानपीठ ने रेखाचित्र, संस्मरण और हमारे आराध्य छापे, तब लोगों को ख्याल हुआ कि यह क्रिएटिव आर्टिस्ट भी कुछ हैं।
जब आगरे में पढ़ता था, 1910 में, तो मैं पं. सुंदरलाल जी का भविष्य का कर्मयोगी अखबार, पढ़ता था। उन्होंने ही मुझको विशाल भारत में भिजवाया था। दस बरस जो विशाल भारत में बीते, वे क्रिएटिव लिटरेरी काम की वजह से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। पं. सुंदरलाल जी बहुत ही अच्छे एडिटर थे। गणेशशंकर विद्यार्थी भी उनको गुरुतुल्य मानते थे। रामानंद बाबू (चट्टोपाध्याय) अपने अधीनस्थों को बहुत फ्रीडम देते थे। यही फ्रीडम शिवप्रसाद गुप्त ने पराड़करजी को दे रखी थी। रामानंद बाबू से हिंदू महासभा वाले मिलने गए, उन्होंने कहा कि, ‘देखिए आपके अखबार में-आप हिंदू सभा के प्रेसिडेंट हैं और हमारे खिलाफ छपता है।'
उन्होंने कहा - ‘भई जितनी फ्रीडम मैं खुद लेता हूं, उतनी ही पंडितजी को देता हूं।' पराड़कर जी प्रोत्साहन देने में कुशल थे। नागपुर कांग्रेस में मैं जाना चाहता था, पर मेरे पास पैसे का इंतजाम नहीं था। उन्होंने कहा, ‘ऐसा करो कि तुम कुछ लेख लिख दो, तो उसकी रॉयल्टी के रूप में मैं तुमको पैसे दे दूंगा।' उन्होंने 51 रुपये मुझको दिए, तो मैं नागपुर कांग्रेस देख सका। उनके जो मालिक थे शिवप्रसाद गुप्त, उनके व्यूज के खिलाफ भी लिखने का उनको बराबर साहस होता था। और गर्दे जी तो साथ में रहे थे हमारे। एक चीज मेरी समझ में नहीं आ रही है कि वह गंभीरता जो पराड़कर जी में या गर्दे जी में या गणेश जी में, नवीन जी इत्यादि में थी, वह अब लापता हो गई है। और छिछली चीजें छापने के लिए लोग उत्सुक रहते हैं। (‘बनारसीदास : समय के दर्पण में’ से संपादित अंश, प्रस्तुति : उमेश चतुर्वेदी)