जोश और होश का संतुलन
सिक्किम से लगा हुआ भूटान के दोकलम का पठारी क्षेत्र भारत, भूटान और चीन बीच खंजर की आकृति वाला एक त्रिकोण है, जिसकी नोक उस पतले गलियारे पर तनी हुई लगती है, जिससे गुजरने वाली सड़कें सारे देश को पूर्वोत्तर के राज्यों से जोडती हैं। भारत की सीमा के अंदर न होते हुए भी यह जगह चीन और भारत के बीच विवाद का कारण बन गई है। भूटान इस क्षेत्र में चीन द्वारा सड़क निर्माण को अपनी भूमि पर अतिक्रमण मानता है। भूटान के साथ सैनिक संधि के अंतर्गत उसे विदेशी आक्रमण या अतिक्रमण से बचाने की जिम्मेदारी भारत की है। इसी जिम्मेदारी को निभाते हुए और चीन द्वारा वहां सड़क बनाए जाने से भारतीय क्षेत्र में चुम्बी घाटी पर आसन्न संकट को समझते हुए, भारतीय सेना ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। पर पिछले महीने भारतीय सेना के बंकरों को चीनी थलसेना ने नष्ट कर दिया। चीन के अनुसार, यह भूभाग भूटान का है ही नहीं और भारत वहां जबर्दस्ती घुसकर पंचशील के सिद्धांतों की अवहेलना कर रहा है। भारतीय सैनिक वहां तंबू गाड़कर बैठ गए हैं, तो चीन ने जम्मू-कश्मीर में हस्तक्षेप करने की धमकी दी है। चीन का लक्ष्य दोकलम की जमीन नहीं, भारत की प्रतिष्ठा है। चीन की असली मंशा समझ कर ही भारत को अगला कदम उठाना चाहिए।
भारत और चीन, दोनों कह रहे हैं कि वे 1962 की तुलना में बहुत अधिक शक्तिशाली बन चुके हैं। ये दावे गलत नहीं हैं। चीन सैनिक और आर्थिक दृष्टि से विश्व के सबसे ताकतवर देशों में एक है, तो भारत भी आर्थिक रूप से उभरती हुई महाशक्ति है। चीन की सेना विश्व की सबसे बड़ी सेना है, तो भारत दूसरे स्थान पर है। भारतीय वायुसेना और नौसेना भी अब सशक्त बन चुकी हैं। दोनों परमाणु ताकतें हैं। चीन वियतनाम युद्ध के बाद से जमीनी जंग से दूर रहा है, पर भारतीय सैनिक पाकिस्तान से दो बार युद्ध जीत चुके हैं और कारगिल में उसके दांत खट्टे कर चुके हैं। पर दोनों ही देश सीमा विवाद को बड़ी लड़ाई में बदल जाने का खतरा नहीं मोल ले सकते। अमेरिका और इस्राइल से नवीनतम सैन्य सामग्री मिल जाने के बाद भारतीय सैन्य शक्ति में जबर्दस्त इजाफा होगा, पर उसमें अभी समय लगेगा। भविष्य में मिलने वाली सैन्य मदद से हमारा मनोबल बढ़े, यह तो ठीक है, पर आत्मविश्वास की अति ठीक नहीं। हमारी पूर्वोत्तर सीमा पर सड़कें बनाने का काम रक्षा और पर्यावरण मंत्रालयों के बीच खींचतान की बलि चढ़ता रहा, उधर चीन ने ल्हासा तक रेलवे लाइन बिछा ली। चीन के क्षेत्र में अच्छी और हर मौसम के लिए सुगम सड़कों का जाल है। भारतीय वायुसेना में सी 130 हरक्युलिस और बोईंग सी 17 ग्लोबमास्टर जैसे भारी परिवहन और छोटी हवाई पट्टियों पर उतरने योग्य विमानों के शामिल होने से हमारी सेना की सचलता बढ़ी है, लेकिन चीन का पलड़ा भारी बैठता है।
पर युद्ध से बचने के लिए हम भूटान के प्रति अपना उत्तरदायित्व कैसे भूल सकते हैं? बस इतना जरूरी है कि हम जोश में होश न खो बैठें और डोकलम का समाधान खोजने का प्रयत्न करें। यह भारतीय कूटनीति और विदेश नीति की अग्नि परीक्षा का समय है। इसकी सफलता के लिए आवश्यक है कि इस मुद्दे को जनता में उछाल कर जोश से न जोड़ा जाए और देश का राजनीतिक नेतृत्व होश में रहकर कूटनीतिक समाधान खोजने में जुटा रहे।
-लेखक सेवानिवृत्त विंग कमांडर हैं