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गन्ना किसानों से सौतेला व्यवहार

Tue, 14 Nov 2017 06:26 PM IST
महक सिंह
महक सिंह Updated Tue, 14 Nov 2017 06:26 PM IST
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Bad Deal with sugercane farmer
महक सिंह

उत्तर प्रदेश सरकार ने गन्ना मूल्य में पिछले वर्ष के मुकाबले 10 रुपये (3.1 प्रतिशत) की मामूली बढ़ोतरी की है। सामान्य, अगेती और अनुपयुक्त प्रजातियों के लिए क्रमशः 315, 325 और 310 रुपये प्रति क्विंटल गन्ना मूल्य घोषित किया है। केंद्र सरकार द्वारा भी पिछले वर्ष के उचित एवं लाभकारी मूल्य एफआरपी को 255 रुपये प्रति क्विंटल यथावत रखा गया है। पेराई सत्र आंशिक रूप से प्रारंभ हो चुका है। किसानों को अपने आवश्यक खर्चों और गेहूं की बुआई के लिए समय से खेत खाली करने होते हैं। इसलिए उसे अपना गन्ना बहुत कम दामों पर कोल्हू और क्रेशरों पर बेचना पड़ रहा है।


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यह स्थिति तब है, जब पिछले पेराई सत्र के मुकाबले चीनी के अधिक दाम मिल रहे हैं और चीनी रिकवरी बढ़कर 10.63 प्रतिशत हो गई है। ऐसे में, गन्ना मूल्य में मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि नाकाफी ही नहीं, प्रदेश के 50 लाख गन्ना किसानों के साथ क्रूर मजाक है। किसान गन्ना जलाकर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका दर्द कोई महसूस नहीं कर रहा। प्रायः हर वर्ष किसानों को लाभकारी गन्ना मूल्य, मिलों को समय से चलाने और पिछले वर्ष के गन्ना मूल्य के बकाया भुगतान के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। इसके बावजूद केंद्र तथा उत्तर प्रदेश सरकारों व चीनी मिल मालिकों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। भाजपा चुनाव घोषणा पत्र और चुनाव प्रचार में गन्ना किसानों को लागत का डेढ़ गुना देने का वायदा करती है, पर मिल मालिकों के सामने बेबस हो जाती है।

सरकारों द्वारा चीनी उद्योग को हजारों करोड़ का राहत पैकेज देने के बावजूद गन्ना किसानों को लागत से भी कम मूल्य दिया गया है। प्रदेश सरकार के वायदे के बावजूद कुछ चीनी मिलें अब भी किसानों का 1,086 करोड़ रुपये दबाए बैठी हैं, जिस पर 343.73 करोड़ ब्याज भी देय है। सरकार द्वारा की गई तथाकथित वसूली प्रमाण पत्र और आरसी आदि की कार्रवाइयां प्रभावहीन हो गई हैं। किसान अपनी जमीन व सामान बेचने को मजबूर हैं और कई किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

लागत के लगातार बढ़ने से गन्ने की खेती घाटे का सौदा हो गई है। 2017-18 के पेराई सीजन के लिए कृषि एवं लागत मूल्य के मानकों के अनुसार, गन्ने का प्रति क्विंटल उत्पादन मूल्य 415 रुपये हो गया है। इस साल के लिए गन्ना शोध संस्थान, शाहजहांपुर ने गन्ने के उत्पादन लागत का आकलन 289 रुपये किया है, जो बिल्कुल आधारहीन है। इसमें मजदूरी की लागत मनरेगा के आधार पर लगाई गई है, जो वास्तविक मजदूरी से कम है।

पेट्रोलियम कंपनियों को एथेनॉल सस्ते मूल्य पर दिया जाता है, शराब निर्माताओं को शीरा एक चौथाई मूल्य पर बेचा जाता है, खाद्य सुरक्षा के नाम पर सस्ती चीनी दी जाती है, सरकारी कर्मचारियों, विधायकों, सांसदों को बेतहाशा वेतन वृद्धि तथा कॉरपोरेट घरानों को लाखों-करोड़ों की छूट दी जाती है। घाटे की खेती करते गन्ना किसानों की क्षतिपूर्ति के लिए बोनस, चीनी मिलों की तरह ब्याज मुक्त ऋण और उत्पादन लागत से अधिक मूल्य क्यों नहीं दिया जा रहा? 14 दिन में भुगतान न करने पर भी चीनी मिलों को ब्याज क्यों माफ किया जा रहा है? सूबे के किसानों ने पिछले दो वर्षों से देश में सर्वाधिक चीनी उत्पादन किया है और देश को चीनी उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया है। फिर भी यदि किसानों की अनदेखी होती रही, तो किसान गन्ने की खेती से विमुख हो जाएंगे। वर्ष 2021 तक किसानों की आय दोगुनी करने का क्या यही फार्मूला है? 

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