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बच्चों के हाथों में हथियार
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क्षमा शर्मा
हमारा सपना है कि यह दुनिया बंदूक से मुक्त हो। यह नारा इन दिनों अमेरिका में जगह-जगह गूंज रहा है। इसे लगाने वाले किशोर ज्यादा हैं। वाशिगंटन डी सी, लास एंजिलस, न्यूयॉर्क आदि अनेक शहरों में बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए हैं। देखने वालों का कहना है कि इतने बड़े प्रदर्शन वियतनाम युद्ध के दिनों के प्रदर्शनों की याद दिलाते हैं। इन प्रदर्शनों में वे भी शामिल हुए, जो पार्कलैंड फ्लोरिडा में हुए बंदूकों के हमलों से बच गए। अमेरिका के लोगों का कहना है कि हथियारों के इस विरोध को हम घर-घर ले जाएंगे। और उन्हें चुनेंगे जो हथियारों पर पाबंदी लगा सकें, क्योंकि हर बार जिन्हें हम चुनते हैं, वे हमें नहीं बचाते।
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अफसोस यह है कि स्कूलों के अंदर इस तरह की हिंसा बढ़ती जा रही है। हर सरकार चाहे वह किसी भी दल की रही हो इस तरह की हिंसा को रोकने में नाकामयाब रही है। स्कूलों में फायर अलार्म्स का बजना डराता है। इन प्रदर्शनों में नौ –नौ साल छोटे बच्चों ने भी भाग लिया। मार्टिन लूथर किंग जूनियर की नौ साल की पोती योलांडा रीनी किंग ने कहा कि बहुत हो चुका। मेरा सपना है कि यह दुनिया बंदूकों से मुक्त होनी चाहिए। इस प्रदर्शन में अभिनेता जॉर्ज क्लूनी, मीडिया की बड़ी हस्ती ओपरा विनफ्रे, मशहूर निर्देशक स्पीलबर्ग और अनेक जाने-माने लोगों ने भी भाग लिया।
अमेरिका में हथियार बनाने वाली और उन्हें समर्थन देने वाली लाॅबी इतनी तगड़ी है कि सरकारें भी उसके सामने बेबस नजर आती हैं। अमेरिका में हालत यह है कि बच्चे अपने बस्ते में रिवाल्वर ले जाते हैं और चाहे जब अपने साथियों पर हमला बोल देते हैं। इसी साल फरवरी में पार्कलैंड, फ्लोरिडा के स्कूल में उन्नीस साल के निकोलस क्रूज ने चौदह बच्चों को मार दिया था। इसमें तीन और लोग भी मारे गए थे।
स्कूलों में इस तरह से होने वाली हिंसा बेहद डरावनी है। अमेरिका में माता-पिता भी अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर चिंता प्रकट करते रहते हैं। लेकिन सरकारें और राजनीतिक दल शोक प्रकट करने के अलावा इस तरफ से अक्सर आंखें मूंदे रहते हैं। भारत में भी स्कूली हिंसा उठान पर है। हालांकि अपने यहां अमेरिका की तरह अक्सर इस तरह बच्चे हथियार लेकर तो स्कूलों में नहीं जाते, मगर हिंसा बढ़ती ही जा रही है। कितने ऐसे किस्से रोज सुनाई देते हैं कि अपने ही साथ पढ़ने वाले किसी लड़के –लड़की को बेहद मामूली बातों पर उसके सहपाठी या दोस्त मार देते हैं। गुरुग्राम में एक बच्चे को उसी के स्कूल में पढ़ने वाले किशोर ने इसलिए मार दिया कि इम्तिहानों को टलवाया जा सके। एक और लड़की ने दूसरे बच्चे के साथ ऐसा ही करने की कोशिश की।
तकनीक ने जहां बच्चों को दुनिया से जोड़ा है, ज्ञान के दरवाजे उनके लिए खोले हैं, वहीं उन्हें हिंसा और विशेष तौर से यौन हिंसा का पाठ भी पढ़ाया है। बड़ी संख्या में बच्चे पोर्न और ऐसी साइट्स देखते हैं, जो उन्हें यौन अपराधों के लिए प्रेरित करती हैं। मुंबई में एक नौ साल के बच्चे ने एक छोटी बच्ची के साथ दुष्कर्म किया था। उसे शायद अपने अपराध का अर्थ भी मालूम न होगा। बच्चे बच्चों के प्रति इस तरह की मारामारी और हिंसा क्यों करते हैं, इस पर कोई गहन अध्ययन भी नहीं किया जाता। अमेरिका में बच्चे और किशोर जिस तरह की चिंता व्यक्त कर रहे हैं, कम से कम हम बड़े तो इससे चेत ही सकते हैं, क्योंकि अपने यहां लाइसेंस शुदा हथियार न भी हों, देसी कट्टे और बंदूकें भारी मात्रा में पाई जाती हैं।