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न्याय व्यवस्था: मध्यस्थता कानून से कम होगा बोझ, सुनवाई में समय और खर्च की भी होगी बचत

Fri, 17 Feb 2023 06:58 AM IST
Satish Upadhyay सतीश उपाध्याय
Updated Fri, 17 Feb 2023 06:58 AM IST
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सार
इस पहल से बड़ी संख्या में विचाराधीन मुकदमों का बोझ कम हो सकेगा, वहीं इसकी सुनवाई में समय और खर्च की भी बचत होगी।
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arbitration law to reduce burden of cases over Indian Judiciary
(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

देश की अदालतों में लगभग 4.90 करोड़ मुकदमे विचाराधीन हैं, वहीं निरंतर बड़ी संख्या में नए मुकदमे भी दर्ज होते जा रहे हैं। मुकदमों की संख्या कम करने के लिए 'मध्यस्थता अधिकरण' की व्यवस्था की गई, जिसके तहत प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के द्वारा विवादों को शीघ्र निराकरण की पहल की जाती है।



देश के न्यायालयीन सफर की यह एक स्वर्णिम शुरुआत है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में मध्यस्थता कानून अब देश के विभिन्न जिलों में सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। यह एक पायलट प्रोजेक्ट की तरह काम कर रहा है। निस्संदेह इससे सुलह-समझौतों के आधार पर मुकदमों का बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है। न्यायालय मध्यस्थता कानून के तहत ऐसे लंबित प्रकरण को चिह्नित कर रहे हैं, जिनमें राजीनामा की संभावना अधिक है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि न्यायालय भी अब प्राथमिकता के क्रम में सुलह-समझौते के लिए प्रकरण तेजी से तैयार कर रहा है, इससे जहां बड़ी संख्या में विचाराधीन मुकदमों का बोझ कम हो सकेगा, वहीं इसकी सुनवाई में समय और खर्च की भी बचत होगी।


यदि हम छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की बात करें, तो यहां 89 हजार से अधिक न्यायालयीन प्रकरण दर्ज हैं। मुकदमों के शीघ्र निराकरण एवं न्याय मिलने से राष्ट्र निर्माण को भी बल मिलेगा। मध्यस्थता अधिकरण का सही एवं त्वरित गति से क्रियान्वयन हो सके, यह देखने के लिए न्यायालय का सांविधानिक दायित्व भी बढ़ गया है। न्यायालय को अब यह देखना होगा कि नागरिकों की शिकायतों से जुड़े एवं न्याय की आस लगाए लोगों को शीघ्र एवं उचित न्याय समय पर मिले। बदलती एवं तेज दौड़ती दुनिया में न्यायपालिका को भी साथ-साथ चलना होगा।

ई-कोर्ट परियोजना के तहत 2023-24 के बजट में 7,000 करोड़ रुपये के आवंटन से यह उम्मीद की जा सकती है कि इस बजट से न्यायिक संसाधनों एवं उसकी दक्षता कौशल में वृद्धि होगी। कोर्ट अब अपने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को भी अपडेट कर सकेगा। आज प्रकरणों की सुनवाई हाइब्रिड मोड पर विशेष तकनीक से हो रही है, जिसके तहत देश के किसी भी कोने से वादियों को अदालती कार्यवाही में शामिल किया जा रहा है। न्यायालयों में पारिवारिक विवाद, विवाह विच्छेद, मोटर दुर्घटना, किराएदारी विवाद, निषेधाज्ञा, सिविल रिकवरी, व्यवसायिक विवादों की लंबित फाइल खोलकर ऐसे प्रकरणों को तो सुलह से ही निराकृत किया जा सकता है। हमारी न्याय व्यवस्था काफी क्षमतावान है। कोविड के जोखिम के समय भी अदालतें बंद नहीं हुईं।

इधर केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री किरन रिजिजू ने यह कहा है कि तारीख पर तारीख देकर मुकदमों को लंबित रखना उचित नहीं। अब न्याय प्रक्रियाओं को सहज सुलभ करने की दिशा में ऐतिहासिक कार्य शुरू हो रहे हैं। अंग्रेजों के जमाने के कठोर कानून बदले जा रहे हैं, इस प्रक्रिया के तहत 1,486 पुराने औपनिवेशिक कानून को अस्तित्वहीन कर दिया गया है। आने वाले समय में 65 कानून भी समाप्त होने की प्रक्रिया में शामिल हैं।

कुछ कानून ब्रिटिश सरकार ने हम पर थोपे थे। वे कानून उस समय बने थे, जब उनके खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका जा रहा था। अंग्रेजों ने इस बगावत को कुचलने के लिए अपनी सुविधा अनुसार देशद्रोह कानून बनाया, जो आजाद भारत में ज्यों का त्यों रहा। आजाद भारत में अंग्रेजों के बनाए कानून की समीक्षा भी नहीं की गई। ब्रिटिश सरकार ने अपने कानून के आधार पर स्वतंत्रता आंदोलन के शीर्ष स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर काफी अत्याचार किया। अब शीर्ष अदालत ने भी भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए (राजद्रोह) को घातक कानून बताया है। अब वक्त आ गया है कि ब्रिटिश काल के प्रचलित कानून समाप्त किए जाएं। अंग्रेजी काल के कई कानूनों की सांविधानिक वैधता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

देश की शीर्ष अदालत इस पर विचार करे कि आजादी के 76 साल के बाद भी ऐसे औपनिवेशिक कानून, कहीं व्यक्ति की निजता, अभिव्यक्ति एवं अधिकार के लिए नासूर तो नहीं है। आखिर 152 साल पुराने  प्रचलित ब्रिटिश कानून, जिसमें देशद्रोह कानून प्रमुख है, समाप्त करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट संज्ञान ले रहा है। यह सांविधानिक पहल राष्ट्र के हित में ही है।

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