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लड्डू विवाद: कितना बदल गया इन्सान... ईश्वरत्व में भरोसा करने वालों के रूप में पवित्र चीजों की सुरक्षा जरूरी
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तिरुपति लड्डू विवाद के बीच श्रद्धालुओं के मन में उपज रहे कई सवाल
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
प्रिय श्री नारा चंद्रबाबू नायडू,
मैं यह पत्र भगवान वेंकटेश्वर के लाखों भक्तों में से एक के रूप में तिरुमला मंदिर में पवित्र प्रसाद तैयार करने में मछली के तेल, गोमांस की चर्बी और पशु वसा मिलाए गए घी के इस्तेमाल के बारे में चौंकाने वाले खुलासे पर पीड़ा और गुस्सा व्यक्त करने के लिए लिख रहा हूं। पवित्र भावनाओं का उल्लंघन राजनीतिक संरक्षण द्वारा समर्थित व्यवस्थागत उदासीनता से उपजा है। इस पत्र का फोकस इस बात पर नहीं है कि ‘किसने’ यह किया, बल्कि क्या, क्यों और कैसे कारक इस आक्रोश को बढ़ावा देते हैं।
मैं आपको 1990 के दशक से जानता हूं, जब आप संयुक्त आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। मैं इस उम्मीद से लिख रहा हूं कि आप इस मुद्दे पर उचित ध्यान देंगे। यह स्थिति फिल्म 'उपकार' में इंदीवर द्वारा लिखित प्रसिद्ध गीत 'देते हैं भगवान को धोखा, इन्सान को क्या छोड़ेंगे' में व्यक्त भावनाओं की प्रतिध्वनि है। मुझे यकीन है कि आप आपूर्ति शृंखला की अनदेखी के जोखिम और तिरुमला तथा अन्य मंदिरों में जाने वाले लाखों लोगों के लिए इसके भयावह परिणामों को समझते हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी चिंता व्यक्त की है। मुझे उम्मीद है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई को आगे बढ़ाएंगे। कृपया मुझे कुछ असहज करने वाले सवाल पूछने की इजाजत दें। मिलावट का पता लगाने की प्रक्रिया क्या है और निर्णय का समर्थन करने वाले उपकरण कैसे दिखते हैं? सरकार के खुलासे से पता चलता है कि मिलावट पर रिपोर्ट जुलाई में ही प्राप्त हुई थी। सरकार ने इसे सार्वजनिक करने के लिए 20 सितंबर तक इंतजार क्यों किया? तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) हर दिन करीब साढ़े तीन लाख लड्डू तैयार करता है। तीर्थयात्री भारत और दुनिया भर में अपने दोस्तों और परिवार के साथ इस बहुमूल्य प्रसाद को साझा करते हैं। यदि इस नृशंस कृत्य के बारे में पहले से ही प्रचार-प्रसार होता, तो श्रद्धालु सतर्क हो जाते। फिर रिपोर्ट मिलने और उसके खुलासे के बीच के अंतराल को क्या समझा जाए? सामान्यतः किसी गड़बड़ी का पता चलने पर कार्रवाई की जाती है। टीटीडी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्यामला राव से हमें पता चला है कि मंदिर के लिए गुणवत्तापूर्ण घी खरीदने की प्रक्रिया पर टीटीडी को सलाह देने के लिए चार डेयरी विशेषज्ञों का एक पैनल बनाया गया है। लेकिन गंभीर बात यह है कि जनता को अब तक यह नहीं बताया गया है कि यह सिर्फ एक कंपनी है। और अपराधियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है? क्या जुलाई में पता लगने के बाद से टीटीडी या सरकार ने मामला दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की है?
एक खबर में बताया गया कि 'एक निजी कंपनी द्वारा आपूर्ति किए गए चार टैंकर घी संदिग्ध प्रतीत हुए।' क्या संदेह वैज्ञानिक जांच की कठोरता से गुजरा है? सबसे बुरी बात है कि अधिकारियों ने स्वीकार किया कि 'आपूर्तिकर्ताओं ने इन-हाउस जांच की सुविधा नहीं होने का फायदा उठाया।' सौभाग्य से, टीटीडी की जल एवं खाद्य विश्लेषण प्रयोगशाला में कार्यरत एक पुण्यात्मा ने जोखिमों से चिंतित होकर गुजरात स्थित पशुधन एवं खाद्य विश्लेषण एवं अध्ययन केंद्र (सीएएलएफ) को परीक्षण के लिए नमूने भेजे। एफएसएसएआई द्वारा प्रमाणित 210 प्रयोगशालाओं (जिनमें से आधा दर्जन आंध्र प्रदेश में हैं) में से एक सीएएलएफ के चयन ने कई राजनीतिक लोगों की भौंहें टेढ़ी कर दी हैं। मानो समानांतर परीक्षण की कोई नई व्यवस्था लागू कर दी गई हो। यह भी स्पष्ट नहीं है कि घी के केवल एक या सभी आपूर्तिकर्ताओं के नमूने परीक्षण के लिए भेजे गए थे। आदर्श रूप से, मिलावट का पता चलने के बाद अनिवार्य रूप से
सभी आपूर्तिकर्ताओं के नमूने जांच के लिए भेजे जाने चाहिए। बहुमूल्य लड्डू तीर्थयात्रियों द्वारा चढ़ाए जाने वाले प्रसादों में से एक है, जिन्हें वे घर ले जाते हैं। लाखों भक्त अब इस डर से जूझ रहे हैं कि क्या मिलावट हो सकती है। भगवान वेंकटेश्वर को चढ़ाए जाने वाले नैवेद्यम की तैयारी में इस्तेमाल की जाने वाली अन्य सामग्रियों में मिलावट की पहचान करने की प्रक्रिया क्या है? क्या खरीद प्रतिस्पर्धी बोली या गुणवत्ता द्वारा तय की जाती है?
क्या इन उत्पादों की सामग्रियों का गुणवत्ता परीक्षण होता है और यदि हां, तो कितनी बार? टीटीडी को विश्वास और भरोसा बनाए रखने के लिए रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। वास्तव में, टीटीडी को एक कदम और आगे जाना चाहिए। अमेरिकी न्यायाधीश लुइस ब्रैंडिस ने अपने निबंध ‘प्रचार क्या कर सकता है’ में कहा, 'सूर्य के प्रकाश को सबसे अच्छा कीटाणुनाशक कहा जाता है।' टीटीडी को पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए और सभी सामग्रियों के सभी आपूर्तिकर्ताओं के नाम प्रकाशित करने चाहिए। प्रिय मुख्यमंत्री जी, यह कटु सच्चाई है कि भावनाओं का अपमान यथास्थिति बनाए रखने और प्रणालीगत खामियों के कारण होता है।
टीटीडी सबसे धनी संस्थानों में से एक है। 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के बजट, 18,000 करोड़ रुपये से अधिक की जमाराशि और 1,000 किलोग्राम से अधिक सोने के साथ, इसके पास समय के अनुरूप संसाधनों के प्रबंधन का खाका तैयार करने के संसाधन हैं। उसे अपने किसी विश्वविद्यालय में एक आधुनिक, इन-हाउस, एफएसएसएआई-प्रमाणित प्रयोगशाला स्थापित करनी चाहिए। इस प्रयोगशाला को टेंडर तय होने पर, आपूर्ति मिलने पर और जब चढ़ावे के लिए सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, तब सामग्री परीक्षण करने का काम सौंपा जाना चाहिए। हैदराबाद, चेन्नई और बंगलूरू स्थित आईआईटी और आईटी दिग्गज निश्चित रूप से प्रसाद की सामग्रियों और उसे बाहर भेजे जाने का प्रबंधन करने के लिए उद्यम समाधान तैयार और स्थापित करने में मदद कर सकते हैं। आधुनिक प्रणाली अनुप्रयोगों और प्रौद्योगिकी को अपनाने से पैमाने और जटिलता की चुनौतियों में कमी आएगी तथा सुरक्षा और विश्वास को बढ़ावा मिलेगा। ऐसा लगता है कि शक्ति और धन के संगम पर कुछ भी पवित्र नहीं है और यह अशुभ है। जैसा कि कवि प्रदीप ने लिखा है- देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इन्सान! ईश्वरत्व में विश्वास रखने वालों के रूप में, यह जरूरी है कि हम पवित्र चीजों को सुरक्षित रखें।
साभिवादन।