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आकलन: भारत श्रीलंका राजनयिक संबंधों का अमृत वर्ष, अहम है राष्ट्रपति विक्रमसिंघे की यात्रा

Mon, 24 Jul 2023 06:23 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Mon, 24 Jul 2023 06:23 AM IST
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सार
पिछले हफ्ते श्रीलंकाई राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने आपसी रिश्ते को मजबूत करने के लिए भारत का दौरा किया, जो पिछले साल श्रीलंका को भारी आर्थिक संकट से बाहर निकालने के लिए पिछली सभी समस्याओं, चिढ़ और पूर्वाग्रहों से ऊपर दिखा था। तब भारत ने चार अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज दिया था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा लगभग तीन अरब डॉलर के राहत पैकेज की सुविधा प्रदान की थी।
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amrit versh of India-Sri Lanka diplomatic relations, President Wickremesinghe's visit is significant
विक्रमसिंघे और पीएम मोदी। - फोटो : PIB

विस्तार

मौजूदा जटिल समय में बाइबिल की इस उक्ति का पालन करना बहुत मुश्किल है कि 'अपने पड़ोसियों के साथ प्रेम करें', खासकर जब पड़ोसियों के साथ अन्य पड़ोसी भी उसी प्रेम, अधिक धन, हथियार और तेल के साथ आपसे प्रतिस्पर्धा करते हों। ऐसे में प्यार को 'मदद' का मूर्त रूप लेना होगा, जिससे फर्क पड़ता है। भारत छोटे पड़ोसी देशों से घिरा हुआ है, जिनमें से कुछ मित्रवत हैं, तो कुछ नहीं और वे सभी अपने-अपने हितों की रक्षा करने को इच्छुक हैं। जबकि चीन उन्हें भारत से दूर करने के लिए गले लगाने को तैयार है। ऐसे में भारत की मदद को सतर्क एवं प्रतिस्पर्धी होना चाहिए, साथ ही, यह देखभाल एवं सहयोग के रूप में दिखना चाहिए। प्रत्येक पड़ोसी के साथ भारत का घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध है, जो आंशिक रूप से भारत की मदद कर सकता है, क्योंकि चीन का उनके साथ वैसा संबंध नहीं है। संक्षेप में यह भारत की 'पड़ोसी पहले' की नीति को निर्धारित करता है।



पिछले हफ्ते श्रीलंकाई राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने आपसी रिश्ते को मजबूत करने के लिए भारत का दौरा किया, जो पिछले साल श्रीलंका को भारी आर्थिक संकट से बाहर निकालने के लिए पिछली सभी समस्याओं, चिढ़ और पूर्वाग्रहों से ऊपर दिखा था। तब भारत ने चार अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज दिया था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा लगभग तीन अरब डॉलर के राहत पैकेज की सुविधा प्रदान की थी। भारतीय जहाजों ने श्रीलंका की मदद के लिए खाद्य, अन्य जरूरी चीजें और तेल पहुंचाया था, जब उसका आर्थिक संकट एक राजनीतिक संकट में तब्दील हो गया था और उसे सत्ता परिवर्तन के लिए मजबूर होना पड़ा था। भले ही भारत भी ऐसा चाहता हो, लेकिन उस संकट का नतीजा यह हुआ कि राजपक्षे बंधुओं को सत्ता से हटना पड़ा, जो चीन समर्थक रुख के लिए जाने जाते थे। लेकिन कोई भी देश चीन को दूर नहीं जाने देना चाहता। विक्रमसिंघे ने धैर्यपूर्वक भारत यात्रा की योजना बनाई, जब उसके विदेश मंत्री अली साबरी बीजिंग में थे और राष्ट्रपति स्वयं वहां जाने की योजना बना रहे हैं। इस संक्षिप्त यात्रा का समय और मुद्दा, दोनों का महत्व है। यह श्रीलंकाई राष्ट्रपति के रूप में विक्रमसिंघे की पहली भारत यात्रा थी। इससे पहले छह बार वह श्रीलंका के प्रधानमंत्री के रूप में भारत का दौरा कर चुके हैं।


दोनों देशों ने पशुपालन एवं डेयरी क्षेत्र में संयुक्त इरादे के घोषणापत्र और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के लिए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके अलावा श्रीलंका के त्रिंकोमाली जिले में आर्थिक विकास परियोजना के लिए भी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए। साथ ही, श्रीलंका में यूपीआई एप की मंजूरी के लिए एनआईपीएल एवं लंका पे के बीच नेटवर्क टू नेटवर्क समझौता और सैमपुर सौर ऊर्जा परियोजना के लिए ऊर्जा परमिट का फैसला किया गया। दोनों देशों के बीच बैठक में कनेक्टिविटी, ऊर्जा और आसान वित्तीय लेन-देन पर जोर दिया गया। दिल्ली की यात्रा से पहले विक्रमसिंघे ने संकेत दिया था कि वह ऐसे लेन-देन के पक्षधर हैं, जिसमें भारतीय रुपये की अधिकता शामिल हो। दोनों देशों ने शुक्रवार को हस्ताक्षर करने से पहले हरेक बिंदु पर व्यापक विचार-विमर्श किया। जापान और पेरिस क्लब के अन्य सदस्यों के साथ भारत आधिकारिक ऋणदाता समिति का भी हिस्सा है, और अभी श्रीलंका के साथ एक ऋण उपचार योजना पर बातचीत कर रहा है। चीन, जापान और भारत श्रीलंका के शीर्ष तीन द्विपक्षीय ऋणदाता हैं।

दिल्ली और कोलंबो संभावित संयुक्त उद्यमों की खोज कर रहे हैं, जिसमें वर्षों से लंबित एक एकीकृत ऊर्जा ग्रिड भी शामिल है। भारत यह भी चाहता है कि निजी क्षेत्र के ज्यादा से ज्यादा निवेशक कुछ बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भारी निवेश करें, क्योंकि चीन ने बड़े पैमाने पर इस क्षेत्र में प्रवेश किया है। चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में कोलंबो के दक्षिण में जमीन पर कब्जा करके एक बड़ी पोर्ट सिटी का निर्माण किया है। श्रीलंका चाहता है कि वैश्विक निवेश, खासकर पड़ोसी भारत से उस परियोजना में भारी निवेश हो। भारत का अदाणी समूह एक अरब डॉलर के निवेश के साथ कुछ महत्वपूर्ण परियोजनाओं में लगा हुआ है। इसके अलावा, पिछले साल भुगतान संतुलन की समस्या के मद्देनजर दिवालिया घोषित होने के बाद श्रीलंका अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए भारत से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करना चाहता है, जो वर्तमान में इसके शीर्ष स्रोत है। कोलंबो स्थित भारतीय सीईओ फोरम को हाल ही में संबोधित करते हुए विक्रमसिंघे ने कहा कि भारतीय मुद्रा जल्द ही श्रीलंका में स्वीकार की जाएगी। यह एक ऐसा कदम है, जो व्यापार और पर्यटन, दोनों को प्रोत्साहित करेगा।

श्रीलंका ने भारतीय कंपनियों से व्यापक निजी निवेश की मांग की है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ मुलाकात में विक्रमसिंघे ने मछुआरों के मुद्दे पर बातचीत की। भारत श्रीलंका के तमिलों के लिए बेहतर और न्यायपूर्ण समझौते का इच्छुक है, जिस पर बातचीत के दौरान चर्चा की गई। भारत इस उम्मीद में रानिल पर निवेश कर रहा है कि वह काम करेंगे, जबकि राजपक्षे ने बाधा उत्पन्न की थी। फिलहाल विक्रमसिंघे की यात्रा इस लिहाज से एक अच्छा संकेत है कि कर्ज में डूबे होने के बावजूद श्रीलंका आर्थिक सुधार के संकेत दे रहा है। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, 'हम मानते हैं कि भारत और श्रीलंका के सुरक्षा हित और विकास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए यह जरूरी है कि हम एक-दूसरे की सुरक्षा और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए मिलकर काम करें।' उन्होंने आर्थिक साझेदारी के विजन डॉक्यूमेंट की प्रशंसा की।

मोदी ने कहा कि 'दोनों देशों के बीच बिजली ग्रिडों को जोड़ने का काम तेज किया जाएगा। यह वर्ष हमारे द्विपक्षीय संबंधों के लिए विशेष महत्व रखता है। हम अपने राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। साथ ही, भारतीय मूल का तमिल समुदाय श्रीलंका में अपने आगमन के 200 वर्ष पूरे कर रहा है।' श्रीलंका में चीन की बढ़ती उपस्थिति से भारत चिंतित है कि हिंद महासागर में अपनी स्थिति मजबूत करने की उसकी योजना एक चुनौती बन सकती है। भारत के चारों तरफ यही कहानी है। ऐसे में केवल धैर्य भरी कूटनीति ही उसकी मदद कर सकती है।

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