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अरावली पर हल्ला और हकीकत: खनन पर पाबंदी की आड़ में मूल समस्या पर पर्दा डालने का कुत्सित प्रयास

Vivek S Agarwal विवेक एस अग्रवाल
Updated Sat, 27 Dec 2025 07:03 AM IST
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सार
अरावली मामले में हो रहे हो-हल्ले का आधार यह आशंका है कि पर्वत शृंखला की बदली परिभाषा से खनन बढ़ेगा व लोग भी प्रभावित होंगे, जबकि सच्चाई कुछ और ही है।
 
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Amidst controversy surrounding Aravalli mountain range truth is something entirely different
अरावली पर्वतमाला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अरावली की पर्वत शृंखला को लेकर इन दिनों गंभीर विवाद चल रहे हैं। एक पक्ष जहां भविष्य में अरावली से जुड़ी आशंकाओं को लेकर अपनी आवाज बुलंद किए हुए है, वहीं सरकार की ओर से बचाव मुद्रा में यह आश्वस्त करने का प्रयास किया जा रहा है कि किसी भी रूप में राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में फैली पर्वत शृंखला पर आंच नहीं आएगी। इन विवादों की पृष्ठभूमि में उच्चतम न्यायालय का 20 नवंबर, 2025 को हुई सुनवाई के पश्चात पारित आदेश है, जिसके तहत नौ मई, 2024 के आदेश की अनुपालना में गठित विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा को किंचित शर्तों के साथ स्वीकृति प्रदान की गई है।


आशंका आधारित विवादों को विराम देने की दृष्टि से केंद्र सरकार ने संपूर्ण अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज पर पाबंदी लगाते हुए पुरानी गतिविधियों पर पुनरीक्षण संबंधी आदेश जारी करते हुए अरावली संरक्षण की मंशा को स्पष्ट करने का प्रयास किया है, किंतु जेन-जी के नाम पर चलाए जा रहे आंदोलन का उद्देश्य तो कुछ अलग ही प्रकट होता है।


दरअसल, मामले का मूल कारण जाने बिना हो रहे हो-हल्ले का आधार मात्र आशंका आधारित है कि अरावली पर्वत शृंखला की परिभाषा में परिवर्तन करने से इसके विस्तार वाले राज्यों में न सिर्फ खनन को बढ़ावा मिलेगा, अपितु आम जीवन भी विपरीत रूप से प्रभावित होगा।

तथ्य तो यह है कि राजस्थान नौ जनवरी, 2006 से समान परिभाषा का पालन कर रहा है। साथ ही, इसे और अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी बनाने की दृष्टि से 100 मीटर या अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली, कंटूर के अंदर आने वाली समस्त  भू-आकृतियों को, खनन की लीज देने के मकसद से बाहर रखा गया है। इसी तरह विशेषज्ञों की समिति ने अरावली श्रेणी के 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचाई वाली दो आसपास की पहाड़ियों के 500 मीटर क्षेत्र के दायरे में विद्यमान समस्त भू-आकृतियों को बिना किसी अपवाद खनन लीज की उपयुक्तता से निषिद्ध क्षेत्र माना है। ऐसे में, यह भ्रम कि सौ मीटर से कम ऊंचाई वाली भू-आकृति वाले क्षेत्र में खनन की अनुमति होगी, पूर्णतया मिथ्या है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति ने परिभाषा को स्पष्ट करते हुए न सिर्फ इसे पारदर्शी, बल्कि संपूर्ण पर्वत शृंखला को सुरक्षित करने हेतु अपनी अनुशंसाएं की हैं। इससे आगे बढ़ते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा सरकार की ओर से सुदृढ़ सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान बनने तक किसी भी प्रकार की नई खनन लीज पर पूर्ण पाबंदी लगाई गई है। ऐसे में, मात्र आशंकाओं के आधार पर आंदोलन एवं भ्रम की स्थिति कहीं न कहीं प्रायोजित कार्यक्रम की बू देती है। रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में किसी भी प्रकार के खनन प्रस्ताव से पूर्व भारतीय सर्वेक्षण विभाग के नक्शे पर अरावली पहाड़ियों व शृंखलाओं की मार्किंग करने की शर्त भी रखी गई है।

अरावली क्षेत्र में खनन पर पाबंदी की आड़ में इसकी मूल समस्या पर पर्दा डालने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। वैसे भी, संपूर्ण पर्वत शृंखला में लगभग एक प्रतिशत ही खनिज लवण विद्यमान हैं, ऐसे में इसकी वाणिज्यिक उपयोगिता सीमित ही है। असली खतरे का कारण तो उक्त क्षेत्र में हो रहा बेलगाम निर्माण है। पर्यटन को बढ़ावा देने के छद्म उद्देश्य से हो रहा बेलगाम निर्माण पहाड़ियों के लिए खनन से भी बड़ा खतरा है। दुर्भाग्य से, सजग संगठनों के आंदोलन में इस विषय पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया गया है। वर्तमान आंदोलन की दिशा में पर्वत शृंखला को बचाने के उद्देश्य से गैर-कानूनी खनन को रोकने हेतु सरकार पर दबाव बनाया जाना कहीं अधिक सार्थक होता।  
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