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दूसरा पहलू: जलवायु संघर्ष और वह युवा लड़की... अपर्याप्त वैश्विक समर्थन के कारण छोटे द्वीपीय देशों में निराशा

Tue, 26 Nov 2024 03:58 AM IST
दीपक कुमार शर्मा सुसान एन सैमुअल
सुसान एन सैमुअल Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 26 Nov 2024 03:58 AM IST
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सार
बाकू में कॉप-29 सम्मेलन में एनिमेटेड फिल्म मोआना पर आधारित मंडप ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया। मंडप में वानुअतु के एक प्रतिनिधि ने बताया कि ‘हम अब तक की वार्ताओं से थक चुके हैं।’ अब वार्ता नहीं, कार्रवाई करने का वक्त है। अपर्याप्त वैश्विक समर्थन के कारण छोटे द्वीपीय देशों में निराशा बढ़ रही है। यही कारण है कि पापुआ न्यू गिनी के प्रतिनिधि कॉप-29 में भाग नहीं ले रहे हैं। यह एक तरह से उनका शक्तिशाली देशों के प्रति मौन विरोध ही है।
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amid Climate conflict Small island nations frustrated over insufficient global support
सुसान एन सैमुअल व जलवायु संघर्ष और वह लड़की - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बाकू में हुए कॉप-29 सम्मेलन के दौरान प्रतिनिधिमंडलों के मंडप से गुजरते हुए मोआना ब्लू पैसिफिक मंडप ने सबसे ज्यादा मेरा ध्यान आकर्षित किया। इस मंडप का नाम एनिमेटेड फिल्म मोआना की उत्साही युवा लड़की के नाम पर रखा गया था। वह प्रशांत द्वीपवासियों व युवा पीढ़ी के साहस और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है, जो अपने द्वीप को पर्यावरणीय नुकसान से बचाने के लिए लंबी यात्रा पर जाती है। वास्तविक दुनिया में भी ऐसी ही लड़ाई चल रही है, जहां छोटे द्वीपीय विकासशील देश और युवा कार्यकर्ता जलवायु कार्रवाई के लिए दबाव बना रहे हैं-मैं इसे ‘मोआना प्रभाव’ कहती हूं।



मंडप में वानुअतु के एक प्रतिनिधि ने बताया कि ‘हम अब तक की वार्ताओं से थक चुके हैं।’ ये दो शब्द जलवायु परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में मौजूद देशों की थकावट को दर्शाते हैं। वर्ष 2015 में पेरिस समझौते के एक साल बाद रिलीज हुई पहली मोआना फिल्म पर्यावरण की पैरोकारी की भावना को जगाती है। मोआना-2 29 नवंबर को रिलीज  होने जा रही है। छोटे द्वीपीय विकासशील देश जलवायु परिणामों का भारी खामियाजा भुगतते हैं। वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उनके न्यूनतम योगदान के बावजूद उन्हें अन्य चुनौतियों के अलावा बढ़ते समुद्री स्तर से लेकर चरम मौसम व जैव विविधता की हानि जैसे खतरों का सामना करना पड़ रहा है।


अपर्याप्त वैश्विक समर्थन के कारण इन देशों में निराशा बढ़ रही है। यही कारण है कि पापुआ न्यू गिनी के प्रतिनिधि ने कॉप-29 में भाग नहीं लिया। डोनाल्ड ट्रंप के फिर से राष्ट्रपति चुने जाने के बाद आशंका है कि अमेरिका फिर से अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं से पीछे हट सकता है। दो दिसंबर को, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जलवायु परिवर्तन पर सलाहकार की राय पर अपनी सार्वजनिक सुनवाई शुरू करेगा। इस पहल की शुरुआत 2019 में वानुअतु के 27 कानून के छात्रों ने की थी, जिन्होंने एक कक्षा से आंदोलन की अगुवाई की थी। युवा कार्यकर्ताओं की बदौलत यह अदालती फैसला दुनिया में छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के अधिकारों को प्राथमिकता देने के तरीके को बदल सकता है। ये लोग अन्य लोगों व संगठनों को एक अधिक लचीले भविष्य की कल्पना करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जैसे-जैसे हम 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के करीब पहुंच रहे हैं, पहले से कहीं ज्यादा जरूरी कार्रवाई की जरूरत है। कॉप-29 व उसके बाद भी संयुक्त राष्ट्र का दृष्टिकोण ‘किसी को पीछे न छोड़ना’ समावेशिता से शुरू होता है। (द कन्वर्सेशन से)

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