{"_id":"658e2094b249e9622904aaf5","slug":"ai-chatgpt-to-check-level-of-depression-by-your-post-or-emoji-on-social-media-without-gender-biases-2023-12-29","type":"story","status":"publish","title_hn":"तकनीक: कृत्रिम मेधा के दम पर उदासी और अवसाद से दो-दो हाथ","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
तकनीक: कृत्रिम मेधा के दम पर उदासी और अवसाद से दो-दो हाथ
Fri, 29 Dec 2023 06:57 AM IST
गुलाम अहमद
साराह हेलेवैल, रिसर्च फेलो (हेल्थ साइंस), कर्टिन यूनिवर्सिटी
साराह हेलेवैल, रिसर्च फेलो (हेल्थ साइंस), कर्टिन यूनिवर्सिटी
Published by: गुलाम अहमद
Updated Fri, 29 Dec 2023 06:57 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो :
iStock
विस्तार
इस साल हुई रिसर्च ने बताया है कि कृत्रिम मेधा यानी एआई अब बीमारियों के निदान और उनके इलाज के तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए भी तैयार है। अवसाद का पता लगाने में तो यह खासतौर से मददगार हो रही है, क्योंकि इससे अवसाद का ज्यादा सटीक निदान संभव हुआ है। हम में से करीब 20 फीसदी लोगों ने अपने जीवन में कम से कम एक बार अवसाद का सामना जरूर किया होगा। इस वक्त दुनिया भर में 30 करोड़ लोग अवसाद की समस्या से जूझ रहे हैं। डब्ल्यूएचओ ने अवसाद को दुनिया में खराब स्वास्थ्य में सबसे ज्यादा योगदान करने वाली समस्या बताया है। एआई इससे निपटने में कैसे मदद कर सकती है?
अवसाद का निदान इतना मुश्किल होता है कि सामान्य चिकित्सक तो अवसाद के आधे से भी कम मामलों का सही-सही पता लगा पाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि इसके निदान के लिए चिकित्सक मरीज द्वारा बताए लक्षणों, मरीज से पूछे जाने वाले सवालों से निकले जवाबों और नैदानिक रिपोर्टों का ही सहारा लेते हैं।
जिन लोगों में अवसाद का सही-सही निदान हो जाता है, उनके इलाज के बहुत से तरीके हैं, जिनमें संवाद, ध्यान और जीवन शैली में बदलाव जैसे उपाय भी शामिल हैं। हालांकि हर व्यक्ति के मामले में इलाज की प्रतिक्रिया अलग-अलग देखने को मिलती है और हमारे पास पहले से यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि कौन इलाज कारगर होगा और कौन-सा नहीं। एआई कंप्यूटरों को इंसान की तरह सोचने के लिए प्रशिक्षित करती है, जिसमें तीन इंसानी व्यवहारों पर जोर दिया जाता है। ये हैं- सीखना, तर्क करना और सुधार करना। एआई की एक शाखा मशीन लर्निंग है, जिसका उद्देश्य सीखने, डाटा में प्रतिरूपों का पता लगाने और इंसान के मार्गनिर्देशन के बिना डाटा युक्त भविष्यवाणी करने के लिए कंप्यूटरों को प्रशिक्षित करना है। हाल के वर्षों में अवसाद जैसी बीमारियों के, निदान में एआई का उपयोग करने वाले शोध काफी हो रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने जब चैटजीपीटी के निदानों और डॉक्टरों द्वारा किए गए निदानों की तुलना की, तो हैरान करने वाले नतीजे मिले। जब अवसाद की गंभीरता, लिंग और सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले विभिन्न काल्पनिक मरीजों के बारे में चैटजीपीटी को बताया गया, तो उसने ज्यादातर मरीजों के लिए टॉक थैरेपी यानी संवाद से इलाज का तरीका सुझाया। जबकि चिकित्सकों ने ऐसे रोगियों के लिए अवसाद रोधी दवाएं दिए जाने का सुझाव दिया। चैटजीपीटी लिंग, और सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रहों से भी प्रभावित नहीं है, जबकि चिकित्सकों में ऐसा देखने को नहीं मिलता, वे शारीरिक श्रम से जुड़े नौकरी करने वालों को अक्सर अवसादरोधी दवाएं ही लिखते हैं।
एमआरआई-आधारित एआई मशीनें केवल शोध में ही उपयोग की जाती हैं, पर जैसे-जैसे एमआरआई स्कैन सस्ते, तेज और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में सक्षम हो रहे हैं, उससे पूरी संभावना है कि यह नई तकनीक चिकित्सा सामान का हिस्सा बन जाएगी। वैज्ञानिकों ने एआई का उपयोग करते हुए सोशल मीडिया पोस्ट और इमोजी के विश्लेषण से भी अवसाद का पता लगाया है।