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समय की नई इबारत: जो दिख रहा और जो नहीं दिख रहा, एआई के दौर में सतर्कता पूर्वशर्त
Wed, 31 Dec 2025 07:38 AM IST
पवन पांडेय
अद्वैता काला, पत्रकार, फिल्म कथा लेखक एवं चर्चित उपन्यासकार
अद्वैता काला, पत्रकार, फिल्म कथा लेखक एवं चर्चित उपन्यासकार
Published by: पवन पांडेय
Updated Wed, 31 Dec 2025 07:38 AM IST
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समय की नई इबारत: जो दिख रहा और जो नहीं दिख रहा
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अमर उजाला
विस्तार
2026 का भारत अब सिर्फ छोटे वीडियो का बहुत बड़ा उपभोक्ता नहीं है; यह दुनिया का सबसे बड़ा रील्स, मीम्स, वॉइस नोट्स बनाने और फॉरवर्ड करने वाला देश है। जिस देश में अवसरों से अधिक प्रतिभाएं हों, वहां इस तरह की स्थिति के खतरे भी हो सकते हैं। इसलिए, एआई के दौर में सतर्कता पूर्वशर्त है। यह सोचना मुश्किल है कि दो दशक पहले सोशल मीडिया, फेसबुक, पेटीएम या ऐसी कोई भी चीज नहीं थी, जो आज हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई है।दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है और हम चाहे गांव में रहते हों या शहर में, इन बदलावों को अपना रहे हैं। लेकिन प्रौद्योगिकी ने अभी हमारा साथ नहीं छोड़ा है, जैसे हम सोशल मीडिया के आदी हुए, अब हम खुद को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के युग में पाते हैं। कुछ दिन पहले मैं एक डिनर पार्टी में चालीस की उम्र के कुछ लोगों से बात कर रही थी। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वे चैटजीपीटी या अन्य एआई प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं, तो मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि वे इसके खिलाफ थे। एक महिला कलाकार ने बताया कि वह एआई का उपयोग नहीं करती है। उसे डर था कि यह सोचने को आसान बना देगा, जबकि दिमागी तौर पर सक्रिय एवं सजग रहने के लिए बौद्धिक मेहनत जरूरी है। मुझे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या हम सब दिमागी तौर पर आलसी होने के कगार पर हैं।
दरअसल, एआई ने पूरा खेल ही बदल दिया है। शिक्षक बताते हैं कि अब उन्हें असाइनमेंट में एआई से तैयार सामग्री को स्कैन करना पड़ता है, चोरी, नकल वगैरह पिछली सदी की बातें हो गई हैं। जैसे ही हम 2026 में कदम रखेंगे, एआई एक ऐसी चीज लगेगा, जो चुपचाप चीजों को बनाने, बात करने, अभियान चलाने, इस्तेमाल करने और यहां तक कि आरोप लगाने के तरीके को ऊर्जा देगा। वर्ष 2024 व 2025 में भारतीयों ने वायरल डीपफेक, क्लोन की हुई आवाजों, सिंथेटिक रील्स और चैटबॉट असिस्टेंट के जरिये एआई का एहसास किया था, लेकिन 2026 में एआई सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण बन जाएगा। अब सवाल यह नहीं होगा कि सामग्री एआई-जनरेटेड है या नहीं, बल्कि यह होगा कि 1.4 अरब लोगों, सैकड़ों भाषाओं और दुनिया के सबसे ज्यादा डिजिटल जुड़ाव वाले देश में क्या प्रामाणिकता का अब भी महत्व है। भारत अब सिर्फ छोटे वीडियो का बड़ा उपभोक्ता नहीं है; यह दुनिया का सबसे बड़ा रील्स, मीम्स, वॉइस नोट्स बनाने और फॉरवर्ड करने वाला देश है। सिर्फ 2025 में ही, जेनरेटिव एआई टूल्स रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो गए, जिनका इस्तेमाल इन्फ्लुएंसर्स ने रील्स बनाने, राजनेताओं ने ज्यादा असरदार बनने, धोखाधड़ी करने वालों ने अधिकारियों की नकल करने और आम लोगों ने ऐसी सामग्री बनाने के लिए किया, जिसे बनाने के लिए पहले उनके पास हुनर या पैसे नहीं थे।
2026 तक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब शॉर्ट्स और नए क्षेत्रीय प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाली रील्स का एक बड़ा हिस्सा आंशिक या पूरी तरह से एआई की मदद से बनाया जाएगा। एआई इंदौर के एक बेडरूम क्रिएटर और मुंबई के एक स्टूडियो के बीच के अंतर को खत्म कर देगा। जैसे सोशल मीडिया ने विचारों को सबके लिए सुलभ बनाया, वैसे ही एआई रचनात्मकता के लिए भी ऐसा ही करेगा। वर्ष 2026 में, एआई भारतीय क्रिएटर्स, शिक्षकों, इतिहासकारों, फिटनेस कोच, आध्यात्मिक कहानीकारों और आंत्रप्रेन्योर्स को बड़ी टीम के बिना पेशेवर तरीके से अपने आइडिया को प्रस्तुत करने में मदद करेगा। क्षेत्रीय ज्ञान, लोक कथाएं, मंदिरों का इतिहास, खाने की स्थानीय परंपराएं, भूली-बिसरी राजनीतिक हस्तियां एआई की मदद से आख्यान और दृश्यों के माध्यम से नई जिंदगी पाएंगे। छोटे व्यवसायी स्थानीय भाषाओं में सिनेमाई अंदाज में विज्ञापन देने के लिए एआई रील्स का इस्तेमाल करेंगे। जिस देश में प्रतिभा हमेशा से अवसरों से ज्यादा रही हो, वहां यह लोकतंत्रीकरण आजादी जैसा लगेगा। लेकिन वही मशीनरी, जो रचनात्मकता को बढ़ावा देती है, भरोसे को भी खत्म कर सकती है। भारत ने यह सबक 2025 में अच्छी तरह से सीखा, जब डीपफेक पहले परेशानी और फिर खतरा बन गया। मशहूर हस्तियों, खासकर महिलाओं को कृत्रिम सामग्री बनाकर निशाना बनाया गया। आवाज व वीडियो की नकल करके वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम दिया गया। वर्ष 2026 में यह सब और बढ़ सकता है। डीपफेक का मकसद हमेशा वायरल होना नहीं होगा। कई ऐसे डीपफेक होंगे, जिन्हें निजी तौर पर निशाना बनाकर और जबर्दस्ती तैयार करके उनका इस्तेमाल जबरन वसूली, उत्पीड़न, राजनीतिक धमकी या इज्जत खराब करने के लिए किया जाएगा।
भारत के संदर्भ में खतरा सिर्फ पैमाने का नहीं, बल्कि असमानता का भी है। एआई टूल्स तक पहुंच रखने वाला कोई भी गलत इरादे वाला व्यक्ति अब ऐसे किसी इन्सान को परेशान कर सकता है, जिसके पास कानूनी जानकारी, डिजिटल जागरूकता या सामाजिक ताकत नहीं है। महिलाओं, नाबालिगों और हाशिये पर पड़े समुदायों के लिए यह असमानता खास तौर पर गंभीर होगी। राजनीतिक तौर पर एआई का प्रभावी इस्तेमाल करने के लिए पूरे चुनाव को पलटने की जरूरत नहीं है। जिस देश में राजनीतिक संदेश उसके सत्यापन से ज्यादा तेजी से फैलते हैं, वहां एआई से बने ऑडियो और वीडियो झूठे लोगों के फायदे को और बढ़ा देंगे। लोकतंत्र सिर्फ बोलने की आजादी पर ही नहीं, बल्कि भरोसे और अच्छी नीयत पर भी निर्भर करता है।
2026 तक, हो सकता है कि डीपफेक, फर्जी जानकारी और प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर नियम 2025 की तुलना में ज्यादा स्पष्ट रूप में हों। हालांकि, यह सब पर एक तरह से लागू नहीं हो पाएगा। भारत की चुनौती कानून की कमी नहीं है, बल्कि इसे लागू करने का पैमाना, रोजाना लाखों अपलोड, कई ज्यूरिस्डिक्शन और विभिन्न प्लेटफॉर्म का देश के बाहर मुख्यालय हैं। ज्यादा टेकडाउन मैकेनिज्म, रिपोर्टिंग टूल और पहचान की चोरी और सिंथेटिक नुकसान के बारे में कानूनी भाषा की उम्मीद करें, पर यह भी स्वीकार करें कि इसे लागू करना आसान नहीं होगा। नागरिकों को सतर्क रहना होगा और जो हम देखते हैं, उस पर सवाल उठाना होगा। इस बात की पूरी आशंका है कि समुदाय ऐसे क्लिप्स के आधार पर एकजुट हो जाएंगे, जो बाद में फर्जी पाए जाएंगे। जब तक सुधार होंगे, तब तक भावनात्मक नुकसान ज्यादा हो चुका होगा।
फिर भी, भारत सांस्कृतिक रूप से बदलाव को अपनाने वाले अग्रणी समाजों में से एक हो सकता है। समाज को अपनी भूमिका निभानी होगी। हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा और यह पूछना शुरू करना होगा कि कोई खास क्लिप कहां से आई है, यह पूछने से पहले कि क्या वह सच है। इस लिहाज से, 2026 ‘देखना ही विश्वास करना है’ के अंत और ‘पता लगाना ही विश्वास करना है’ की शुरुआत का साल हो सकता है। और, हमें वहां तक तेजी से पहुंचना होगा।