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ऐसे मिलता है सच्चा सबाब

Yashwant Vyas Updated Wed, 09 May 2012 12:00 PM IST
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एक बार संत राबिया हज करने गईं। रास्ते में जो भी बीमार-अपंग मिलता, वह उनकी सेवा में लग जातीं। उनके साथ गए लोग हज करके लौट रहे थे, तो रास्ते में राबिया को एक अपंग की सेवा करते देख उन्होंने ताना कसा, तुम कैसी संत हो, हज यात्रा की जगह सांसारिक प्रपंच में पड़ी हो? रात को सोते समय उन हाजियों को लगा कि खुदा कह रहे हैं, हज का असली सबाब (पुण्य) राबिया को सेवा से मिल गया है। तुमने राबिया पर तंज कसा, इसलिए तुम्हारा सबाब खत्म हो गया है।
संत याजीद उल-बिस्तानी प्रतिदिन मसजिद में जाकर नमाज अता किया करते थे। अनेक लोग तो मसजिद के बाहर खड़े होकर उनके दीदार की प्रतीक्षा करते थे। एक बार दो दिन तक संत बिस्तानी मसजिद में नहीं पहुंचे। उनके मुरीद लोगों को चिंता हुई कि कहीं वह बीमार तो नहीं हो गए। वे उनके घर गए, तो वहां भी वह नहीं मिले। कुछ दूर जंगल में वे तलाशते हुए पहुंचे, तो देखा कि संत एक पत्थर पर गुमसुम बैठे हैं।

लोगों ने जब कारण पूछा, तो उन्होंने कुछ दूरी पर चटाई पर लेटे एक व्यक्ति की ओर इशारा कर बताया, मैं सवेरे घूमने आया, तो इस अनाथ वृद्ध को बेहोश पड़ा देखा। मैंने सोचा कि यदि यह ऐसे ही पड़ा रहा, तो मर जाएगा। इसलिए मैं इसकी देखभाल कर रहा हूं।

संत बिस्तानी ने उपदेश देते हुए कहा, अनाथ की सेवा-सहायता से जो सबाब मिलता है, वह अन्य किसी भी प्रकार की इबादत में नहीं मिल सकता।

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