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देश की सुरक्षा के बारे में कौन सोचता है

Tavleen Singh Updated Wed, 09 May 2012 12:00 PM IST
Who thinks about homeland security
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पाकिस्तान में बरसों सजा काटकर लौटे ‘एजेंट विनोद’ को राजकीय सहायता आदि न दे पाने में नियम-कायदों की बाधा बताई जा रही है। संभवतः विनोद के मामले में ऐसी बाधा की बात वास्तविक हो। किंतु इस पर विनोद ने जो कहा है, उसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती। उसके मुताबिक, यह देश अफजल गुरु और अजमल कसाब जैसे आतंकवादियों के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर सकता है, मगर किसी देश सेवक के लिए नियम-नीति की बाधा दिखाई जाती है।
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वास्तव में बात और अधिक विडंबना भरी है। क्योंकि अनेक तरह के अलगाववादियों, देशद्रोहियों और सामूहिक हत्याकांडों में लिप्त रहे लोगों से बातचीत और समय के साथ बड़े पद देने जैसे कार्य भी होते रहे हैं। नक्सलियों, आतंकवादियों को अपहरण, हत्या आदि विविध अपराधों के लिए क्षमादान देकर रोजगार आदि के लिए अनुदान देने जैसे उपाय भी होते रहे हैं। जबकि आतंकवादियों के हाथों मारे गए सैनिकों का स्मरण करने, उनके परिवार के लिए समुचित व्यवस्था करने में ढिलाई से लेकर भारी उपेक्षा दिखती है। यही वजह है कि विगत पांच वर्ष के दौरान देश के 46,000 जवानों ने अर्द्धसैनिक बलों से स्वैच्छिक अवकाश ले लिया।

सैनिकों की आत्महत्याएं भी बढ़ गई हैं। लेकिन देश के बौद्धिक-राजनीतिक वर्ग में इनके प्रति कोई संवेदना नहीं है। इसीलिए करीब सवा अरब जनसंख्या वाले देश में जहां क्लर्क और चपरासी के बीस-पचीस पदों के लिए भी हजारों स्नातक आवेदन देते हैं, वही सेना में अफसर बनने के लिए भी किसी में कोई उत्कंठा नहीं। इसीलिए अब हमारे राष्ट्रीय शिक्षा दस्तावेजों में देशभक्ति, वीरता, देश की रक्षा, राष्ट्रीय गौरव जैसे शब्दों तक का उल्लेख नहीं है।

राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) को भी लगभग भुलाया जा चुका है, जिसे ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’(1986) तक महत्व दिया गया था। मगर हाल के शैक्षिक कार्यक्रमों, चर्चाओं और दस्तावेजों में यह सब गायब हो गया है। तभी सीमा-प्रहरियों, सैनिकों तथा निरीह नागरिकों की हत्याएं करने वाले, यहां तक कि संसद पर हमला करने वाले भयंकर आतंकवादियों के लिए भी बड़े बुद्धिजीवियों, प्रोफेसरों की एक बड़ी जमात खड़ी हो जाती है। जबकि अपना कर्तव्य निभाते हुए देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले सैनिकों, सुरक्षाकर्मियों की जयकार करने, उनके स्मारक बनाने, उन्हें एवं उनके परिवारजनों को मान-सम्मान व सुविधा देने की कोई चिंता हमारे बौद्धिक वर्ग को नहीं है।

जब सर्वोच्च न्यायालय ने संसद पर आतंकी हमला करने वाले को मृत्युदंड सुनाया, तब उस आतंकी को निर्दोष बताने और सजा से बचाने के लिए कई जाने-माने बुद्धिजीवी, प्रोफेसर, पत्रकार और नेता आंदोलन करने लगे। सीमा रक्षकों का अपमान और उपेक्षा हमारे राजनीतिक जीवन की गहरी गिरावट का संकेत है।

आज मध्यवर्ग का युवा इंजीनियर, बैंकर, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी, मैनेजर, कंप्यूटर विशेषज्ञ, डिजाइनर, मॉडल, व्यवसायी आदि बनना चाहता है, लेकिन सैनिक कमांडर नहीं बनना चाहता। क्या इस के पीछे उनकी भीरुता है, जो मरने से डरती और किसी तरह भी जीते रहना चाहती है? संभवतः कुछ लोगों के लिए यह भी सच हो, जो अपने बच्चों को सैनिक स्कूलों में इसी डर से नहीं भेजते। पर यह एकमात्र और महत्वपूर्ण कारण नहीं है। मुख्य कारण यह है कि स्वतंत्र भारत की वैचारिकता देशभक्ति, देश की सुरक्षा और सम्मान के प्रति दिनोंदिन उदासीन होती गई है।

साठ-सत्तर वर्ष पहले तक देशभक्ति की जो भावना हमारे राजनीतिक-वैचारिक-सांस्कृतिक नेतृत्व के लिए सर्वप्रथम प्रतिज्ञा थी, वह स्वतंत्र भारत में धीरे-धीरे छोड़ दी गई। उसके बदले हमारे राजनीतिक-वैचारिक-सांस्कृतिक जीवन में आधुनिकता, समाजवाद, सामाजिक न्याय, जेंडर, ह्यूमन राइट्स, डाइवर्सिटी, उत्तर-आधुनिकता, दलितवाद, बहुसंस्कृतिवाद, आदि विचारों-विकृतियों ने स्थान ग्रहण कर लिया। ऐसे में देश के लिए अपना प्राण न्योच्छावर करने, देश की रक्षा को स्पृहणीय मूल्य मानने तथा सैनिकों का सम्मान करने की प्रेरणा भला कहां से मिलेगी?

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