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गुरु नहीं, संवाद चाहिए: बुद्धिजीवियों के लिए 10 सबक, आंद्रे बेते और माधव गाडगिल से सीख

Sun, 22 Feb 2026 05:58 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 22 Feb 2026 05:58 AM IST
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सार
वरिष्ठ विद्वान आंद्रे बेते और माधव गाडगिल के विचारों से मैं बहुत प्रभावित रहा हूं। उन पर चिंतन करते हुए मुझे उनके उन 10 विशेषताओं की याद आती है, जिन्होंने उनकी बौद्धिक दृष्टि और शोध प्रक्रिया को एक सूत्र में बांधा।  
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10 lessons for intellectuals, from Andre Beteille and Madhav Gadgil
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : AI

विस्तार

धार्मिक या आध्यात्मिक शिक्षा की तलाश में रहने वालों को गुरु की आवश्यकता पड़ सकती है- ऐसा गुरु, जो उन्हें उस मार्ग पर चलने की शिक्षा दे, जिसे वे सही मानते हैं। शिष्य से उम्मीद की जाती है कि वह गुरु की बात का आंख मूंदकर विश्वास करे, लेकिन जो लोग विद्वान बनना चाहते हैं, उन्हें किसी गुरु की तलाश करने की आवश्यकता नहीं है। आलोचनात्मक चिंतन और मौलिक शोध करने के लिए मन का स्वतंत्र होना जरूरी है। सिद्धांतों और पद्धतियों का अनुसरण करना है या नहीं, यह व्यक्ति को खुद तय करना चाहिए, न कि किसी और को।


दुर्भाग्य से भारत में आध्यात्मिक साधना और बौद्धिक खोज के इस महत्वपूर्ण फर्क को नजरअंदाज कर दिया जाता है। हमारे देश की अकादमिक संस्कृति गहराई तक सामंती प्रवृत्तियों से प्रभावित है, जहां उम्र और पद में वरिष्ठ लोग खुद को गुरु की भूमिका में देखने लगते हैं और बदले में अनुसरण तथा श्रद्धा की उम्मीद करते हैं। यह बौद्धिक सामंतवाद विज्ञान और मानविकी दोनों जगहों पर दिखाई पड़ता है। मार्क्सवाद सामाजिक पदानुक्रम का विरोध करता है, पर व्यवहार में कोलकाता के मार्क्सवादी प्रोफेसर अपने जूनियर से पदानुक्रम ढोने की उतनी ही उम्मीद करते हैं, जितने वाराणसी के रूढ़िवादी हिंदू विचारधारा वाले प्रोफेसर।


मेरा मानना है कि युवा शोधकर्ताओं को किसी एक गुरु की तलाश नहीं करनी चाहिए। उन्हें वरिष्ठ विद्वानों के साथ संवाद करना चाहिए। विद्वानों के अनुभव से शोधकर्ताओं को दिशा, संकेत और आलोचनात्मक प्रतिक्रिया मिल सकती है, जिससे शोध बेहतर होगा। वे मार्गदर्शक, सलाहकार और कुछ समय के लिए मेंटर हो सकते हैं, लेकिन गुरु नहीं। वरिष्ठों की बात ध्यान से सुनते हुए भी अंतिम निर्णय स्वयं शोधकर्ता को ही लेना होता है कि वह किस विषय पर और किस पद्धति से काम करेगा।

मेरे ये विचार उन दो वरिष्ठ विद्वानों के हाल में हुए निधन से प्रेरित हैं, जिन्होंने मेरी युवावस्था में मुझ पर गहरा प्रभाव डाला। ये दो व्यक्ति हैं- पर्यावरणविद माधव गाडगिल (जिनका 7 जनवरी को पुणे में 83 वर्ष की आयु में निधन हुआ) और समाजशास्त्री आंद्रे बेते। बेते का 3 फरवरी को दिल्ली में 91 वर्ष की आयु में निधन हुआ। मैं गाडगिल से पहली बार 1982 में मिला, जब मेरी उम्र 24 वर्ष थी और वह चालीस के थे। बेते से मेरी पहली मुलाकात 1988 में हुई, जब मैं 30 वर्ष का हुआ ही था और वह 50 के मध्य दशक में थे। हमारी आयु में काफी अंतर होने के बावजूद दोनों से मेरी दोस्ती जल्दी हो गई। हमारी अधिकांश बातचीत समाज, राजनीति, संस्कृति, इतिहास, पर्यावरण, भारत और विश्व से जुड़े प्रश्नों पर केंद्रित रहती थी। पारिवारिक बातें कभी-कभार किया करते थे।

पहली नजर में माधव गाडगिल और आंद्रे बेते के बीच बहुत अंतर दिखाई देता है। गाडगिल वैज्ञानिक थे, जबकि बेते नहीं। गाडगिल का पालन-पोषण पुणे में हुआ और उन्होंने अंग्रेजी सीखने से बहुत पहले मराठी बोलना शुरू कर दिया था। बेते के पिता फ्रांसीसी थे, लेकिन वह अपनी मां के बंगाली परिवार से अधिक जुड़ाव महसूस करते थे। उनका बचपन चंदन नगर में बीता और शिक्षा कोलकाता में हुई। स्कूल और कॉलेज में वह अंग्रेजी बोलते थे, जबकि मित्रों के साथ सड़क पर बंगाली। आंद्रे बेते ने अपनी डॉक्टरेट की उपाधि भारत से प्राप्त की, जबकि गाडगिल ने अमेरिका से। गाडगिल का अधिकांश पेशेवर जीवन बंगलूरू में बीता, जबकि बेते का दिल्ली में। गाडगिल और बेते कभी आपस में नहीं मिले। मेरे माध्यम से वे एक-दूसरे को जानते थे। उनके संपूर्ण जीवन और काम पर नजर डालें तो कई उल्लेखनीय समानताएं दिखाई देती हैं। आगे मैं उन 10 विशेषताओं का उल्लेख करूंगा, जिन्होंने उनकी बौद्धिक दृष्टि और शोध प्रक्रिया को एक सूत्र में बांधा।

पहली, दोनों की विद्वत्ता बहुमुखी थी। बेते समाजशास्त्री होते हुए इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों और विधि विशेषज्ञों से संवाद करते थे। गाडगिल पर्यावरण वैज्ञानिक होते हुए विज्ञान और मानविकी की सीमाओं को पार कर मानवशास्त्रियों और इतिहासकारों के साथ मिलकर शोध करते थे।

दूसरी, दोनों ने अपने कार्य में सिद्धांत और अनुभव को अनुसंधान के साथ रखा। रोचक तथ्य यह है कि आंद्रे बेते ने शुरुआत नृवंशविज्ञानी के रूप में की, पर बाद में तुलनात्मक समाजशास्त्र की ओर मुड़े, वहीं गाडगिल ने पारिस्थितिकी के अधिक सैद्धांतिक अध्ययन से शुरुआत की और बाद में प्रकृति के साथ मनुष्य के विविध संबंधों पर क्षेत्रीय अध्ययन किए।

तीसरी, दोनों में शिक्षण और संस्थान निर्माण के प्रति गहरी प्रतिबद्धता थी। दोनों ने एक ही संस्थान में 30 से अधिक वर्ष बिताए- आंद्रे बेते का विशेष लगाव दिल्ली विश्वविद्यालय (विशेषकर समाजशास्त्र विभाग) से था, जबकि गाडगिल का भारतीय विज्ञान संस्थान (विशेषकर पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र) से।

चौथी, दोनों अकादमिक जगत से बाहर व्यापक समाज से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे। उन्होंने ऐसी अकादमिक पुस्तकें और शोध पत्र लिखे, जिन्होंने बौद्धिक प्रवृत्तियों को दिशा दी, साथ ही अखबारों में भी नियमित रूप से लेख लिखकर अपने शोध के निष्कर्ष आम नागरिकों तक पहुंचाए।

पांचवीं, दोनों की बौद्धिक दृष्टि अपने मूल प्रांत से बाहर जाकर काम करने के कारण और व्यापक हुई, क्योंकि आंद्रे बेते ने कोलकाता के बजाय दिल्ली में काम किया, जबकि गाडगिल ने पुणे के बजाय बंगलूरू में। इसलिए उनकी दृष्टि उन भारतीय बुद्धिजीवियों से अधिक विशाल थी, जो जीवन भर अपने ही राज्य तक सीमित रहते हैं। आंद्रे बेते का सबसे गहन क्षेत्रीय अध्ययन तमिलनाडु में हुआ, जबकि गाडगिल का कर्नाटक और केरल में, अर्थात अपने-अपने मूल राज्यों से बाहर। फिर भी दोनों ने अपनी जन्मभूमि से संबंध कभी नहीं तोड़ा।

छठी, दोनों भारत के बाहर की दुनिया के प्रति भी जिज्ञासु थे। वे विभिन्न देशों के विद्वानों से संवाद करने और उनके कार्य को गंभीरता से पढ़ने के इच्छुक रहते थे।

सातवीं, मानसिक रूप से संकीर्णता से पूरी तरह मुक्त होने के बावजूद दोनों ने भारत में रहकर ही काम करना और बौद्धिक जीवन में योगदान देना चुना। गाडगिल ने हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़कर स्वदेश लौटने का निर्णय लिया, जबकि आंद्रे बेते ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में प्रोफेसर पद के प्रस्ताव अस्वीकार कर दिल्ली में ही बने रहना उचित समझा।

आठवीं, दोनों देशभक्त थे, पर उन्होंने कभी भी अपने भारत प्रेम का प्रदर्शन नहीं किया। नौवीं, उनकी देशभक्ति अंधभक्ति नहीं थी। वे आयरिश विद्वान बेनेडिक्ट एंडरसन के इस कथन से सहमत होते कि ‘कोई भी व्यक्ति सच्चा राष्ट्रवादी नहीं हो सकता, यदि वह राज्य या सरकार द्वारा किए गए अपराधों, यहां तक कि अपने ही नागरिकों के विरुद्ध अपराधों पर लज्जा महसूस करने में असमर्थ हो।’

दसवीं, अनेक समकालीन प्रोफेसरों के विपरीत न तो आंद्रे बेते और न ही गाडगिल गुरु बनना चाहते थे। वे समझते थे कि जहां वरिष्ठ विद्वान अपने अनुभव और ज्ञान का लाभ दे सकते हैं, वहीं युवा विद्वानों के उत्साह और बौद्धिक जोखिम उठाने की प्रवृत्ति से वे स्वयं भी सीख सकते हैं। यह उनके उदार दृष्टिकोण का हिस्सा था- राजनीतिक और बौद्धिक दोनों ही स्तरों पर वे कठोर नहीं थे, किसी एक विचारधारा से बंधे नहीं थे, बल्कि भारत और विश्व को समझने के लिए खुले मन से प्रयासरत थे।
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