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'मेरे नारीवादी लेखन ने पुरुष समाज को नाराज किया'
कुंदनिका कापड़िया
Updated Fri, 29 Jun 2018 03:31 PM IST
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कुंदनिका कापड़िया
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मैं सुरेंद्रनगर जिले के लिम्बडी में पैदा हुई। मेरी शुरुआती शिक्षा गोधरा में हुई। लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण बाद में मेरी पढ़ाई प्रभावित हुई। चूंकि मेरा बचपन अकेलेपन में बीता, इसलिए मैं लेखन की ओर आकर्षित हुई। प्रेमना आंसू मेरी पहली कहानी थी, जिस पर जन्मभूमि अखबार की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में मुझे दूसरा पुरस्कार मिला। इससे प्रोत्साहित होकर मैंने कहानी लेखन जारी रखा।
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मैंने पत्रकारिता का पेशा अपनाया और वर्षों तक यात्रिक और नवनीत पत्रिकाओं की संपादक रही। मेरे पति मकरंद दवे जाने-माने कवि थे। समाज में महिलाओं की स्थिति ने मुझे बहुत क्षुब्ध किया, इसलिए मैंने पत्रकारिता और साहित्य में औरतों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। मेरी कहानियों और उपन्यासों की महिलाएं पुरुषवर्चस्ववाद के खिलाफ विद्रोह करती हैं। वे समाज के नैतिक मूल्यों पर सवाल करती हैं, जो पुरुष प्रधान समाज को अच्छा नहीं लगता।
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महिला पात्रों को सामने लाने के लिए ही मैंने अपनी रचनाओं में कथानक से अधिक चरित्रों को महत्व दिया है। मेरे कई उपन्यास चर्चित रहे हैं, पर सात पगलां आकाशमां को मैं अपना सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास मानती हूं, जिस पर मुझे साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। इस उपन्यास ने गुजराती महिलाओं की चेतना को इस तरह झकझोर दिया कि यह सामाजिक क्रांति का अग्रदूत बन गया। इस उपन्यास की पात्र वसुधा की पीड़ा से द्रवित होकर महिलाएं मुझे चिट्ठियां लिखती थीं, जबकि अनेक औरतें मेरे पास अपने जीवन की वेदना सुनाने आती थीं। दूसरी ओर, इस उपन्यास से नाराज कुछ पुरुषों ने मुझे धमकी देते हुए कहा कि आपको जेल में होना चाहिए।
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-गुजराती की चर्चित लेखिका।