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अंतर्ध्वनि: मेरे लिए तो कविता भी प्रार्थना के समान एक पावन कर्म है
Mon, 02 Sep 2019 01:48 AM IST
बालमणि अम्मा
बालमणि अम्मा
बालमणि अम्मा
Published by: बालमणि अम्मा
Updated Mon, 02 Sep 2019 01:48 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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मेरा लालन-पालन एक ग्रामीण परिवार में हुआ, जिसमें पूजा के दीप जलते थे। कई पुण्य ग्रंथ भी उस घर में उपलब्ध थे। हर आदमी के मन में एक कवि का अंश विद्यमान है। हर बालक चित्र बनाता है और हर युवक कविता लिखता है। बचपन और यौवन शोभन अनुभूतियों का समय है। मनुष्यात्मा महान प्रेम के बल पर इस विश्व के सहजीवी अन्य व्यक्तियों से तादात्म्य स्थापित करती है। इस तादात्म्य की स्थिति में विशिष्ट अनुभूतियां जाग उठती हैं। तब स्वप्नों के दीपक प्रज्वलित होते हैं।
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आदर्श प्रतिस्थापित होते हैं। वे दीपक कभी न बुझ पाएं। वे बिंब कभी उखड़ न पाएं। उनको एक जीवनकाल तक बनाए रखने के लिए निरंतर साधना आवश्यक होगी। स्नेह और त्याग की साधना कवि के मन को विकसित करती है। कविता महज जीवन का प्रतिबिंब नहीं है, वह जीवन के आंतरिक चैतन्य और उसके सर्वोत्कृष्ट भाव की अभिव्यक्ति है। कवि के भौतिक जीवन की अपेक्षा उसके मानस में टिका आदर्श जीवन कविता के माध्यम से ज्यादा उजागर होता है।
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आदर्श और जीवन के बीच की खाई को पाटने में दूसरे लोगों की अपेक्षा कवि की अपनी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है। मैं नहीं मनती कि कविता कठिनाइयों से किया जाने वाला पलायन है। कविता दुखों का परिमार्जन करके उसे एक उत्कृष्ट रूप प्रदान करने की प्रक्रिया है। कवि जीवन के सुखों के साथ उसके दुखों को भी छानकर पीता है, किंतु वह अश्रु-कण को अपने पाठकों को उसी रूप में नहीं देता।
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कवि उसको हीरे के रूप में बदल देता है। विश्व-प्रेमी कवि को दुख धीरे-धीरे मानसिक परितोष की ओर ले चलता है। मेरे लिए तो कविता भी प्रार्थना के समान एक पावन कर्म है। घरेलू कर्तव्यों को निभाने के बाद प्राप्त होने वाला पूरा समय मैं उसके लिए समर्पित करती हूं। आज के उद्योग-धंधे का युग एक द्रुततर तालक्रम रखता है। उससे तालमेल स्थापित करने में भी कविता सक्षम बनाती है।
(मलयालम की सुप्रसिद्ध कवयित्री।)