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मंजिलें और भी हैं : रक्त की कालाबाजारी रोकने के लिए बनाया ऐप

Fri, 14 Jun 2019 12:53 AM IST
Avdhesh Kumar किरण वर्मा
किरण वर्मा Published by: Avdhesh Kumar Updated Fri, 14 Jun 2019 12:53 AM IST
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An app made to stop blood black marketing
kiran verma - फोटो : अमर उजाला
देश में खून की जरूरत के मुकाबले इसकी आपूर्ति कम है। यदि रक्तदाता की संख्या थोड़ी भी बढ़ जाती है, तो देश में खून से संबंधित सभी जरूरतें पूरी हो सकती हैं। मैं दिल्ली का रहने वाला हूं। मैं सात साल का था, जब कैंसर की वजह से मेरी मां की मौत हो गई। उस वक्त मैं अकेला पड़ गया, लेकिन मन में समाज के लिए कुछ अच्छा करने की इच्छा जगी। फिर एक बार किडनी की बीमारी से ग्रस्त स्कूल टीचर को रक्त की आवश्यकता पड़ी तो, मैंने यह सोचकर रक्त दे दिया कि आंतरिक परीक्षा में मुझे अच्छे नंबर मिल जाएंगे। लेकिन रक्तदान के बाद बाहर निकला, तो उनका परिवार भावुक हो गया। इसके बाद मैं वर्ष में चार बार, दोस्त, भाई, और बहन के जन्मदिन के साथ ही अपने जन्मदिन पर रक्तदान करने लगा।
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चूंकि आर्थिक रूप से संपन्न लोग रक्त का इंतजाम कर लेते हैं, लेकिन गरीबों के लिए यह मुश्किल होता है। यह सोचकर मैं हमेशा सरकारी अस्पताल में रक्तदान करता था। मैं अस्पताल में ब्लड बैंक के बाहर खड़ा रहता था, जिसे जरूरत होती थी, उससे पूछ कर रक्तदान कर देता था। इसके चलते कई लोगों ने मेरा मोबाइल नंबर ले लिया, ताकि जरूरत होने पर फोन कर सकें। इसी दौरान दिसंबर 2016 में एक फोन आया, मुझे बताया गया कि दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में छत्तीसगढ़ के एक गरीब को रक्त की आवश्यकता है। मैंने वहां पहुंचकर रक्तदान कर दिया।
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फिर अचानक सोचा कि जिसके लिए रक्तदान किया है, उससे मिल भी लूं। जब मैं उनके पास पहुंचा तो पता चला कि एक महिला अपना सब कुछ बेच कर पति का इलाज करा रही है, और जो ब्लड मैंने डोनेट किया, वह किसी दलाल के जरिए उसने खरीदा है, मेरे पास जो कॉल आई थी, वह किसी एजेंट की थी। मैं बहुत परेशान हो गया, क्योंकि मैंने रक्तदान उस महिला की सहायता के लिए किया था, पैसे के लिए नहीं। 
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मैंने अपने स्तर से इसके खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास किया, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। यह मेरी जिंदगी का अहम मोड़ था। मैं मार्केटिंग की नौकरी कर रहा था। उसी दिन मैंने सोचा कि इस कालाबाजारी से लोगों को निजात दिलाने के लिए कुछ करना चाहिए। मैंने अपनी नौकरी छोड़ने और रक्तदान के लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाने का फैसला किया, जहां पूरी पारदर्शिता के साथ रक्तदान किया जा सके।

चूंकि मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार से हूं, ऐसे में घर का खर्च चलाने के लिए नौकरी प्रमुख सहारा थी। मेरे परिवार के लोग इस फैसले के खिलाफ थे। जनवरी 2017 में मैंने सिंपली ब्लड ऐप लांच किया। इस बीच मेरे चाचा जो कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे, उन्हें रक्त की आवश्यकता पड़ी, डॉक्टर ने यहां तक बोल दिया कि रक्त न मिलने के चलते कुछ घंटों में इनकी जान जा सकती है। मैंने सिंपली ब्लड ऐप से मदद ली, रक्त चढ़ाने के बाद करीब एक महीने तक वह जीवित रहे। इसके बाद मेरे काम को लेकर मेरे घरवालों के विचार बदल गए, और उन्होंने मेरा सहयोग करना शुरू कर दिया। आज इसे दर्जनों देशों में 10 हजार से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं। 

यह ऐसा मंच है, जहां रक्तदाता अपनी सुविधानुसार जरूरतमंद के लिए रक्तदान कर सकता है। अबतक लगभग 50 हजार लोगों को इसके माध्यम से रक्त दिया जा चुका है। मुझे अक्सर ईमेल, मैसेज और फोन के माध्यम से लोग बताते हैं कि उन्हें इससे सहयोग मिला है, जिससे बहुत खुशी मिलती है। जब आप रक्तदान करते हैं, तो जिसको वह रक्त चढ़ाया जाता है, उससे आपका इंसानियत का रिश्ता जुड़ जाता है। रक्त का कोई धर्म, जाति, राजनीति और संप्रदाय नहीं होता है।
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