नए मुकाम की ओर चीन-पाक रिश्ते
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हाल में जब चीन द्वारा पाकिस्तान में बनाए जा रहे आर्थिक गलियारे के संबंध में दोनों देशों के संबंधों के प्रतीक के तौर पर 'ची-पाक कॉरिडोर' शब्द का इस्तेमाल हुआ, तो बहुत से लोगों को लगा कि यह रिश्ता अब एक नए मुकाम पर पहुंच रहा है। 'ची-पाक' चीन एवं पाकिस्तान के गहरे होते रिश्ते को ही दर्शाता है। पर यह इतना भी अहम नहीं है, क्योंकि इससे पहले 'चींडिया' शब्द का उपयोग भारत और चीन के संबंधों के संदर्भ में होता था। उसी तर्ज पर 'ची-पाक' गढ़ा गया है। भारत और चीन के संबंधों को सकारात्मक दिशा में देखने के लिए 'चींडिया' शब्द ईजाद किया गया था। लेकिन 'ची-पाक' का भी कुछ महत्व तो है ही। 1962 में हुए चीन-भारत युद्ध के बाद चीन तथा पाकिस्तान का जो घनिष्ठ संबंध बना, वह लगातार बढ़ता ही रहा है। एक नए टर्म से इस संबंध में कुछ नया होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
कुछ समय पहले तक पाकिस्तान को अमेरिका का निरंतर समर्थन मिलता रहता था। लेकिन, पाकिस्तान का जो संबंध चीन से है, अमेरिका से उसके जुड़ाव के कारण बिल्कुल अलग रहे हैं। शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान अमेरिका को गठबंधन के एक सहयोगी की हैसियत से मदद कर रहा था। पाकिस्तान ने इसका फायदा उठाया। भारत को अपना प्रतिस्पर्धी मानते हुए जितनी मदद अमेरिका से वह ले सकता था, उसने ली। 9/11 के बाद जब अफगानिस्तान में अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ मुहिम छेड़ी, तो अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ लड़ाई में भी अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद ली। मगर, आतंकवाद के खिलाफ बने इस गठजोड़ में पाकिस्तान खुशी से शामिल नहीं हुआ था, बल्कि यह उसकी एक मजबूरी थी। पाकिस्तान को डर था कि न कहने पर कहीं अमेरिका उसके खिलाफ कार्रवाई न कर दे। इस मौके पर पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ जमकर मोलभाव किया, जिसके तहत उसे आर्थिक एवं सामरिक सहायता समेत काफी मदद मिली। लेकिन अमेरिका का पाकिस्तान से यह जुड़ाव भारत के खिलाफ नहीं था।
जॉर्ज बुश के शासन के दौरान अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान को खुश करने के लिए रणनीतिक सहयोग और पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाई। जबकि चीन के साथ अलग स्थिति है। चीन वैश्विक ताकत नहीं है, अभी वह एक क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है और चीन-पाकिस्तान का संबंध सीधे तौर पर भारत के खिलाफ है। भारत भी चीन के साथ अपने संबंध को सहयोगी रखने की कोशिश कर रहा है। मगर, यह कभी हो नहीं पाएगा, क्योंकि पहले दोनों देश दुश्मन थे और अब ये दोनों रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे के खिलाफ हैं। ऐसे में यह मानना गलत होगा कि पाकिस्तान के मामले में चीन अमेरिका की जगह लेने जा रहा है। हां, भारत के बढ़ते पावर-प्रोफाइल को बैलेंस करने के लिए वह पाकिस्तान को मदद करता रहेगा। पाकिस्तान और चीन के बीच बनाए जा रहे आर्थिक गलियारे की भी चर्चा खूब है। यह आर्थिक गलियारा बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट से शुरू होकर गिलगिट-बाल्टिस्तान (पीओके) होते हुए चीन के काशगर में शिनजियांग पर खत्म होगा। पाकिस्तान अगर यह सोच रहा है कि चीन से 46 अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है, जो उसे आर्थिक फायदा पहुंचाएगा, तो यह उसका भ्रम है। चीन ने अपना बहुत सारा पैसा, तकनीक, इंजीनियर्स, मजदूर, तकनीशियनों को वहां लगा रखा है, क्योंकि यह आर्थिक गलियारा उसकी न्यू सिल्क रूट की व्यापक योजना का हिस्सा है। इसमें चीन को रणनीतिक तौर पर फायदा हो सकता है। हालांकि, पाकिस्तान में इस परियोजना के आर्थिक फायदे गिनाने वाले लोगों की कमी नहीं है।
पाकिस्तान के आर्मी चीफ राहील शरीफ परोक्ष रूप से भारत पर आरोप लगाते हैं कि विदेशी शक्तियां इस महत्वाकांक्षी आर्थिक गलियारे को अस्थिर कर रही हैं। जबकि पाकिस्तान सरकार और वहां की आर्मी को यह नजर नहीं आता कि बलूचिस्तान और पीओके के लोग आखिर क्या चाहते हैं? क्या उन्होंने बलूचिस्तान, पीओके या अन्य इलाकों के लोगों की राय को इस परियोजना के निर्माण में शामिल किया है? क्या यह जानने की कोशिश की गई कि पीओके के उत्तरी क्षेत्र में जो निर्माण हो रहा है, क्या उससे स्थानीय लोग खुश हैं? स्थानीय लोग इस परियोजना से खुश नहीं हैं, क्योकि वे जानते हैं कि उन्हें इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है। पहले इस कॉरिडोर को पख्तूनख्वा इलाके से होकर जाना था। उस इलाके के लोगों ने इसमें अपनी राय को शामिल करने की मांग की थी, लेकिन पाकिस्तानी सामंतवादी सरकार से इसकी इजाजत मिलना मुमकिन नहीं था। अंततः पाकिस्तान और चीन ने मिलकर इस कॉरिडोर का रास्ता ही बदल दिया। अब यह पख्तूनख्वा के बजाय पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से होकर जाएगा। इससे पख्तूनख्वा के लोग बहुत नाखुश हैं। भारत पर बार-बार अंगुली उठाने के बजाय पाकिस्तान को पहले यह देखना चाहिए कि क्या उसके देश के लोग खुश हैं या नहीं?
एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आर्थिक गलियारा पीओके से होकर गुजर रहा है, जो एक विवादास्पद क्षेत्र है। लेकिन, जब 46 अरब डॉलर की इस परियोजना की घोषणा 'ची-पाक' ने की, तो भारत से इस बारे में बातचीत नहीं हुई थी। दूसरी ओर भारत जब दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज करता है, तो चीन कहता है कि यह विवादास्पद क्षेत्र है। आखिर चीन की यह दोहरी नीति कब तक चलेगी? भारत को इस पर सवाल पूछना चाहिए। चीन और भारत के बीच ये जो मतभेद हैं, इसकी वजह से पाकिस्तान भारत पर सवाल खड़े कर रहा है। जबकि भारत सिर्फ विरोध कर रहा है और कह रहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए। स्थानीय लोगों के विरोध को देखें, तो भविष्य में यह एक संवेदनशील मुद्दा बन सकता है और ऐसे में इसका सबसे अधिक नुकसान पाकिस्तान और चीन को ही होगा।
जेएनयू के प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ