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दूसरा पहलू: बदलती स्क्रीन ने यादों का अंदाज भी बदल दिया, आज विज्ञापन स्मृतियों का हिस्सा क्यों नहीं बन पाते?
सार
एक ऐसा दौर भी था, जब कुछ सेकंड के विज्ञापन लोगों की स्मृतियों में बस जाते थे। पर, आज बदलती स्क्रीन ने यादों का अंदाज भी बदल दिया। ‘निरमा’ और ‘रसना’ जैसे विज्ञापनों की धुनें स्मृतियों में बस जाती थीं, पर आज एल्गोरिदम के दौर में तकनीक तो बढ़ी, पर मानवीय संवेदनाएं गायब हो गईं।
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विज्ञापन की दुनिया में बदलाव
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
एक दौर था, जब शाम के ठीक आठ बजे बैठक के लकड़ी वाले कैबिनेट का शटरनुमा दरवाजा खुलता था और दूरदर्शन की परिचित धुन के साथ पूरा घर एक जादुई सम्मोहन में बंध जाता था। कार्यक्रमों के बीच आने वाले विज्ञापनों की भी अपनी एक अलग दुनिया थी। अचानक एक धुन बजती, ‘वाशिंग पाउडर निरमा...’ और घर के कई सदस्य अनायास उसके अगले शब्द गुनगुनाने लगते। फिर, स्क्रीन पर एक छोटी बच्ची आती और मासूमियत से बोल उठती, ‘आई लव यू, रसना!’
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भारतीय विज्ञापन इतिहास के दस्तावेजी अध्ययन बताते हैं कि निरमा का जिंगल और रसना का यह संवाद विज्ञापनों की सीमा लांघकर जनमानस की लोकप्रिय भाषा का अंग बन गए थे। आज दूरदर्शन व केबल टीवी के उस साझा आंगन से निकलकर हम स्मार्टफोन के डिजिटल मंचों की अधिक व्यक्तिगत स्क्रीन पर आ गए हैं। बेशक आज विज्ञापनों की संख्या बढ़ी है, पर सवाल है कि क्या वे आज भी निरमा, रसना, कैडबरी और फेविकोल की तरह हमारी स्मृति में बसते हैं?
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मीडिया शोध संस्था ‘ल्यूमेन रिसर्च’ के एक विश्लेषण के अनुसार, 30 सेकंड के टीवी विज्ञापन पर आंखों का औसत ठहराव 13.8 सेकंड, जबकि 15 सेकंड के यूट्यूब विज्ञापन पर 4.9 सेकंड रहा। इससे स्पष्ट है कि डिजिटल विज्ञापनों को कम समय में दर्शकों का ध्यान खींचना पड़ता है।
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हालांकि, वैश्विक शोध फर्म ‘नीलसन’ के अनुसार, असर केवल स्क्रीन के माध्यम से तय नहीं होता, बल्कि कहानी, उसकी प्रस्तुति और सामग्री का प्रारूप भी तय करते हैं कि कोई संदेश दर्शकों के मन में कितनी गहराई और कितने समय तक बना रहता है। तकनीक यह आसानी से बता देती है कि कितनों ने विज्ञापन देखा, क्लिक किया या खरीदारी की, पर किसी धुन, संवाद या कहानी का वर्षों तक स्मृति में बने रहना एक जटिल मानवीय प्रक्रिया है।
किसी विज्ञापन को यादगार बनाने के लिए आज भी भाषा, कहानी, संगीत और मानवीय संवेदना और सामूहिकता की जरूरत होती है, जो तकनीक नहीं कर सकती। इंटरनेट की दुनिया में यही मानवीय संवेदना और सामूहिकता गायब है।