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गरीब कैदियों को जमानत ना मिल पाना भी अन्याय, आखिर कब मिलेगा न्याय?

Tue, 03 Dec 2024 12:07 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 03 Dec 2024 12:07 PM IST
सार

हमारे देश में गरीब कैदियों का जमानत मिलना एक बहुत मुश्किल और जटिल प्रक्रिया है, जबकि अमीर आरोपी जल्दी रिहा हो जाते हैं। सरकार ने गरीब कैदियों की मदद के लिए योजना बनाई है लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति ज्यों की त्यों हैं।

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Why most Indian prisoners fight long lonely battle for justice in hindi
सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि न्याय का सिद्धान्त तब तक किसी आरोपी को निर्दोष मानता है जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए। - फोटो : ani

विस्तार

न्याय किसी भी शासन व्यवस्था का एक अभिन्न अंग होता है और समानता उस न्याय व्यवस्था का एक मौलिक आधार है। अगर न्यायिक व्यवस्था में अमीर गरीब के भेद की गुजांइश हो तो वह व्यवस्था न केवल अपूर्ण होती है बल्कि न्याय के बजाय अन्याय को भी जन्म देती है जिसका परिणाम असन्तोष और अराजकता के रूप में सामने आ सकता है।

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विख्यात् फिल्म अभिनेता सलमान खान को 7 अप्रैल 2018 को जोधपुर की जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत से जमानत मंजूर होने पर मात्र कुछ ही घंटों में जेल से रिहा कर दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर सेंटर फॉर रिसर्च एंड प्लानिंग (सीआरपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार- 
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दिसंबर 2023 में ट्रायल कोर्टों द्वारा जमानत मंजूर होने के बावजूद 24,879 गरीब आरोपी जेलों में बंद थे, क्योंकि वे जमानत ब्रॉण्ड पेश नहीं कर सके। यही नहीं देश की जेलों में हजारों की संख्या में विचाराधीन कैदी बिना सजा सुनाए 5 साल से अधिक समय से सजा भुगत रहे हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट 2019 के एक फैसले में कह चुका है कि जमानत राशि का भुगतान न कर पाने की स्थिति में कैदियों को जेल में रखना अवैध और कैदी के संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

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सरकारी योजना से भी वंचित गरीब कैदी

न्यायमूर्ति अभय ओका और ए.जी मसीह की सुप्रीम कोर्ट की खण्डपीठ ने जमानत राशि अदा न कर सकने वाले कैदियों को रिहा न किए जाने पर इसी महीने हैरानी जताई है। इससे पहले भी सर्वाेच्च अदालत 2023 और 2021 में इस मुद्दे पर चिन्ता जताने के साथ ही सरकार को गरीब कैदियों की जमानत पर रिहाई की व्यवस्था करने का निर्देश दे चुकी थी, जिसके अनुपालन में केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2023 के बजट में गरीब कैदियों के लिए जमानत पर रिहा होने के लिये वित्तीय सहायता का प्रावधान किया था।


इस योजना में जिला कलेक्टरों की अध्यक्षता वाली अधिकार प्राप्त समिति की मंजूरी के आधार पर विचाराधीन कैदियों के लिए 40,000 रुपये और दोषियों के लिए 25,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता का प्रावधान है। योजना को लागू करने के लिए 23 मई 2023 को गृह मंत्री अमित शाह ने सभी मुख्य मंत्रियों को और फिर 23 अक्टूबर 2023 को गृह मंत्रालय के उपसचिव अरुण सोब्ती ने सभी राज्यों के गृह सचिवों और पुलिस प्रमुखों को पत्र लिख कर इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने को कहा था। लेकिन बावजूद इन प्रयासों के अदालत से जमानत मिलने पर भी बड़ी संख्या में गरीब कैदियों का जेल से न छूट पाना हमारी अपराधिक न्याय व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह ही है।


कहां है निष्पक्षता और समानता?

भारत की न्याय प्रणाली निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों पर आधारित है। मगर व्यवहार में यह प्रणाली उन लोगों को प्राथमिकता देती है जिनके पास धन और प्रभाव है, जिससे वे कानूनी राहत को शीघ्रता से प्राप्त कर लेते हैं। जबकि आर्थिक रूप से कमजोर नागरिक जेलों में पड़े रहते हैं। न्याय भी अक्सर महंगे और सस्ते तथा सुलभ वकीलों पर निर्भर करता है, इसलिए समाज में कई अहंकारी आज भी न्याय खरीदने का दंभ भरते हें।

फैसले तक आरोपी निर्दोष माना जाता है

देखा जाए तो जमानत का उद्देश्य अभियुक्त के अधिकारों और अदालत में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाना है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि न्याय का सिद्धान्त तब तक किसी आरोपी को निर्दोष मानता है जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए। सन् 2023 की एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार उस समय भारत की जेलों में 5,73,000 से अधिक कैदियों में 75 प्रतिशत से अधिक ऐसे विचाराधीन हैं जिन पर आरोप सिद्ध नहीं हुए थे।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम् जेल सांख्यकी के अनुसार 31 दिसम्बर 2021 को भारतीय जेलों में कुल 4,27,165  विचाराधीन कैदी थे जिनमें से 11,490 कैदी अदालत से जमानत मिलने पर भी जेलों में निरुद्ध थे। इन विचाराधीन बंदियों में 382 महलाएं भी थीं। इन विचाराधीन बंदियों में 1,07,946 अनपढ़ कैदी थे जिन्हें अपने अधिकारों और न्यायिक प्रकृया का ज्ञान ही नहीं था। न्याय पर रुतबे और धन का जीता जागता उदाहरण फिल्म अभिनेता सलमान खान का 2018 का मामला है।

 


जमानत पर रिहा न होना मानवाधिकार का हनन

जमानत पर रिहा न हो सकने वाले कैदियों की लंबी हिरासत का उन पर और उनके परिवार पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। उनके परिवार मुख्य कमाने वाले को खो देते हैं और वे गरीबी में और गहरे धंस जाते हैं। बच्चों को अक्सर स्कूल छोड़ना पड़ता है। जबकि परिवार जेल में बंद अपने प्रियजनों के कारण कलंक और अलगाव झेलते हैं। ऐसे गरीब बंदियों के परिवार का विभिन्न तरीके से शोषण के मामले भी प्रकाश में आए हैं। भीड़भाड़ वाली, अमानवीय परिस्थितियों में रहना और भविष्य की अनिश्चितता उनकी गरिमा और न्यायिक प्रणाली में विश्वास को नष्ट कर देती है। बरी होने पर उनका जीवन आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से अक्सर बहुत प्रभावित हो चुका होता है। जेलें बीमारियों का घर होती हैं। कई विचाराधीन कैदी लम्बे समय बाद जेल से छूट तो जाते हैं लेकिन वे घर पहुंचते हैं तो उनके साथ असाध्य रोग भी होते हैं।

नहीं मिल रहा कल्याणकारी कानूनों का लाभ

गरीब कैदियों की लंबे समय तक हिरासत को रोकने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं लेकिन उनका क्रियान्वयन अपर्याप्त है। पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 436ए उन विचाराधीन कैदियों की रिहाई को अनिवार्य करती है, जिन्होंने उनके आरोपित अपराध की अधिकतम सजा का आधा समय जेल में बिताया जा चुका है। इसी प्रकार, 2005 में मामलों को तेजी से निपटाने और अदालतों पर बोझ कम करने के लिए दोष-स्वीकृति को पेश किया गया था। हालांकि, इन प्रावधानों का उपयोग बहुत कम होता है। जमानत के लिए आर्थिक स्थितियों पर विचार किए बिना केवल वित्तीय जमानत पर निर्भर रहना दंडात्मक प्रणाली को बढ़ावा देता है।

गरीबों के लिए कानूनी सहायता सेवाएं, जो उनकी मदद करने के लिए बनाई गई हैं, अक्सर संसाधनों की कमी से जूझती हैं और व्यक्तिगत बांड या सामुदायिक गारंटी जैसे विकल्पों की वकालत करने में विफल रहती हैं।

अपराधिक न्याय व्यवस्था स्वयं कठघरे में-

भारत की न्याय प्रणाली एक चौराहे पर है। गरीब कैदियों की लगातार कैद, कानूनी प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के बावजूद, संवैधानिक आदर्शों को व्यवहार में बदलने में विफलता को दर्शाती है। आर्थिक स्थिति को आजादी तक पहुंच के लिए बाधा नहीं बनने देना न्यायपालिका में विश्वास बहाल करने के लिए आवश्यक है। गरीब कैदियों की दुर्दशा समाज में व्याप्त गहरी असमानताओं की याद दिलाती है। यह नीति-निर्माताओं, कानूनी पेशेवरों और नागरिक समाज के लिए एकजुट होकर एक अधिक समावेशी और न्यायसंगत् प्रणाली बनाने का आह्वान है। सच्चा न्याय तभी संभव है जब हर व्यक्ति, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, अपने अधिकारों तक समान पहुंच रखे।

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