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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Spirituality: Rebirth Within the Same Body and the Journey to the Infinite Realm of Self-Realization

अध्यात्म: इसी देह में पुनर्जन्म और अनंत विश्व की परम अनुभूति

Sun, 04 Oct 2026 04:35 PM IST
Dhananjay Tiwari धनंजय तिवारी
Updated Sun, 04 Oct 2026 04:35 PM IST
सार

Path of Self Realization in Spirituality: अध्यात्म मनुष्य को इसी जीवन में आत्म-पुनर्जन्म देकर सांसारिक भ्रम और भय से मुक्त करता है। ज्ञान के निरंतर अभ्यास से अंतःकरण शुद्ध होता है और मनुष्य स्वार्थ छोड़कर 'वसुधैव कुटुंबकम' के भाव से विश्व कल्याण के लिए समर्पित हो जाता है।

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Spirituality: Rebirth Within the Same Body and the Journey to the Infinite Realm of Self-Realization
अध्यात्म में पुनर्जन्म - फोटो : Freepik.com

विस्तार

Rebirth in Same Life Spirituality: स्वयं अध्यात्म वह अनंत विश्व है, जिसमें प्रत्येक मनुष्य इसी जीवन में पुनर्जन्म लेकर जी सकता है और ब्रह्मांड के अनंत ज्ञान का रसास्वादन कर सकता है। इसी जीवन में पुनर्जन्म लेने वाला मनुष्य वह पुराना व्यक्ति नहीं रह जाता जो भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए स्वयं को या अन्य जीव-जंतुओं को कष्ट पहुंचाए। वह मनुष्य अब निश्चल, सदाचारी और अपने हित से बढ़कर विश्व का कल्याण करने वाला उदार व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसे मनुष्य भले ही युगों में जन्म लेते हैं, परंतु अगर एक साधारण मनुष्य भी सच्चा संकल्प करे, तो वह भी इस अवस्था को प्राप्त कर सकता है।
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अध्यात्म: साधारण मनुष्य का इसी देह में पुनर्जन्म
समस्त सांसारिक मनुष्यों के पास अपनी एक बुद्धि होती है, जिसे हम मस्तिष्क या मन कहते हैं। यह मस्तिष्क सिर्फ उन सूचनाओं और ज्ञान का विश्लेषण कर सकता है जो हमें अपने आसपास से, समाज से या पुस्तकों के माध्यम से प्राप्त होता है। परंतु वास्तविकता यह है कि अधिकांश मनुष्य केवल उसी ज्ञान को सत्य मानते हैं जो उनके अपने हित में हो, उन्हें तात्कालिक आनंद दे और उन्हें सांसारिक वस्तुओं से अलग न करे।
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जरा विचार कीजिए, आप जो विचार करते हैं, क्या वे वास्तव में आपके अपने मौलिक विचार हैं? या फिर आपने दूसरों के माध्यम से आए उन विचारों को सिर्फ इसलिए स्वीकार कर लिया है क्योंकि वे आपको लुभावने या अच्छे लगने लगे थे? जिस क्षण मनुष्य को यह बोध होने लगता है कि जिसे उसे स्वयं अपनी दृष्टि से देखना और समझना चाहिए था, उसे वह दूसरों की आंखों से देख रहा है, ठीक उसी क्षण उसके भीतर वास्तविक परिवर्तन की नींव पड़ती है।

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इसे एक उदाहरण से समझिए: यदि एक दृष्टिबाधित व्यक्ति से कोई कहे कि 'यहां बहुत अंधेरा है', तो उस दृष्टिबाधित व्यक्ति को मानसिक स्तर पर कोई अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह बाहरी अंधेरे या उजाले की धारणाओं और भ्रम से मुक्त है। परंतु यह कहने वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति को देखें, तो वह केवल अंधेरे के विचार मात्र से भीतर से बेचैन और भयभीत हो जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसे उजाले में रहने की आदत है और उसके भीतर किसी न किसी चीज़ को खोने का अनजाना डर व्याप्त है-जबकि वास्तव में उस अंधेरे में भयभीत होने जैसा कुछ था ही नहीं। जब मनुष्य को यह समझ आ जाता है कि उसका भय और उसकी धारणाएं केवल दूसरों की दी हुई हैं, तब वह इसी देह में रहते हुए उस आत्म-पुनर्जन्म की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है, जहां से उसका अंतःकरण पूरी तरह शुद्ध और निर्मल होना शुरू हो जाता है।


अध्यात्म: अनंत विश्व में प्रवेश का मार्ग

इस विश्व में प्रवेश का केवल एक ही साधन है-और वह है ज्ञान। परंतु यह ज्ञान कोई मात्र किताबी ज्ञान नहीं है, जिसे केवल पढ़कर या सुनकर मनुष्य इस उच्च अवस्था को प्राप्त कर ले। इसे जीना पड़ता है-प्रतिक्षण और प्रतिदिन। निरंतर अभ्यास के इसी प्रवाह से व्यक्ति उस स्थिति में पहुंचता है, जहां उसे इसी जीवन में एक नए जन्म का अनुभव होता है और वह धीरे-धीरे परम आनंद का रसास्वादन करने लगता है।

यहां एक बात का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है: इस आध्यात्मिक विश्व के लिए किसी काल्पनिक दुनिया की कल्पना नहीं करनी पड़ती। इसके विपरीत, अंतःकरण में ज्ञान के निरंतर अभ्यास से स्वयं को एक ऐसे दृष्टिकोण में ढालना पड़ता है, जहाँ आप संसार में रहते हुए भी भीतर से निष्काम और सुदृढ़ रहें। परंतु बाहर से, संसार के सभी मनुष्यों के लिए आप वही सहज सांसारिक व्यक्ति बने रहें और अपने आचरण से सभी को आनंद प्रदान करते रहें।


अध्यात्म: अनंत विश्व का स्वरूप

इस आध्यात्मिक अनंत विश्व के विस्तार की कोई सीमा या थाह नहीं है, और न ही इसका कोई निश्चित आकार-प्रकार है। जब भी कोई मनुष्य ज्ञान के माध्यम से इस विश्व में प्रवेश पाता है, तो वह अपनी दिव्य चेतना और संकल्प से इस अनंत विश्व को आकार देने लगता है। जिस प्रकार पौराणिक मान्यताओं में देवों को सामर्थ्य प्राप्त होता है, उससे कहीं अधिक सामर्थ्य और आंतरिक बल इस आध्यात्मिक विश्व में स्थिति पाने वाले मनुष्य को प्राप्त होता है।


अध्यात्म: अनंत विश्व के मनुष्यों की स्थिति

अध्यात्म के इस अनंत विश्व में मुख्य रूप से दो प्रकार के मनुष्य निवास करते हैं। पहले वे, जो सदा आनंदित रहते हैं। दूसरे वे, जो स्वयं आनंद का रूप हो चुके हैं-अर्थात ऐसे मनुष्यों को न तो बाहर से आनंद की आवश्यकता होती है और न ही संसार का कोई भौतिक तत्व उन्हें प्रभावित कर सकता है। वे स्वयं ही आनंद स्वरूप हैं। थोड़ा गहरी दृष्टि से देखकर समझें, तो वे 'शून्यता' की उस परम स्थिति को प्राप्त कर चुके होते हैं, जहां उनके होने या न होने से स्वयं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, परंतु उनके कर्मों से पूरे विश्व पर कल्याणकारी प्रभाव अवश्य दिखाई देता है।

इस आध्यात्मिक विश्व का मनुष्य चाहे किसी भी श्रेणी का हो, वह सदैव बिना किसी लाभ-हानि की चिंता किए पूरी तरह निस्वार्थ भाव से कर्म करता है। यहां साधारण मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि बिना किसी स्वार्थ के कोई मनुष्य भला कर्म ही क्यों करेगा? क्योंकि सामान्य मानव स्वभाव वाले तो अपने ही हित को पहली वरीयता देते हैं।

इसका उत्तर यह है कि ऐसे आध्यात्मिक मनुष्य की चेतना स्वयं के और इस अनंत सृष्टि के बीच के सभी भेदों को पूरी तरह मिटा देती है। उसके लिए स्वयं का अस्तित्व और अनंत विश्व एकाकार हो जाते हैं। जब कुछ अलग बचा ही नहीं, तो लाभ और हानि का प्रश्न भी समाप्त हो जाता है। लाभ-हानि का विचार तो केवल वही व्यक्ति करता है, जो स्वयं को संसार से अलग और पृथक समझता है। वास्तविकता यह है कि ऐसा मूढ़ मनुष्य न तो जीवन भर सच्चा आनंद पा पाता है और न ही उस ज्ञान को समझ पाता है जो परम आनंद की अनुभूति कराता है।

इसके विपरीत, इस आध्यात्मिक विश्व के सभी मनुष्य 'वसुधैव कुटुंबकम' के मूल भाव को गहराई से जीते हैं, इसलिए वे सदैव विश्व-कल्याण के लिए तत्पर रहते हैं। इस विश्व के लोगों के लिए कोई 'अपना' या 'पराया' नहीं होता, बल्कि सारा विश्व ही उनका अपना होता है। वे जीवन में पूरी तरह निर्बाध हो जाते हैं- कोई भी सांसारिक बाधा उन्हें डिगा नहीं पाती, बल्कि वे दूसरों की बाधाओं को हरने वाले बन जाते हैं। जिस प्रकार परमपिता समस्त चराचर जीव-जगत पर समान रूप से कृपा बरसाते हैं, ठीक वैसे ही इस आध्यात्मिक अवस्था में रहने वाला प्रत्येक मनुष्य पूरे विश्व को अपनी करुणा, दया और प्रेम प्रदान करता है।


अध्यात्म: अनंत विश्व की विशेषताएं

वास्तविक अर्थों में यही वह विश्व है जहां प्रेम और आनंद की नदियां बहती हैं, और ये नदियां समुद्र रूपी अनंत विश्व में जाकर मिल जाती हैं। इस विश्व में किसी भी प्रकार के नकारात्मक भाव उत्पन्न नहीं होते। अगर नकारात्मक भाव किसी व्यक्ति-विशेष के मन में उत्पन्न भी हो जाएं, तो उसके अंतःकरण में यहां के प्रेरक वातावरण के प्रभाव से उनका अति-शीघ्र निदान हो जाता है। अर्थात इस विश्व में सभी प्रकार के नकारात्मक भावों का पूरी तरह से नाश हो जाता है।

निष्कर्ष: अध्यात्म ही स्वर्ग है
उपर्युक्त सभी बातों का अगर गहराई से मंथन किया जाए, तो यह आध्यात्मिक विश्व कोई और नहीं, बल्कि धरा पर जीवित मनुष्यों द्वारा अनुभव किया जाने वाला स्वर्ग ही है। अतः हम कह सकते हैं कि इस धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है, तो वह केवल अध्यात्म ही है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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