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उत्तर-प्रदेश की राजनीति: एक थीं मायावती! वो कहां गुम हो गईं?
सार
कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति की धुरी रहीं मायावती का प्रभाव नोटबंदी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर लगातार सिमटा है। न विपक्ष उन्हें पूरी तरह अपना मानता है, न सत्ता पक्ष उन्हें अनिवार्य प्रतिद्वंद्वी। सवाल है- क्या राष्ट्रीय राजनीति में मायावती अब अप्रासंगिक होती जा रही हैं?
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बसपा सुप्रीमो मायावती
- फोटो : ANI
विस्तार
एक थी मायावती। कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका नाम ही काफी था। उनके भाषणों में आक्रामकता थी, नारों में चुनौती थी और राजनीतिक फैसलों में ऐसा आत्मविश्वास था कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, कोई भी उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता था। कांशीराम के साथ बहुजन आंदोलन से निकली मायावती ने राजनीति की उस सीढ़ी को पार किया, जिस पर चढ़ना कभी असंभव माना जाता था।
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वह चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर यह साबित किया कि दलित राजनीति केवल विरोध की राजनीति नहीं, सत्ता हासिल करने की भी राजनीति हो सकती है। लेकिन आज वही मायावती राष्ट्रीय राजनीति में लगभग हाशिये पर दिखाई देती हैं।
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बगैर मायावती नहीं बनती थी दिल्ली की रणनीति
मायावती के राजनीतिक पतन की चर्चा में एक महत्वपूर्ण मोड़ 2016 की नोटबंदी के बाद का दौर भी है। नोटबंदी पर मायावती ने केंद्र सरकार के फैसले का विरोध किया था, लेकिन इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष जिस तरह मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट होता गया, मायावती उस मोर्चे की स्थायी साझेदार नहीं बनीं। यही वह दौर था जब उनकी राष्ट्रीय राजनीति और ज्यादा अलग-थलग दिखाई देने लगी। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि केवल नोटबंदी ने मायावती को हाशिये पर पहुंचाया।
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उनके राजनीतिक पतन के पीछे संगठन की कमजोरी, सामाजिक आधार में बदलाव, नए दलित नेतृत्व का उभार और भाजपा तथा सपा की बदली हुई रणनीतियां भी जिम्मेदार रहीं। लेकिन नोटबंदी के बाद का दौर जरूर ऐसा रहा, जब राष्ट्रीय राजनीति में उनकी दृश्यता और प्रभाव तेजी से घटता दिखाई दिया।
विपक्ष के साथ भी नहीं, सत्ता के साथ भी नहीं!
यही उनकी राजनीति की सबसे बड़ी पहेली है। वह विपक्ष के पक्ष में भी पूरी तरह नहीं रहतीं और सत्ता पक्ष के साथ भी स्थायी रूप से नहीं जातीं। वह अक्सर विपक्ष के खिलाफ ही बोलती हैं, लेकिन सत्ता की साझा राजनीति का हिस्सा बनने से भी बचती हैं। यही कारण है कि उन्हें विपक्षी नेता कहना भी आसान नहीं है। वह पारंपरिक अर्थों में सत्तापक्ष की सहयोगी भी नहीं हैं और विपक्षी गठबंधन की नियमित सहभागी भी नहीं। उनकी राजनीति एक तरह की स्वतंत्र राजनीतिक धुरी बन गई है- लेकिन समस्या यह है कि वह धुरी अब उतनी मजबूत नहीं रही, जितनी कभी हुआ करती थी।
राष्ट्रीय राजनीति में इसका सीधा असर पड़ा। आज स्थिति यह है कि सत्तापक्ष भी मायावती को राष्ट्रीय स्तर पर उतनी गंभीर चुनौती नहीं मानता और मुख्य विपक्ष भी उन्हें अपनी रणनीति का अनिवार्य हिस्सा नहीं मानता। उत्तर प्रदेश में बसपा का वोट प्रतिशत चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है, लेकिन दिल्ली की सत्ता की लड़ाई में मायावती की भूमिका पहले जैसी निर्णायक नहीं दिखाई देती।
यह शायद किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए सबसे कठिन स्थिति होती है- आपके पास अपना आधार हो, आपकी अपनी पार्टी हो, आपका अपना वोट बैंक हो, लेकिन देश की बड़ी राजनीतिक लड़ाई में बाकी दल आपको निर्णायक खिलाड़ी न मानें।
पक्ष प्रतिपक्ष अब दोनों नहीं चाहते नजदीकी
यही वह बिंदु है जहां “एक थी मायावती” का सवाल और गहरा हो जाता है। कभी भाजपा और सपा दोनों को मायावती की जरूरत पड़ती थी। कभी वह किसी गठबंधन को बहुमत तक पहुंचाने वाली ताकत थीं, तो कभी उनका विरोध किसी राजनीतिक दल के लिए बड़ा मुद्दा बन जाता था। आज स्थिति उलट गई है। भाजपा के पास अपना विस्तृत सामाजिक गठबंधन है, सपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी नई राजनीतिक जमीन बनाई है और कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता की कोशिश करती है। इन बड़े राजनीतिक खेमों के बीच बसपा का स्वतंत्र रास्ता अब पहले जितना प्रभावशाली दिखाई नहीं देता।
इसका अर्थ यह नहीं कि मायावती की राजनीति समाप्त हो गई। बल्कि असली सवाल यह है कि क्या उन्होंने खुद को उस राजनीतिक स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां दूसरे दलों को उनकी जरूरत महसूस नहीं होती?
राजनीति में अलग रहना तभी ताकत बनता है जब आपके पास इतना मजबूत जनाधार हो कि हर पक्ष आपको साथ लेने को मजबूर हो। अगर वही जनाधार लगातार कमजोर हो जाए, तो स्वतंत्र राजनीति धीरे-धीरे अलगाव में बदल सकती है। मायावती के सामने आज शायद यही सबसे बड़ा संकट है।
बदलती गईं तिलक-तराजू से ब्राह्मण शंख तक
कभी उनकी राजनीति का आधार था- बहुजन बनाम सत्ता का सामाजिक ढांचा। फिर उन्होंने उसी राजनीति को बदलकर सर्वजन का प्रयोग किया। 2007 में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ ने उन्हें पूर्ण बहुमत दिलाया। “ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा” जैसे नारों ने उस सामाजिक प्रयोग को राजनीतिक भाषा दी। लेकिन 2007 के बाद वह सामाजिक इंजीनियरिंग स्थायी राजनीतिक मॉडल नहीं बन सकी। दूसरी तरफ दलित समाज के भीतर नई पीढ़ी का नेतृत्व उभरा।
चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं ने आंदोलन की राजनीति के जरिए युवा दलितों के बीच जगह बनाई। बसपा के सामने अब चुनौती केवल भाजपा और सपा नहीं, बल्कि अपने ही पारंपरिक सामाजिक आधार के भीतर उभरती नई राजनीति भी है।
कभी बहन जी का बयान बनता था राष्ट्रीय मुद्दा
मायावती की राजनीति का एक समय सबसे बड़ा आकर्षण उनका आक्रामक आत्मविश्वास था। वह विरोधियों को सीधे चुनौती देती थीं। दलित सम्मान, सामाजिक हिस्सेदारी और सत्ता में प्रतिनिधित्व उनके भाषणों के केंद्रीय विषय रहे। उनकी राजनीति का मूल संदेश साफ था कि जिस समाज की संख्या अधिक है, उसे सत्ता में उसकी हिस्सेदारी भी मिलनी चाहिए। इसी सोच ने बाद में “जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” जैसे राजनीतिक संदेशों को ताकत दी। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या मायावती की राजनीतिक भाषा बदलते समय के साथ बदल रही है?
आखिर गईं कहां वह आक्रामक मायावती
2012 में सत्ता गंवाने के बाद बसपा की गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी उसे बड़ा झटका लगा। 2019 में सपा के साथ गठबंधन ने बसपा को लोकसभा में 10 सीटें जरूर दिलाईं, लेकिन यह प्रयोग लंबे समय तक नहीं चला। 2022 के विधानसभा चुनाव तक तस्वीर और बदल चुकी थी। पार्टी का वोट आधार सिकुड़ता दिखाई दिया और सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हुआ कि क्या बसपा का पुराना सामाजिक समीकरण टूट रहा है?
यहीं से मायावती की राजनीति के सामने नई चुनौती दिखाई देने लगी। दलित राजनीति अब केवल एक चेहरे तक सीमित नहीं रह गई। चंद्रशेखर आजाद जैसे नए नेता दलित युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने लगे। उनका आंदोलनकारी अंदाज और सड़क पर दिखाई देने वाली सक्रियता मायावती की अपेक्षाकृत शांत राजनीति से अलग थी। दूसरी ओर भाजपा ने भी दलित समाज के भीतर अपनी राजनीतिक पहुंच लगातार बढ़ाई।
समाजवादी पार्टी ने पिछड़े, दलित और अन्य सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश की। यानी जिस राजनीतिक जमीन पर कभी बसपा का लगभग एकाधिकार दिखाई देता था, वहां अब कई दावेदार खड़े हो चुके हैं।
बसपा का अगला चेहरा कौन?
मायावती ने नई पीढ़ी के नेतृत्व के लिए भतीजा आकाश आनंद को आगे बढ़ाया। कुछ समय के लिए लगा कि बसपा में नई ऊर्जा आ सकती है। आकाश आनंद के भाषणों में मायावती की पुरानी आक्रामक राजनीति की झलक भी दिखाई दी। लेकिन उनके राजनीतिक सफर में उतार-चढ़ाव और संगठनात्मक फैसलों ने यह सवाल भी पैदा किया कि मायावती के बाद बसपा का नेतृत्व किसके हाथ में होगा।
यही बसपा की सबसे बड़ी संरचनात्मक चुनौती है। कांशीराम के बाद मायावती पार्टी की निर्विवाद धुरी बन गईं और पार्टी का पूरा राजनीतिक व्यक्तित्व उनके इर्द-गिर्द सिमटता गया। अब सवाल है कि उनके बाद वह संगठन कितनी मजबूती से खड़ा रह पाएगा।
अब आवाज हलचल क्यों नहीं पैदा करती
असल समस्या शायद यह नहीं है कि मायावती बोलती कम हैं। असली समस्या यह है कि उनकी आवाज अब पहले जैसी राजनीतिक हलचल क्यों पैदा नहीं करती? एक समय उनके भाषणों का इंतजार होता था। उनके बयान अगले दिन की राजनीति तय करते थे। उनके नारे समर्थकों के बीच ऊर्जा पैदा करते थे और विरोधियों के लिए चुनौती बन जाते थे। आज उनका बयान आता भी है तो अक्सर राजनीतिक बहस का केंद्र नहीं बन पाता। डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में यह अंतर और ज्यादा दिखाई देता है।
नई पीढ़ी ने बदल दिया पूरा राजनीतिक खेल
मायावती के सामने एक और चुनौती बदलती हुई युवा राजनीति है। नई पीढ़ी के मतदाता के लिए जातीय पहचान महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ रोजगार, शिक्षा, परीक्षा, महंगाई, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। राजनीतिक संवाद का माध्यम भी बदल गया है। अब केवल बड़ी रैली और मंच से भाषण पर्याप्त नहीं है। सोशल मीडिया, लगातार जनसंपर्क और जमीन पर सक्रिय संगठन भी जरूरी है। यही वह जगह है जहां बसपा और मायावती के बीच दूरी दिखाई देती है।
फिर भी बहनजी को खत्म मानना भूल होगी
फिर भी मायावती को खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता आज भी महत्वपूर्ण है और बसपा के पास दशकों में बनाया गया संगठन तथा सामाजिक आधार मौजूद है। यदि मायावती अपने पारंपरिक वोट बैंक को फिर से सक्रिय कर पाती हैं, युवा दलितों से संवाद कायम कर पाती हैं और संगठन को बूथ स्तर तक फिर से मजबूत कर पाती हैं, तो 2027 का चुनाव पूरी तरह अलग तस्वीर पेश कर सकता है। राजनीति में कई बार कमजोर दिख रहा खिलाड़ी ही अंतिम समय में समीकरण बदल देता है।
सवाल खत्म होने का नहीं वापसी का है
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मायावती खत्म हो गईं क्या? सवाल यह होना चाहिए कि क्या मायावती अपनी पुरानी राजनीतिक ऊर्जा और नया सामाजिक संदेश एक साथ जोड़ पाएंगी? क्या वह फिर से उस दौर की तरह आक्रामक होंगी, जब उनके बयान और नारे चुनावी राजनीति की दिशा प्रभावित करते थे? क्या वह दलित राजनीति के पुराने आधार को नई पीढ़ी से जोड़ पाएंगी? और क्या बसपा अपने सबसे कठिन दौर से निकलकर फिर सत्ता की दौड़ में दिखाई देगी?
क्योंकि आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है- जिस मायावती को कभी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों गंभीरता से लेते थे, आज राष्ट्रीय राजनीति में दोनों ही खेमे उन्हें अपनी रणनीति का अनिवार्य हिस्सा नहीं मानते। वह किसी की स्थायी सहयोगी नहीं हैं, लेकिन इसी कारण किसी की स्थायी साझेदार भी नहीं हैं। उनका स्वतंत्र रास्ता उनकी पहचान तो बचाए हुए है, लेकिन राजनीतिक प्रभाव लगातार घटा रहा है।
फिर भी उन्हें समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी। उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता की संख्या और राजनीतिक महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। बसपा के पास संगठन, चुनाव चिह्न और दशकों की राजनीतिक विरासत है। यदि मायावती 2027 से पहले अपने पुराने आधार को फिर सक्रिय कर सकीं, युवा दलित मतदाताओं से संवाद कायम कर सकीं और अपनी राजनीति को नए सामाजिक सवालों से जोड़ सकीं, तो वह फिर से चुनावी समीकरण बिगाड़ सकती हैं।
एक थी मायावती। कभी उनके बिना उत्तर प्रदेश की राजनीति की कल्पना नहीं होती थी। नोटबंदी के बाद राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव तेजी से सिमटता दिखाई दिया। विपक्षी राजनीति ने उन्हें पूरी तरह अपना नहीं माना और सत्ता पक्ष ने भी उन्हें अनिवार्य प्रतिद्वंद्वी नहीं समझा। अब सवाल यह नहीं कि मायावती कहां हैं। सवाल यह है कि क्या वह फिर ऐसी राजनीतिक स्थिति बना पाएंगी, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष-दोनों को उनकी जरूरत महसूस हो?
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