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'वॉर एंड पीस': किताब जिस पर मुग्ध हो गई दुनिया

Fri, 30 Aug 2019 12:29 PM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Fri, 30 Aug 2019 12:29 PM IST
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war and peace novel by leo tolstoy and bhima koregaon case
दुनिया के चर्चित, लोकप्रिय और महान रूसी लेखक लियो तॉल्सतॉय की विश्व विख्यात कृति 'वॉर एंड पीस' (युद्ध और शांति) - फोटो : Image courtesy: The week.in

दुनिया के चर्चित, लोकप्रिय और महान रूसी लेखक लिओ टॉलस्टॉय की विश्व विख्यात कृति 'वॉर एंड पीस' (युद्ध और शांति) 19वी सदी की महान कृति है।  1917 की क्रांति से तकरीबन 40 साल दूर जारशाही में पिस रहे रूसी समाज के भीतर की उथल-पुथल के बीच के लेखक लिओ टॉलस्टॉय ने 1869 में वॉर एंड पीस पूरी की थी। एक विशाल रचना के तौर पर यह कृति दुनिया की महान किताबों का आज भी सिरमौर है।

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1863 से लेकर 1869 के सात सालों में लिखी गई यह कृति तकरीबन 1500 पृष्ठों में सिमटी और चार खंडों में प्रकाशित हुई। एक मुख्य कथानक और उसके ईर्द-गिर्द चलती अनेक उपकथाओं के बीच अनके पात्रों के साथ चलता यह महाउपन्यास अपने कलात्मक स्वरूप में भी लेखकों की पाठशाला है और विचार के तल पर युद्ध की विभीषिकाओं के समानांतर मनुष्य सभ्यता के लिए शांति का महत्व बखान करता है। 

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विश्व के महान फ्रांसीसी लेख रोम्या रोलां ने इसे 19वीं सदी का भव्य स्मारक कहा। - फोटो : फाइल फोटो

समीक्षाओं, आलोचकों और विवेचनाओं के प्रकाश में वॉर एंड पीस को लेकर दुनिया के कई महान लेखकों ने अपनी-अपनी तरह से घोषणाएं की। अंग्रेजी लेखक जॉन गाल्सवर्दी ने इसे इसे सदी का श्रेष्ठतम् उपन्यास कहा तो वहीं विश्व के महान फ्रांसीसी लेख रोम्या रोलां ने इसे 19वीं सदी का भव्य स्मारक कहा। मैक्सम गोर्की ने उपन्यास से ज्यादा लेखक की प्रशंसा की और टॉलस्टॉय को दुनिया का महान लेखक घोषित कर दिया।

यह कृति दुनिया में भाषाओं से परे जाकर किस कदर लोकप्रिय हुई की उसकी बानगी इसके अनुवाद हैं। हिंदी तो एक हिस्सा है जबकि यह विश्व की हर प्रमुख भाषा में उपलब्ध होने वाली कृति है। 

सेना की बंदूक छोड़कर कलम थामने वाले लिओ टॉलस्टॉय इस खाक जमाने में दो ही कृतियों से जाने गए। एक वॉर एंड पीस और दूसरी अन्ना करेनिना। जबकि उनकी कहानियां आज भी प्रेरणा बनी हुई हैं। दोनों ही किताबें उन्हें विश्व का क्लासिक और महान लेखक घोषित करती है। 

टॉलस्टॉय की केवल कृति ही नहीं उनका अपना जीवन भी दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। 

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गांधी जी भी टॉलस्टॉय से प्रभावित थे। - फोटो : Wikipedia

टॉलस्टॉय को धन, दौलत और एश्वर्य के साथ सुविधाएं नियति ने उन्हें सहज उपलब्ध कराई थीं, लेकिन उन सबका उन्होंने त्याग कर दिया। टॉलस्टॉय व्यक्ति में बदलाव का केंद्र उसके आत्म को मानते थे। यहीं पर टॉलस्टॉय और गांधी वैचारिक धरातल पर साम्य होते हैं। गांधी भी आत्मानुशासन पर जोर देते थे। रूस की उस क्रांति से प्रस्फुटित होने वाली साम्यवादी धारा से दूर जिसमें व्यवस्था और राजनीति से समाज को बदलने का इलाज था।

स्वयं महात्मा गांधी भी लिओ टॉलस्टॉय से बेहद प्रभावित थे। टॉलस्टॉय से भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी प्रभावित हुए। उनकी किताबें गांधी ने सदा अपने पास रखी। यही नहीं कहा जाता है कि ट्रस्टीशिप के सिद्धांत की कुछ प्रेरणा भी गांधी जी को टॉलस्टॉय से मिली। 

हालांकि दोनों की मुलाकात कभी हुई नहीं लेकिन कई प्रसंग और लेख को आधार मानें तो टॉलस्टॉय की जन्मशताब्दी पर गांधी जी ने कहा था- टॉलस्टॉय ने हर जगह मेरी रक्षा की वरना अफ्रीका में संघर्ष के दौरान हिंसा की तरफ झुकने के खयाल आते रहे।  

बहरहाल, साहित्य के केंद्र में संस्कृति, समाज और राजनीति सदा रही है। हिंदी के प्रख्यात उपन्यास सम्राट और लेखक मुंशी प्रेमचंद साहित्य और साहित्यकार को देशभक्ति और राजनीति के आगे चलने वाली मशाल के रूप में देखते थे। दरअसल, साहित्य, लेखन, पठन-पाठन विचार की दृष्टि से राजनीति और समाज को दिशा देने की भूमिका में होते हैं। 

समाज इसे पढ़ता है और पढ़ समझकर मौजूदा व्यवस्था की भूमिका समझता है और उस पर विवेक और विचार से सवाल उठाता है। लेखकों की बुक शेल्फ में रखीं किताबें राजनीति, समाज और दुनिया को समझने और उसे चलाने वाले लोगों से सवाल पूछती हैं, मुठभेड़ करती हैं और मानवीय संवेदनाओं को सहेजने का काम करती है। 

अनगिनत किताबें और किताबों की विशाल दुनिया हमारे आसपास के समाज को समझने के लिए है। किताबें व्यक्ति को बनाती है और व्यक्ति मिलकर समाज बनाते हैं। एक विवेकपूर्ण और तर्कसंगत दुनिया। किताब चाहे फिर हिंदी की हो, अंग्रेजी की हो या फिर रूसी या फिर किसी और भाषा की।

दरअसल, भाषाओं की दीवारें तोड़कर किताबों ने दुनिया में मनुष्य को मनुष्य के प्रति संवेदनशील बनाया और सरकारों, व्यवस्थाओं की जवाबदेही भी तय की और उनसे सवाल पूछे। लेकिन अब उन किताबों की उपस्थिति पर ही सवाल है जो आपको सवाल पूछना सिखाती है।  टॉलस्टॉय जैसा लेखक और उनकी युद्ध और शांति जैसी कृति हमारे समाज के भीतर इस दुनिया में मनुष्य को हिंसा और युद्ध के परिणामों के प्रति आगाह करती कृतियां हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।  

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