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विक्रम महोत्सव: रुपहले पर्दे पर आकार लेती धूमिल इतिहास की स्वर्णिम कहानी

Wed, 26 Mar 2025 02:47 PM IST
Rajshekhar Vyas राजशेखर व्यास
Updated Wed, 26 Mar 2025 02:47 PM IST
सार

विक्रम के ये प्रसिद्ध चित्र महान चित्रकार कनुभाई देसाई और रविशंकर रावल ने व्यासजी के गहन विचार-विमर्श के बाद तैयार किए थे। आज भी उनके मूल चित्र सुरक्षित हैं। यही चित्र बाद के समय में विक्रम का मुखपृष्ठ और संपादकीय पृष्ठ का प्रतीक बना। 
 

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Vikram Mahotsav: Golden Saga of Faded History Comes to Life on Silver Screen
विक्रम के चित्र जो महान चित्रकार कनुभाई देसाई और रविशंकर रावल द्वारा तैयार किए गए थे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज की नई पीढ़ी शायद कल्पना भी नहीं कर सकती कि कैसे समूची उज्जयिनी नगरी दुल्हन की तरह सज-धज गई थी, अपने निज विक्रम के स्वागत के लिए। पूरा नगर रंग-बिरंगी पताकाओं से सुसज्जित था, जिन पर पराक्रमी विक्रम का चित्र अंकित था। वहीं, नवरत्नों के जो चित्र आज प्रचलन में हैं, वे भी रविशंकर रावल की रचनाएं हैं। समय के साथ उनकी अनेक प्रतिकृतियाँ बाजार में आ गईं, जिससे लोग नकल को ही असल समझने लगे।

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Vikram Mahotsav: Golden Saga of Faded History Comes to Life on Silver Screen
विक्रम में प्रकाशित लेख और सहयोगी लेखकों की जानकारी - फोटो : अमर उजाला

देशभर में घूम-घूमकर विद्वानों से विक्रम, कालिदास और उज्जयिनी पर शोध लेख लिखवाए गए। इनमें महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, डॉ. भगवत शरण उपाध्याय, वी. वी. मीराशी, वासुदेव शरण अग्रवाल, डी. सी. मजूमदार जैसे महान नाम शामिल थे। मैथिली शरण गुप्त ने अपने हस्तलिखित पंक्तियों में लिखा:

"दो हजार संवत्सर बीते हैं, निज विक्रम बिना हम मरे-मरे जीते हैं।"

ये पंक्तियां विक्रम स्मृति ग्रंथ में व्यासजी ने प्रमुखता से प्रकाशित कीं। व्यासजी के अनुरोध पर रवींद्रनाथ टैगोर ने भी 'उज्जयिनी' कविता लिखी थी और नागार्जुन ने भावपूर्ण रचना 'कालिदास सच-सच बतलाना, अज रोया था या तुम रोए थे?' लिखी। विक्रम स्मृति ग्रंथ की तैयारी का एक दिलचस्प किस्सा डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन सुनाते थे। उस समय वे ग्वालियर के क्वींस विक्टोरिया कॉलेज में थे और महापंडित राहुल जी वहां पधारे थे। व्यासजी विक्रमादित्य फिल्म के सेट से सीधे दिल्ली होते हुए ग्वालियर आए और राहुल जी को बोले, "विक्रम पर आपका लेख लिए बिना नहीं जाऊंगा।"

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Vikram Mahotsav: Golden Saga of Faded History Comes to Life on Silver Screen
पंडित व्यास को महान व्यक्तित्वों द्वारा लिखे गए पत्रों की झलक - फोटो : अमर उजाला

डॉ. सुमन बताते थे कि राहुल जी हॉस्टल के बरामदे में गमछा मुंह पर ओढ़कर बैठ गए और बोले, "मैं बोलता हूं, सुमन लिखेगा।" और यूं दो घंटे में 'त्रिविक्रम!' लेख तैयार हो गया। व्यासजी विक्रम महोत्सव और कालिदास समारोह के लिए अपने खाने-पीने की परवाह किए बिना देशभर में दौड़ते फिरते थे।

विक्रमादित्य फिल्म की अनोखी कहानी
विक्रमादित्य फिल्म की कथा भी बेहद दिलचस्प है। पृथ्वीराज कपूर ने विक्रमादित्य की भूमिका निभाई। यह धारणा कि वे मुगल-ए-आजम के सेट से अकबर के भेस में बाहर जाकर प्रजा का हाल-चाल लेते थे, वास्तव में विक्रमादित्य की कहानी पर आधारित है। विक्रमादित्य अक्सर अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए सामान्य वेश में निकल पड़ते थे।

बादशाह अकबर ने भी विक्रमादित्य की कई अच्छी नीतियों को अपनाया। जैसे, विक्रमादित्य ने विक्रम संवत् की शुरुआत की, जो समय के साथ लोग भूल चुके थे। पंडित व्यासजी के प्रयासों से इसे पुनर्जीवित किया गया। अकबर ने भी इसी तर्ज पर दिन-ए-इलाही संवत् शुरू किया, लेकिन वह प्रचलित नहीं हो सका। विक्रमादित्य के नवरत्नों की तर्ज पर अकबर ने भी तानसेन, बीरबल और टोडर मल जैसे नवरत्नों को अपने दरबार में स्थान दिया।

पृथ्वीराज कपूर का योगदान
विक्रमादित्य फिल्म में अभिनय करने के बदले पृथ्वीराज कपूर ने व्यासजी की मित्रता के कारण कोई पारिश्रमिक नहीं लिया। जब पंडित सूर्यनारायण व्यास को साहित्य, शिक्षा और संस्कृति में योगदान के लिए 'पद्मभूषण' सम्मान मिला, तो उन्हें राज्यसभा के लिए भी नामांकित करने की पेशकश की गई। व्यासजी ने विनम्रता से यह सम्मान लेने के बजाय पृथ्वीराज कपूर को नामित करने की सिफारिश की। उनकी इस सिफारिश को मानते हुए पृथ्वीराज कपूर को राज्यसभा में ससम्मान स्थान मिला। विक्रम महोत्सव का यह स्वर्णिम इतिहास आज भी प्रेरणादायक है, जो उज्जयिनी की सांस्कृतिक समृद्धि और गौरवशाली परंपरा को दर्शाता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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