दूसरा पहलू: दांतों के निशानों ने खोले प्राचीन मानव के राज, आधुनिक युग जैसे पहले भी थे मादक पदार्थों के दीवाने
दांतों पर जमे रासायनिक अवशेषों ने बताया कि प्राचीन मानव भी आधुनिक युग की तरह विभिन्न मादक पदार्थों के दीवाने थे। भारत व चीन में सुपारी चबाने के लिखित विवरण कम से कम 2,000 वर्ष पुराने हैं। इसका सबसे पुराना पुरातात्विक प्रमाण लगभग 3,500 वर्ष पुराना है।
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दुनिया भर में मनुष्य उत्तेजक व मादक पदार्थों से लेकर मनोदशा को प्रभावित करने वाले पदार्थों का इस्तेमाल करते आए हैं। हाल ही में साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बहुप्रचलित सुपारी का सेवन लगभग 25,000 वर्ष पहले शुरू हुआ था। सुपारी एक लत लगाने वाला उत्तेजक पदार्थ है, जो इसका सेवन करने वालों में हल्का उत्साह, अधिक सतर्कता और अन्य प्रभाव पैदा करता है।
नियमित रूप से सुपारी का सेवन करने वालों में मुंह के कैंसर की दर अधिक पाई जाती है। शराब, कैफीन व निकोटीन के बाद सुपारी दुनिया में सबसे अधिक सेवन किए जाने वाले मनो-सक्रिय पदार्थों में चौथे स्थान पर है। भारत व चीन में सुपारी चबाने के लिखित विवरण कम से कम 2,000 वर्ष पुराने हैं। इसका सबसे पुराना पुरातात्विक प्रमाण लगभग 3,500 वर्ष पुराना है। यह प्रमाण थाईलैंड में रहने वाले एक व्यक्ति के दांतों पर पाए गए सुपारी के रासायनिक यौगिकों के रूप में मिला था।
इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी में पुरातात्विक खोदाई के दौरान हमें दो वयस्क शिकारी-संग्रहकर्ताओं के कंकाल मिले। इनमें से एक की उम्र 25,000 से 16,000 वर्ष के बीच और दूसरे की उम्र 7,600 से 6,300 वर्ष के बीच निर्धारित की गई। ये शिकारी-संग्रहकर्ता सुपारी को दांतों के बीच दबाकर घंटों चूसते रहते थे। वैज्ञानिक परीक्षणों और लैब प्रयोगों से यह प्रमाणित हुआ कि केवल सुपारी को मुंह में रखकर चूसने से भी इसका मुख्य उत्तेजक रसायन एरेकोलीन बाहर निकलता है, जो मस्तिष्क को प्रभावित करता है।
वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रमाणित हुआ कि केवल सुपारी को मुंह में रखकर चूसने से उत्तेजक रसायन एरेकोलीन बाहर निकलता है, जो मस्तिष्क को प्रभावित करता है। शोध यह भी दर्शाता है कि इस आदत के पीछे दर्द से राहत पाने की मजबूरी रही होगी।
शोध यह भी दर्शाता है कि इस आदत के पीछे दर्द से राहत पाने की मजबूरी रही होगी। एरेकोलीन में दर्द कम करने वाले गुण होते हैं। सुपारी के क्विड को चबाने की प्रथा आज भी व्यापक रूप से प्रचलित है। महत्वपूर्ण बात यह है कि शुरुआती शिकारी-संग्रहकर्ता भी लंबे समय तक इन पदार्थों के इस्तेमाल से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी परिणामों का सामना कर रहे थे।
साथ में कार्नी डी. मैथेसन, फाखरी, मेलांद्री व्लोक व रोजर पाप्के (द कन्वर्सेशन)