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दूसरा पहलू: वैक्सीन, जो हर महामारी में होगी अचूक; डीएनए तकनीक पर आधारित
Tue, 30 Jun 2026 08:22 AM IST
Pavan
नील मैबॉट
नील मैबॉट
Published by: Pavan
Updated Tue, 30 Jun 2026 08:22 AM IST
सार
वैज्ञानिकों ने एआई की मदद से एक नई वैक्सीन तैयार की है, जो महामारी का कारण बनने वाले तमाम वायरसों से सुरक्षा प्रदान कर सकती है। डीएनए तकनीक पर आधारित यह वैक्सीन अधिक स्थिर होती है। इसे संग्रहित करना व सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान होता है। इसी तकनीक से फ्लू, इबोला जैसे तेजी से बदलने वाले वायरसों के खिलाफ भी सुरक्षा संभव हो सकती है। यह ऐसे एंटीबॉडी बनाती है, जो सार्बेकोवायरस परिवार के कई वायरसों की पहचान कर सकते हैं।
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वैक्सीन, जो हर महामारी में होगी अचूक
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
क्या भविष्य में एक ही वैक्सीन हमें कोविड, सार्स और ऐसे नए वायरसों से भी बचा सकेगी, जो अभी तक इन्सानों में फैले ही नहीं हैं? कैंब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है। उन्होंने एआई की मदद से एक नई वैक्सीन तैयार की है। इस वैक्सीन का पहली बार इन्सानों पर परीक्षण किया गया। शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे हैं।
दरअसल, अब तक अधिकांश वैक्सीन किसी एक विशेष वायरस या उसके एक वेरिएंट के लिए बनाई जाती रही हैं। लेकिन, वायरस लगातार अपना रूप बदलते रहते हैं, जिससे समय के साथ वैक्सीन का असर कम होने लगता है। इसी कारण फ्लू की वैक्सीन हर साल बदलनी पड़ती है और कोविड-19 के टीकों को भी कई बार अपडेट करना पड़ा। कैंब्रिज के शोधकर्ताओं ने इस समस्या का समाधान एआई के जरिये खोजने की कोशिश की।
एआई ने हजारों वायरस के आनुवंशिक डाटा का विश्लेषण कर उन हिस्सों की पहचान की, जो लगभग सभी वायरसों में समान रहते हैं और समय के साथ कम बदलते हैं। इस नई वैक्सीन का लक्ष्य उन तमाम वायरसों से सुरक्षा देना है, जो महामारी का कारण बन सकते हैं। यह वैक्सीन एमआरएनए नहीं, बल्कि डीएनए तकनीक पर आधारित है। डीएनए वैक्सीन अधिक स्थिर होती है, इसलिए इसे संग्रहित करना व दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाना आसान होता है। इतना ही नहीं, इसे बिना सुई के भी लगाया जा सकता है।
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यदि यह वैक्सीन सफल होती है, तो दुनियाभर में महामारी से निपटने का तरीका बदल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी तकनीक का उपयोग फ्लू वैक्सीन और इबोला जैसे तेजी से बदलने वाले वायरसों के खिलाफ भी किया जा सकता है। यह वैक्सीन सुरक्षित पाई गई। इसने शरीर में ऐसे एंटीबॉडी भी बनाए, जो सार्बेकोवायरस परिवार के विभिन्न वायरसों को पहचान सकते हैं।
हालांकि, सर्वव्यापी (यूनिवर्सल) वैक्सीन का सपना पूरी तरह साकार होने में कुछ वर्ष लग सकते हैं। किसी भी नए टीके को व्यापक स्तर के क्लिनिकल परीक्षणों से गुजरकर यह सिद्ध करना होगा कि वह सुरक्षित, प्रभावी और लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है। पर, यह अध्ययन दर्शाता है कि एआई हमें वहां तेजी से पहुंचने में मदद कर सकता है। -द कन्वर्सेशन
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दरअसल, अब तक अधिकांश वैक्सीन किसी एक विशेष वायरस या उसके एक वेरिएंट के लिए बनाई जाती रही हैं। लेकिन, वायरस लगातार अपना रूप बदलते रहते हैं, जिससे समय के साथ वैक्सीन का असर कम होने लगता है। इसी कारण फ्लू की वैक्सीन हर साल बदलनी पड़ती है और कोविड-19 के टीकों को भी कई बार अपडेट करना पड़ा। कैंब्रिज के शोधकर्ताओं ने इस समस्या का समाधान एआई के जरिये खोजने की कोशिश की।
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एआई ने हजारों वायरस के आनुवंशिक डाटा का विश्लेषण कर उन हिस्सों की पहचान की, जो लगभग सभी वायरसों में समान रहते हैं और समय के साथ कम बदलते हैं। इस नई वैक्सीन का लक्ष्य उन तमाम वायरसों से सुरक्षा देना है, जो महामारी का कारण बन सकते हैं। यह वैक्सीन एमआरएनए नहीं, बल्कि डीएनए तकनीक पर आधारित है। डीएनए वैक्सीन अधिक स्थिर होती है, इसलिए इसे संग्रहित करना व दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाना आसान होता है। इतना ही नहीं, इसे बिना सुई के भी लगाया जा सकता है।
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यदि यह वैक्सीन सफल होती है, तो दुनियाभर में महामारी से निपटने का तरीका बदल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी तकनीक का उपयोग फ्लू वैक्सीन और इबोला जैसे तेजी से बदलने वाले वायरसों के खिलाफ भी किया जा सकता है। यह वैक्सीन सुरक्षित पाई गई। इसने शरीर में ऐसे एंटीबॉडी भी बनाए, जो सार्बेकोवायरस परिवार के विभिन्न वायरसों को पहचान सकते हैं।
हालांकि, सर्वव्यापी (यूनिवर्सल) वैक्सीन का सपना पूरी तरह साकार होने में कुछ वर्ष लग सकते हैं। किसी भी नए टीके को व्यापक स्तर के क्लिनिकल परीक्षणों से गुजरकर यह सिद्ध करना होगा कि वह सुरक्षित, प्रभावी और लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है। पर, यह अध्ययन दर्शाता है कि एआई हमें वहां तेजी से पहुंचने में मदद कर सकता है। -द कन्वर्सेशन