अफगानिस्तान में तालिबान: अमेरिका जिससे पिंड छुड़ा रहा है, वह पूरी दुनिया के लिए खतरा बनेगा
अफगानिस्तान तालिबान की गिरफ्त में है। ऐसे कई इलाके हैं जहां तालिबानी हुकूमत के झंडे लहरा रहे हैं।
तालिबान फतह के ये झंडे जहां अफगानिस्तान में लोकतंत्र और मानवता के नष्ट होने की ओर इशारा कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर भारत और अफगानिस्तान के पड़ोसी मुल्कों के लिए भी बड़े खतरे का संकेत हैं।
इस पूरे मामले पर विस्तार से बता रहे हैं, मेरठ कॉलेज में डिफेंस स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद रिजवान.
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विस्तार
यह तस्वीर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की है, जिसमें वे अफगानी मुजाहिदीन सरदारों के साथ मिलकर सोवियत संघ को अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकालने के लिए हर सम्भव कीमत अदा करने को तैयार दिख रहे हैं।
इसी कड़ी में आगे चलकर अमेरिका ने पाकिस्तान की धरती को आतंकवादियों के ट्रेनिंग व लॉन्चिंग पैड के रूप में प्रयोग किया और बदले में पाकिस्तान को चीनी-अमेरिकी सहयोग से परमाणु बम का उपहार मिला।
एक इतिहास जो बहुत कुछ कहता है
1979 में काबुल में स्थापित एक कम्युनिस्ट सरकार की सुरक्षा के लिए लाल सेना के अफगानिस्तान में घुसने के साथ अगले 10 सालों तक एशिया की धरती पर अब तक के सबसे विनाशकारी गुरिल्ला युद्धों में से एक लड़ा गया। धरती पर चलने वाला यह एक ऐसा विनाशकारी संग्रमा था जिसमें 20 लाख से ज़्यादा बेगुनाह अफगान नागरिक मौत के घाट उतारा दिए गए। यही नहीं 30 लाख से ज़्यादा घायल और 50 लाख से ज़्यादा देश छोड़ने को मजबूर हुए।
इन दस सालों में दुनिया मे लोकतंत्र, मानवाधिकार व शांति के सबसे बड़े पैरोकार अमेरिका ने अहमद शाह मसूद, गुलबुद्दीन हिकमतयर, बुरहानुद्दीन रब्बानी ही नहीं बल्कि ओसामा बिन लादेन को भी बड़े नाज़ों से पाल पोस के बड़ा किया, पलकों पे बिठाया, और आधुनिक हथियारों से अफगान धरती को भर दिया।
मित्रों बुरी तरह मात खाने के बाद मई 1989 में अफगान धरती से सोवियत फौजों की वापसी तो हो गई, लेकिन इस युद्ध के लिए पैदा किए गए लाखों लड़ाकू अफगान मुजाहिदीन और उनके आधुनिक हथियार अब तक इस पूरे क्षेत्र के लिए अस्थिरता व अशांति के सबसे बड़े कारक बने हुए हैं।
यह भी बड़ी विडंबना रही कि जब इन्हीं मुजाहिदीनों ने अमेरिका पर 9/11 का हमला किया तब जाकर अमेरिका को यह 'सुपर टेररिस्ट' नज़र आने लगे, और अमेरिका ने लंबे समय के लिए अफगान धरती पर फौजें भेज दीं जिसने अफगान धरती पर एक अस्थायी स्थिरता तो कायम कर दी लेकिन मई 2001 में लादेन के मारे जाने के बाद धीरे-धीरे अफगानिस्तान से अमेरिकी रुचि कम होने लगी।
वर्तमान में प्रेसिडेंट बाइडेन ने जब अप्रैल 2020 में अफगानिस्तान से समस्त अमेरिकी व नाटो फौजों की वापसी की घोषणा की तभी यह तय हो गया कि अफगानी धरती फिर से बड़े विनाश की तरफ जाएगी। आज के हालात यह हैं कि अगले 31 अगस्त तक अंतिम अमेरिकी सैनिक की वापसी से पहले पूर्ण रूप से अफगानिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण रोक पाना लगभग असंभव सा है।
अफगानिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि और United Nations Assistance Mission on Afghanistan (UNAMA) की प्रमुख डियोब्राह लियोंस ने कल ही हालात की भयावहता बयान करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद व विश्व समुदाय से यह मार्मिक अपील की है कि यदि तत्काल ही किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के द्वारा अफगानिस्तान में युद्धरत दलों को शांति वार्ता की टेबल पर नहीं लाया गया तो अफगानिस्तान में बाद के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।
पूरी दुनिया के लिए पैदा होगा संकट
मित्रों यह चर्चा करना आवश्यक होगा कि अमेरिका के भीषण हवाई हमले काबुल पर तालिबानी कब्जे को बहुत दिनों तक नहीं रोक सकते, इस क्षेत्र का भूगोल जानने वाले यह जानते हैं कि बिना ज़मीन पर उतरे यह लगभग असंभव है लेकिन अमेरिका को इस क्षेत्र में शांति व स्थिरता स्थापना की अपेक्षा अपने सैनिकों की जान की फिक्र ज़्यादा है जिसका उन्हें पूरा अधिकार भी है लेकिन कम से कम आज का नाज़ुक समय अफगानिस्तान को अनाथ और भाग्य पर छोड़ने का बिल्कुल भी नहीं था।
पूरा विश्व जानता है तालिबान इस्लाम के नाम पर इस पूरे क्षेत्र पर अपनी बर्बरता और अमानवीयता थोपना चाहता है, महिलाओं व अल्पसंख्यकों के लिए उनके कानून में रहम का वजूद ही नहीं है।
आने वाले दिन निश्चित रूप से इस समस्त क्षेत्र के राष्ट्रों (जिसमे पाकिस्तान,रूस,ईरान व चीन के साथ भारत भी शामिल है) के लिए काफ़ी अहम होंगे, लेकिन इस दौरान आकाश से अमेरिकी बमबारी व धरती पर अफगान वॉर लॉर्ड्स के भीषण संघर्ष में बहुत बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिकों, बच्चों, महिलाओं व बुजुर्गों को होने वाली क्षति मानवता के विरुद्ध सबसे बड़ा अपराध होगी जिसका सबसे बड़ा ज़िम्मेदार सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका ही होगा।
सवाल यह भी वाजिब है कि काबुल पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करने के बाद क्या ये खूंखार आतंकवादी पड़ोसी राष्ट्रों को सुकून चैन से रहने देंगे?
लेखक मेरठ कॉलेज में डिफेंस स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।
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