इरादों की मजबूत और व्यक्तित्व की धनी वे महिलाएं, जो समाज के लिए बनी हुई हैं प्रेरणा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हां, ख्वाब मेरे चमकीले हैं/ हां रंग मेरे भड़कीले हैं/ हां, मर-मर के मैं जीती हूं/हां मै बेटी हूं!/खुशी नही कोई जन्म पे मेरे/ न शाबासी कोई करम पे मेरे/ मैं न नगमों पर सजती हूं/ फिर भी शहनाई-सी बजती हूं/ हां मै बेटी हूं!/ हां मैं चंदन-सी खिलती हूं/ हां! मैं सांप मे पलती हूं/ जिंदा हूं जहर के घेरे में/ एक दीपक घने अंधेरे में/ मरने से फिर भी छेटी हूं/ हां मै बेटी हूं!/तेज हवा ने पाला है/ आंधी ने मुझे संभाला है/ बादल ने कमां संभाली है/ बिजली ने मांग उजाली है/ तूफानों की जद में लेटी हूं/ हां मै बेटी हूं/ माजी ने चाबुक मारी है/ और हाल ने भी ठुकराया है/ अपने कर्मों के दम पर मैंने/ अपना इतिहास रचाया है/ खुद राख से खुद को रच बैठी हूं/ हां! मैं बेटी हूं।
हां! वह औरत है, जमीन पर रब के तमाम एहसानों में से एक बेशकममती एहसान। जमीन की जीनत, जिंदगी की तल्ख फिजाओं में राहत-बख्श झोंका! दर्द की दवा, थके हुए जहन का आराम; रेगिस्तान सी प्यास में जिंदगी की ठंडी फुहार। जो न हो तो कायनात की पूरी धड़कन रुक जाए. जिसके दम से यह सय्यारा रश्केजिना है और जिसके होने से फूल,सितारे, खुशबू, रंग, परिंदे सबके विजदान में एक कशिश सी महसूस होती है। जो जमीन के अधूरेपन को पूरा करने ही उतरी है और जो न हो तो सब अधूरा है। हां, वह सचमुच औरत ही तो है जो जमीन को जीने के तमाम सुख मुहैया कराती है। खुद दुख सह कर भी। जो न हो तो किसी साज पर कोई सुर न हो। पर क्या वे सब भी यह सोचती हैं? क्या उन्हें अपनी अहमियत पता है? क्या अपने वजूद पर वह नाज करती हैं या खुद को जमीन का जर्रा ही मानती हैं?
इस महिला दिवस पर महिलाओं के वक्तव्य से ही अगर जानें कि औरत होने पर कैसा लगता है तो शायद हम जज्बातों की उस नब्ज को पकड़ पाएंगे, जहां सामाजिकता के सारे सरोकार आ कर ठहर जाते हैं।
विज्ञापन विज्ञापन
श्रीमती प्रीति पटेल, मध्यांचल प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की चांसलर, भोपाल शहर की सशक्त महिलाओं में से एक, जीवन से भरपूर, ज़िम्मेदारियों से न घबराने वाली और व्यक्तित्व में सम्पूर्ण। अपने छोटे से कॉलेज को एक बच्चे की तरह पालकर उसे यूनिवर्सिटी का रूप देने में उन्होंने मां जैसी ममता और पिता जैसे अनुशासन दोनों ही इस्तेमाल किए हैं। उनका मानना है कि स्त्री होकर जीना आसान नहीं चुनौतीपूर्ण है। किंतु ईश्वर ने स्त्री को सम्पूर्ण बनाया है, पुरुष से ज्यादा ताकतवर। अतएव स्त्री होकर जीना सुंदर अनुभव हैं। वे सहज मुस्कान बिखेरते हुए कहती हैं- "स्त्री होने से उन्हें दायित्वबोध का गुण मिला है और उद्यमी होकर उन्हें मिली है मजबूती।" वे शहर की सफल सामाजिक महिला होने के साथ साथ एक अच्छी मां, अच्छी भाभी, अच्छी पत्नी और सामाजिक सरोकारों से युक्त स्त्री हैं। उन्हें अपने स्त्री होने पर गर्व है।
चील की नजर, चीते की चाल और बाजीराव की तलवार पर संदेह नहीं करते, यह महज एक संवाद नहीं। अगर इसे सच में देखना है तो आइए मिलते हैं, पटेल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन की सीईओ श्रीमंत मधु मल्होत्रा जी से। बेहद सधी हुई चाल, पैना दृष्टिकोण और गहन निर्णय क्षमता उन्हें एक अलग अभूतपूर्व महिला बनाता है। उनका मानना है स्त्री होना जीवन का एक वरदान है। आप स्त्री होकर मानसिक रूप से पुरुषों से ज्यादा मजबूत हो सकती हैं। प्रेम, ममता और अनुशासन के बीच संतुलन बना आप संसार विजित कर सकती हैं! स्त्री होना उनके लिए श्रेयस्कर है और मधुर भी।
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर में शिक्षा विभाग की विभागाध्यक्ष रही डॉ भारती, एक सफल प्रोफेशनल महिला, एक सुंदर सामाजिक भागीदारिता से युक्त मनोहर व्यक्तित्व। जितनी सरल, उतनी ही तरल, अपने काम से बेहद प्रेम करने वाली वह महिला, जिनसे कुछ सीखे बगैर कोई नहीं रह सकता। वह हर दिन का आनंद उठाती हैं। उनका मानना है "स्त्रीत्व एक जिम्मेदारी का नाम है। स्त्रीत्व एक दायित्वबोध है, संसार को और बेहतर बनाने का और नवीन, कलात्मक पीढ़ी के सृजन का।
भोपाल शहर की सुंदर और बेहद जिम्मेदार टैक्स कमिश्नर सीमा पांडे, दो सुंदर बेटियों की मां। अपने स्त्रीत्व को किसी उत्सव से कम नही मनाती। जितने अनुशासन से वे ऑडिट करती हैं, उतने ही चाव से स्वयं के लिए बांधनी की सुंदर साड़ियों का चयन भी कर लेती हैं। उन्हें नए सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली में भी उतनी ही रुचि है, जितनी रुचि गीतों, गजलों और किताबों में हैं। वे कहती हैं, "स्त्रीत्व एक यात्रा है अंधकार से प्रकाश की। स्त्रीत्व एक कला है प्राचीनता से नवीनता को जोड़ने की। स्त्री मतलब ब्यूटी विद ब्रेन।"
शहर की सफलतम व्यवसाई विभा इस संदर्भ में कुछ और ही कहती हैं। उनका मानना है स्त्री यानि शाश्वत आनंद। वह उद्यमी हैं, शिक्षिका है, डॉक्टर हैं, पत्रकार हैं, किंतु इससे भी पूर्व आप खुद के लिए जिम्मेदार हैं। कहती हैं कि ईश्वर को धन्यवाद दें कि आप स्त्री हैं, स्त्री होना एक अनुभूति है। वह घर, व्यवसाय और समाज सबके साथ सुंदर सामंजस्य बना जीती भी हैं और जीतती भी हैं।
इरादों की मजबूत, व्यक्तित्व की धनी और अपने कलम से पहाड़ धराशायी कर देने वाली स्वतंत्र लेखिका स्वाति शैवाल स्त्री होने के पर एक अलग दृष्टिकोण रखती हैं। उनके अनुसार स्त्री होना वर्जनाओं में जीना नहीं बल्कि खुलकर जीना है। स्त्री मतलब स्वतंत्र निर्णय क्षमता, स्त्री मतलब शारिरिक सुकृति का मानसिक शक्ति से योग। स्त्री मतलब महायज्ञ, स्त्री मतलब संसार में सृजन की अनन्य संभावनाएं। वे स्त्रीत्व को सहज स्वाभाविक वरदान मानकर जीती हैं। उनकी नजर में खुद का महिला होना बहुत अहम है।
ये वे स्त्रियां हैं, जिन्होंने कभी समाज से कुछ नही मांगा बल्कि अपनी दक्षता से समाज को धनी बनाया है। इन्हें देश की भी चिंता है और मानव धर्म की भी। इनके व्यक्तित्व में ऊष्मा भी है और ऊर्जा भी। वे शांत भी हैं और कर्मरत भी। इन्होंने शक्ति का प्रयोग सृजन के लिए भी किया है और मानव कल्याण के लिए भी। ये आर्यावर्त की पुत्रियां, वे कुलीन स्त्रियां है, जो पूरे मनुष्य जाति के लिए प्रेरणा है। यह स्वयं में अस्तित्व सार्थकता हैं। अग्निगर्भा, स्वयं सिद्धा, जिनसे अभिभूत हो किसी शाक्यवंशी ने कभी लिखा था- "यत्र नार्यस्त पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"। ऐसी स्त्रियों को शत शत प्रणाम।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।