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जीवन धारा: जिसे खोज रहे हो वह तो भीतर ही है, पहले स्वयं को देखने का सूत्र अपनाकर देखें
Mon, 27 Jul 2026 06:16 AM IST
प्रशांत तिवारी
रमण महर्षि
रमण महर्षि
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Mon, 27 Jul 2026 06:16 AM IST
सार
यह लेख आत्मचिंतन और आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करता है। इसमें बताया गया है कि मनुष्य के अधिकांश प्रश्न बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि स्वयं के वास्तविक स्वरूप को न जानने से उत्पन्न होते हैं। जब व्यक्ति ईमानदारी से अपने भीतर झाँककर 'मैं कौन हूं?' का प्रश्न करता है, तभी उसकी आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है। आत्मबोध होने पर भय, अहंकार और भ्रम कम होने लगते हैं तथा अनेक प्रश्न स्वतः शांत हो जाते हैं। अंततः यह अनुभूति होती है कि जिसकी खोज बाहर की जा रही थी, वह स्वयं के भीतर ही विद्यमान है।
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- फोटो : Freepik.com
विस्तार
मैं यह नहीं कहता कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद तुम्हारे पास कोई प्रश्न नहीं रहेगा। प्रश्न रहेंगे, लेकिन उन्हें पूछने वाला बदल जाएगा। अब तुम प्रश्नों को अपने भय, इच्छाओं और अहंकार की धुंध से नहीं देखोगे।
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क्या हमारे सभी प्रश्नों का मूल वास्तव में बाहर है?
मनुष्य जीवन भर उत्तरों की खोज करता रहता है। वह जानना चाहता है कि ईश्वर है या नहीं, संसार क्यों बना, मृत्यु के बाद क्या होता है, कर्म क्या है, भाग्य क्या है, सुख कहाँ है और दुख क्यों है। ये सभी प्रश्न स्वाभाविक हैं। लेकिन क्या तुमने कभी यह देखा है कि इन सब सवालों को पूछने वाला कौन है? तुम्हारा मन बाहर की ओर दौड़ता है। वह हर घटना का कारण जानना चाहता है, पर जिसने यह जिज्ञासा उठाई, उसे जानने का प्रयास मनुष्य बहुत कम करता है। यह ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति वृक्ष के हर पत्ते का अध्ययन करे, लेकिन यह न देखे कि वह निकला किस जड़ से है।
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क्या कभी उस ‘मैं’ को देखने की कोशिश की है?
मैं केवल इतना कहता हूँ कि एक क्षण रुककर उस ‘मैं’ को देखो, जो हर अनुभव में सबसे पहले उपस्थित होता है। तुम कहते हो- मैं सोचता हूं, मैं दुखी हूं, मैं प्रसन्न हूं। पर यह ‘मैं’ है कौन? तुम्हारे अधिकांश प्रश्न वास्तव में संसार के नहीं हैं, बल्कि उस ‘मैं’ की अस्थिरता से निकलते हैं, जिसे तुम अपना वास्तविक स्वरूप समझ बैठे हो।
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भय और प्रश्नों का रिश्ता आखिर क्या है?
जब यह ‘मैं’ स्वयं को केवल शरीर मानता है, तब उसे मृत्यु का भय सताता है। इसलिए प्रश्नों से लड़ो मत, बल्कि उनके स्रोत को देखो। हर प्रश्न के पीछे एक ‘मैं’ बैठा है, जो स्वयं को सीमित मानता है। इसी सीमितता से भय जन्म लेता है और भय से प्रश्नों की लंबी शृंखला शुरू होती है। जब तुम पूछते हो- मैं कौन हूं? तब तुम्हारी चेतना उसी दिशा में मुड़ने लगती है, जहाँ से सभी अनुभव उत्पन्न होते हैं।
‘मैं’ केवल एक विचार है या कुछ और?
धीरे-धीरे तुम देखोगे कि ‘मैं’ एक विचार की तरह उठता है। जागते ही सबसे पहले ‘मैं’ का भाव आता है और उसके बाद संसार उपस्थित हो जाता है- मेरा परिवार, मेरी स्मृतियां, मेरी योजनाएं। यदि इस प्रथम विचार की जाँच कर ली जाए, तो उसके पीछे एक मौन उपस्थिति दिखाई देने लगती है, जो किसी विचार पर निर्भर नहीं होती। वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है।
ज्ञानी और अज्ञानी में वास्तविक अंतर क्या है?
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों एक ही संसार में रहते हैं, लेकिन उनका अनुभव एक जैसा नहीं होता। अज्ञानी हर घटना को अपने छोटे-से ‘मैं’ से जोड़ता है, जबकि ज्ञानी उसी घटना को आते-जाते हुए देखता है। वह न भागता है, न किसी चीज़ से चिपकता है। वह जीवन के साथ संघर्ष नहीं करता, क्योंकि उसने स्वयं को जीवन से अलग मानना छोड़ दिया है।
क्या ज्ञान मिलने के बाद सभी प्रश्न समाप्त हो जाते हैं?
इसलिए मैं यह नहीं कहता कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद तुम्हारे पास कोई प्रश्न नहीं रहेगा। मैं केवल इतना कहता हूँ कि प्रश्न पूछने वाला बदल जाएगा। अब तुम प्रश्नों को अपने भय, इच्छाओं और अहंकार की धुंध से नहीं देखोगे।
सभी प्रश्नों का अंत किस एक प्रश्न में छिपा है?
यदि तुम सचमुच सभी प्रश्नों का अंत चाहते हो, तो प्रश्नों की संख्या कम मत करो। उस पहले प्रश्न को पूरी गंभीरता से पूछो, जिससे सभी प्रश्न जन्म लेते हैं- मैं कौन हूं? जब यह प्रश्न अपने अंतिम मौन में विलीन हो जाता है, तब न कोई विजेता बचता है, न कोई पराजित। केवल वही शांति शेष रहती है, जिसे न शब्द व्यक्त कर सकते हैं और न विचार पकड़ सकते हैं। उसी शांति में ज्ञात होता है कि खोज कभी बाहर थी ही नहीं; खोजने वाला ही वह था, जिसे खोजा जा रहा था।
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सूत्र: पहले स्वयं को देखें
मनुष्य के सभी प्रश्नों का मूल संसार नहीं, बल्कि स्वयं का अज्ञान है। जिस दिन वह ईमानदारी से अपने भीतर उतरकर यह पूछना शुरू करता है कि 'मैं कौन हूँ?', उसी दिन उसकी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा आरंभ होती है। स्वयं को जान लेने के बाद अनेक प्रश्न अपने-आप शांत हो जाते हैं, क्योंकि तब खोज बाहर नहीं, भीतर पूरी हो चुकी होती है।