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पानीपत का तीसरा युद्ध और भाऊनाथ की गद्दी: युद्धभूमि में हुआ दाह संस्कार, लेकिन सांघी की कहानी कुछ और कहती है

Mon, 27 Jul 2026 05:41 AM IST
Navin Singh Patel नवीन सिंह पटेल
Updated Mon, 27 Jul 2026 05:41 AM IST
सार

पानीपत की तीसरी लड़ाई के इतिहास में सदाशिव राव भाऊ की युद्धभूमि में मृत्यु और वहीं अंतिम संस्कार का उल्लेख मिलता है। हालांकि हरियाणा के रोहतक जिले के सांघी गांव के लोग दावा करते हैं कि भाऊ युद्ध में नहीं मरे थे, बल्कि घायल अवस्था में गांव पहुंचे, नाथ संप्रदाय की दीक्षा लेकर बाबा भाऊनाथ बने और यहीं समाधिस्थ हुए। 

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Third Battle of Panipat Throne Bhaunath Cremation took place battlefield yet story Sanghi tells different tale
सदाशिव राव भाऊ - फोटो : The Indian Portrait

विस्तार

इतिहास में दर्ज है कि पानीपत की तीसरी लड़ाई (14 जनवरी, 1761) में अफगानी हमलावर अहमद शाह अब्दाली के हाथों मराठा सेनापति और पेशवा बाजीराव प्रथम के चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ ने वीरगति पाई थी। युद्धभूमि में ही उनका दाह संस्कार हुआ था। लेकिन, हरियाणा के रोहतक जिले के गांव सांघी के लोग मानते हैं कि भाऊ युद्ध में नहीं मरे थे। उनका दावा है कि वे युद्ध के बाद उनके गांव आए, नाथ संप्रदाय की दीक्षा ली और बाबा भाऊनाथ महाराज के रूप में जीवन बिताया।

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क्या सांघी के लोगों का दावा इतिहास से अलग कहानी सुनाता है?
बुजुर्ग बताते हैं कि अब्दाली की तोपों के सामने हार तय जानकर घोड़े पर सवार घायल भाऊ ने पहले रूखी गांव में शरण मांगी थी, लेकिन उन्हें सांघी जाने की सलाह दी गई। इसकी वजह यह थी कि उस समय सांघी चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ था, जहां छिपना आसान था। ग्रामीणों के अनुसार, युद्ध के बाद भाऊ पानीपत से सांघी पहुंचे और यहीं बस गए।
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क्या भाऊ ने नाथ संप्रदाय की दीक्षा लेकर नया जीवन शुरू किया था?
सांघी स्थित डेरा लाधीवाला आश्रम के महंत सुंदरनाथ का कहना है कि इतिहास में भाऊ को मृत बताया गया, लेकिन वास्तविकता कुछ और थी। उनके अनुसार, भाऊ ने कुरुक्षेत्र के श्रवणधाम में गुरु गरीबनाथ से नाथ संप्रदाय की दीक्षा ली थी। इसके बाद वर्ष 1764 में उन्होंने सांघी के युवाओं की एक सेना तैयार की, जिसने रोहिला पठानों को पराजित किया। अंततः भाऊ यहीं समाधिस्थ हो गए। उनकी स्मृति में हर वर्ष माघ त्रयोदशी पर यहां मेला भी लगता है।
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क्या मराठा दस्तावेज़ भाऊ की मौत की अलग कहानी बताते हैं?
मराठी इतिहासकार काशीनाथ नारायण साने ने पेशवाओं के दस्तावेजों के आधार पर लिखा है कि युद्ध के दौरान महंगे आभूषण पहने घोड़े पर जा रहे एक मराठा सरदार से पठान सरदारों ने जेवर मांगे। इनकार करने पर हुई लड़ाई में वह मराठा सरदार मारा गया। उसका कटा हुआ सिर शुजा के शिविर में पहुंचाया गया, जिसे मराठा सैनिकों ने सदाशिव राव भाऊ का सिर बताया। उसके सिर का अंतिम संस्कार किया गया, जबकि धड़ का संस्कार पहले ही हो चुका था।

क्या युद्ध के अगले दिन भी भाऊ का शव नहीं मिला था?
'सेलेक्शंस फ्रॉम द पेशवा दफ्तर' में इतिहासकार एस. जी. सरदेसाई लिखते हैं कि युद्ध के अगले दिन शुजा के सैनिकों को भाऊ का पूरा शव नहीं मिला। बाद में मराठा सैनिकों ने अन्य पहचान-चिह्नों के आधार पर उनकी पहचान की। अहमद शाह अब्दाली के आदेश पर काशीराज और राजा अनूपगीर गोसावी ने उनका अंतिम संस्कार कराया। 24 फरवरी, 1761 को काशीराज ने नाना साहब को लिखे पत्र में भी इसका उल्लेख किया था।

क्या विदेशी इतिहासकार भी भाऊ की युद्ध में मृत्यु की पुष्टि करते हैं?
ब्रिटिश इतिहासकार जॉर्ज रॉलिंसन ने लिखा है कि पानीपत की तीसरी लड़ाई में अरबी घोड़े पर सवार सदाशिव राव भाऊ आखिरी दम तक लड़ते रहे और युद्धभूमि में शहीद हो गए। यह विवरण मुख्यधारा के इतिहास में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।

क्या नाना फड़नवीस की आत्मकथा इस रहस्य को और गहरा करती है?
मराठी साहित्यकार त्र्यंबक शंकर शेजवलकर ने अपनी पुस्तक पानिपत 1761 में भाऊ के साथी नाना फड़नवीस की आत्मकथा का हवाला देते हुए लिखा है, 'भाऊ अंत तक लड़ता रहा। फड़नवीस पानीपत की ओर चला गया। भाऊ का क्या हुआ, यथार्थ में कोई नहीं जानता।' यही कथन इस पूरे रहस्य को और गहरा कर देता है।


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क्या लोककथाएं आज भी भाऊ के जीवित बचने की कहानी सुनाती हैं?
घुमक्कड़ हिंदू और मुस्लिम जोगी आज भी सदाशिव राव भाऊ की वीरगाथाएं सुनाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन लोककथाओं में उनकी युद्ध में मृत्यु का उल्लेख नहीं मिलता। यही कारण है कि सांघी की यह लोकमान्यता आज भी लोगों के बीच चर्चा और जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।

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