जरा सोचिए: मात्र 0.03 फीसदी कोरोना मरीज का भार नहीं झेल पाया देश का स्वास्थ्य ढांचा
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देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने के साथ स्वास्थ्य सुविधाओं पर काफी भार पड़ा है। अस्पतालों में दाखिले के लिए बेड की मारामारी, जीवन रक्षक दवाओं और ऑक्सीजन की कमी से देश भर में लोग जूझ रहे हैं। देश में वेंटिलेटर की सुविधा तो सुविधासंपन्न लोगों तक ही सीमित रही। ऐसी स्थिति क्यों आई? क्या आपदा अचानक आन पड़ी? क्या कोरोना ने हमें संभलने का मौका नहीं दिया? हमारी क्या तैयारी थी? हम कोराना की दूसरी लहर से लड़ने में क्यों बुरी तरह विफल हो गए। इस सब कारणों पर नजर डालना जरूरी है।
आंकड़ो से जानिए सवालों के जवाब
देश की आबादी करीब 135 करोड़ है। वहीं देश की एक फीसदी आबादी होती है करीब एक करोड़ 35 लाख लोग। अब इसका भी दसवां हिस्सा यानी 0.01 आबादी करीब 1 लाख 35 हजार लोग होते हैं। देश में कोरोना की दूसरी लहर में अप्रैल के अंतिम दिन (30 अप्रैल) एक ही दिन में अधिकतम 4 लाख लोग प्रभावित हुए। ये देश की कुल आबादी का 0.03 प्रतिशत है। इतने मरीजों के भार से ही देश का स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह चरमरा गया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हमने अपनी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा किस आधार पर तैयार किया। कुल आबादी के कितने लोगों के लिए हमने अपने हेल्थ सिस्टम को तैयार किया।
ऐसा तब हुआ जब शहरी क्षेत्र की करीब 70 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्र की करीब 63 फीसदी आबादी का बोझ निजी क्षेत्र के हवाले है। स्वास्थ्य महकमे का इस बोझ तले दब जाना यही दिखाता है कि हमारी तैयारी बहुत कमजोर थी या थी ही नहीं। आखिर हमने कितने लोगों के लिए अपने स्वास्थ्य क्षेत्र के ढांचे को तैयार किया। यह जानना जरूरी है। बड़ी गाड़ियों और आलीशान बंगलों में रहने वाले चिकित्सा महकमे के अधिकारियों ने कभी उक्त चीजों पर गौर नहीं किया। अखिर उच्च पदों पर बैठे अधिकारी करते क्या हैं? इन हालात तक पहुंचने के दौरान जनता के लिए दम भरने वाले देश के जनप्रतिनिधि क्यों आंखें मूंदें रहे। कोरोना से देशभर में अप्रैल माह के अंत तक दो लाख से अधिक मौत हो चुकी हैं। आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
सुविधाएं तो सपना हो गई हैं?
सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और सुविधाओं पर नजर डालें तो यहां के हालात डराने वाले हैं। मरीजों को दाखिल करने के लिए बेड नहीं, अगर किसी को बेड मिल गया तो जीवन रक्षक दवाएं नहीं, डॉक्टर नहीं, अस्पताल में हैं, लेकिन ऑक्सीजन नहीं। और अगर जरूरत पर ऑक्सीजन मिल गई तो कब खत्म हो जाएगी इसका पता नहीं। इस जद्दोजहद के बाद अगर कहीं वेंटिलेटर की जरूरत पड़ गई तो वेंटिलेटर आम मरीज के लिए हैं ही नहीं। ऐसे में एक आम इंसान को कदम-कदम पर मिल रही है तो बस लाचारी और बेबसी।
कोरोना की देश में दस्तक वर्ष 2020 के मार्च से ही शुरू हो गई थी। तब इसे कोरोना की पहली लहर माना गया था। ठीक एक वर्ष बाद कोरोना की दूसरी लहर आई मार्च 2021 में। इस एक वर्ष में हमने कोई तैयारी नहीं की। कोरोना की पहली लहर के बाद देशभर में नेताओं ने सिर्फ भाषणबाजी की, हमने कोरोना को हरा दिया। देश के एक बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो यहां तक कहा कि कोरोना से कैसे लड़ा जाता है कोई हमसे सीखे।
इसके बाद देश में जब कोरोना की दूसरी लहर आई तो देश के अन्य हिस्सों की तरह इस राज्य का काफी बुरा हाल हुआ। देश इस दौरान बड़ी अर्थव्यवस्था का दम भर रहा था, चीन से नाराज दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत आने का न्योता दे रहा था। अगर हम कोरोना की पहली लहर से सबक लेते और अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने पर ध्यान देते तो हमारे पास पैसे की भी कोई कमी नहीं थी। लेकिन कोरोना की दूसरी लहर ने देश को दिन में तारे दिखा दिए, राम भरोसे स्वास्थ्य सुविधाओं की असलियत सामने आ गई।
पाकिस्तान सहित एशिया के छोट-छोटे देश भूटान आदि ने भारत को स्वास्थ्य के क्षेत्र में मदद का भरोसा दिया। नेपाल और बांग्लादेश सरीखे देशों ने भारतीयों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। अमेरिका जैसे देश ने अपने नागरिकों को भारत छोड़ने का संदेश जारी कर दिया। इतनी दुर्गति का जिम्मेदार आखिर कौन? देश को यह जानने का हक है। क्या इसके लिए चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव करवाने वाला आयोग जिम्मेदार है।
क्या हरिद्वार में जुटी लाखों लोगों की भीड़ या देश के उत्तरी भाग में होली के मौके पर खरीदारी करने को उमड़ी बेकाबू भीड़ उत्तरदायी है। वहीं उत्तर प्रदेश में कोरोना के पीक के दौरान भी पंचायत चुनाव बदस्तूर जारी रहे। इन सवालों के जवाब भविष्य में तलाशने होंगे। गिरना कोई बड़ी बात नहीं है, गिरकर संभल जाने का हुनर सीखने वाले ही सफलता के शिखर पर पहुंचते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।