फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकारः उम्मीद है सड़क हादसों में अब कमी आएगी
सुप्रीम कोर्ट ने एक कदम और आगे बढ़ कर आदेश दिया है कि सड़क पर वाहनों की आवाजाही के साथ-साथ लोगों के सुरक्षित फुटपाथ पर पैदल चलने को प्राथमिकता मिले। यह मौलिक अधिकार है और इसकी रक्षा के लिए नियामक निकाय बनाए जाएं। स्थानीय प्रशासन से परिवहन मंत्रालय तक को पक्षकार बनाया जाए।
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सड़क दुर्घटनाओं में साल-दर-साल मौत के बढ़ते आंकड़ों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने को मौलिक अधिकार का जो ताजा फैसला सुनाया है, उससे सड़क के हाशिये यानी फुटपाथ पर सुरक्षित पैदल चलने वालों के लिए एक बड़ी उम्मीद जगी है। आम धारणा यही है कि सड़क पर वाहनों को आवाजाही का पहला हक होता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर पैदल चलने को उससे ज्यादा प्राथमिकता वाला अधिकार माना है। वैसे तो देश में सड़क सुरक्षा को लेकर पहले से मोटर वाहन अधिनियम 1988 है, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने एक कदम और आगे बढ़ कर आदेश दिया है कि सड़क पर वाहनों की आवाजाही के साथ-साथ लोगों के सुरक्षित फुटपाथ पर पैदल चलने को प्राथमिकता मिले।
यह मौलिक अधिकार है और इसकी रक्षा के लिए नियामक निकाय बनाए जाएं। स्थानीय प्रशासन से परिवहन मंत्रालय तक को पक्षकार बनाया जाए। इस मामले में विधि आयोग को शामिल करने का आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई का वह मार्ग भी प्रशस्त किया है जिसमें मोटर वाहन अधिनियम से इतर फुटपाथ पर पैदल चलने वालों की राह सुरक्षित हो सके और उन्हें उनका हक मिले।
पहले से सड़क सुरक्षा कानून के बावजूद देश में हादसे बढ़े हैं। मौतों का आंकड़ा भी। सालाना जितनी मौतें होती हैं, उससे चार गुना ज्यादा लोग घायल (लाचार व अपाहिज) हो जाते हैं। जिस फुटपाथ पर चलने को सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 और 19 (1) डी का मौलिक अधिकार माना है, उस फुटपाथ पर कब्जा आम बात है। निकाय, स्थानीय प्रशासन, राज्य या केंद्र स्तर पर फुटपाथ तो दूर सड़क पर अतिक्रमण के अधिकांश मामलों की अनदेखी की जाती है। यातायात पुलिस अधिकांश अतिक्रमण में अवसर तलाशती है। कहीं लचीला रुख तो कहीं सख्त तेवर देखने को मिलते हैं। कानून का पालन उगाही का जरिया बन कर रह जाता है। यही कारण है कि सड़क से संसद होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक सड़क सुरक्षा से जुड़े मामले गूंजते रहे हैं लेकिन जमीनी हालात नहीं बदले। सड़क सुरक्षा पखवाड़ा मनाया जाता है लेकिन ये सारे प्रयास रस्मी होकर रह जाते हैं।
यदि नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर गौर करें तो अकेले 2024 में ही सड़क हादसों में 1.75 लाख लोगों ने जान गंवा दी। इनमें 25,769 मौतें पैदल चलने वाले राहगीरों की हुईं। हादसे के शिकार दोपहिया वाहन वालों की संख्या इससे ज्यादा है। सड़क सुरक्षा कानून के बावजूद जल्दीबाजी, अत्यधिक गति, लापरवाह ड्राइविंग, नशे में वाहन चलाना, वाहन चलाने के दौरान मोबाइल पर बातें करना, वाहनों के बीच रफ्तार और आगे निकलने की होड़, स्वास्थ्य उदासीनता, रोडरेज, पार्किंग जैसे विवादों में मौतें होती हैं।
सड़क हादसों को लेकर उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, झारखंड, मध्यप्रदेश, बंगाल, बिहार, ओडिशा ज्यादा बेपरवाह राज्य हैं। एनसीआरबी के सड़क हादसों में मौत के आंकड़ों का यदि साल-दर-साल अध्ययन कर औसत निकालें तो देश में अमूमन हर दिन 546 लोगों की जान सड़क हादसे में जाती है। हर घंटे 56 से अधिक हादसे होते हैं। हादसे में मौतों की एक चौथाई संख्या पैदल चलने वालों से जुड़ी होती है।
देश की राजधानी दिल्ली जहां लाल बत्ती, पैदल पार पथ, जेब्रा कॉसिंग, ऊपरगामी पथ मार्ग अन्य शहरों की तुलना में ज्यादा व्यवस्थित हैं और यातायात व्यवस्था का खौफ भी, तब भी यहां 2024 में केवल पैदल सड़क मार्ग पार करने या फुटपाथ वाले 147 लोगों की हादसे में मौत हो गई। हादसों के पीछे सड़क की गुणवत्ता भी चिंता का विषय है। अच्छे और बड़े मार्गों में गढ्डे मौत का कुआं साबित होते हैं। राजमार्गों पर ग्रामीण इलाकों को जोड़ने वाले कट और टोल नाकों पर क्षेत्रीय लोगों की सहूलियत की बेरतरतीब व्वस्था भी हादसों की वजह बनती है। सड़कों के मामले में चीन ज्यादा बेहतर है जहां हादसों का आंकड़ा काफी कम यानी महज 4.3 फीसदी हैं, जबकि भारत में करीब 11.89 और अमेरिका में 12.76 फीसदी है।
इस बार बजट सत्र के दौरान जब सड़क हादसों का मसला संसद में उठा, तब केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने चर्चा का जवाब देते हुए एक बड़ी पहल की घोषणा की। यूं तो सड़क दुर्घटनाओं में घायलों की मदद न करने वाले वाहन चालकों पर सजा और जुर्माने का प्रावधान पहले से है लेकिन कई मौतें तो समय से चिकित्सकीय मदद के अभाव में हो जाती हैं। कई बार तो घायलों के मददगारों को ही पुलिस व कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ता है, इसलिए
मानवीय आधार पर भी हादसों के दौरान कोई घायलों की मदद की जहमत नहीं उठाता था। अब केंद्र सरकार की ओर से राह वीर योजना शुरू की गई है। सरकार के एलान व प्रावधान के मुताबिक, सड़क हादसों में घायलों की मदद करने वाले या जान बचाने वाले शख्स को न केवल राह वीर घोषित कर सम्मानित किया जाएगा बल्कि 25 हजार रुपये का इनाम भी दिया जाएगा। हालांकि इस घोषणा के बाद अब तक कितने लोगों को राहवीर घोषित किया गया या इनाम दिया गया, यह आधिकारिक आंकड़ा नहीं है लेकिन इतना तय है कि मानवीय तौर पर जान बचाने की घटनाएं-किस्से सामने आने लगे हैं।
पैदल चलने के मौलिक अधिकार के बीच सलमान खान से जुड़े ब्रांदा बेकरी हिट एंड रन केस (28 सितंबर 2002) जिक्रयोग्य है, जिसमें सलमान बरी हो गए क्योंकि जिसकी मौत हुई थी, वह फुटपाथ पर सो रहा था। फुटपाथ पर सोने और चलने के अधिकार के फर्क के आधार पर सलमान को राहत मिली लेकिन दिल्ली में 10 जनवरी 1999 को जब संजीव नंदा ने बीएमडब्ल्यू से फुटपाथ पर 6 लोगों को रौंद दिया था तो ट्रॉयल कोर्ट से पहले राहत मिली लेकिन दोबारा अपील के दौरान नंदा को सजा हो गई। अब पैदल चलने के मौलिक अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जब हथौड़ा चलाया है, तो उम्मीद जगना स्वाभाविक है।
सर्वोच्च अदालत की ओर से निकाय से लेकर स्थानीय व केंद्र तक को पैदल चलने वालों के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए कटघरे में लाने के साथ-साथ जिम्मेदारी तय करने की दिशा में पहल हुई है जो सराहनीय है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है इस ऑर्डर की गूंज आगे सुनाई पड़ेगी। उम्मीद कर सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद जब नियामक बन जाएं तो भविष्य में फुटपाथ पर पैदल चलने वालों की राह निरापद होगी। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद फुटपाथ पर अतिक्रमण हट सकेंगे और नया रास्ता खुलेगा।
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