यादों में सुरेखा सीकरी: एक यादगार शाम, जब वह मेरे ऊपर मंडराईं और बोलीं- आपको पता है मेरा नाम ज़ुलेखा है..!

Jama habib ज़माँ हबीब
Updated Sat, 17 Jul 2021 02:20 PM IST

सार

मशहूर अदाकारा सुरेखा सीकरी के निधन के बाद उनको याद करने और शब्दांजलि प्रस्तुत करने का सिलसिला जारी है। इस संवेदनाओं से भरे रोचक ब्लॉग में मशहूर स्क्रिप्ट राइटर ज़माँ हबीब सुरेखा सीकरी से अपनी पहली मुलाक़ात का दिलचस्प किस्सा बयान करने के साथ ही उनके व्यक्तित्त्व के कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर करते हुए उन्हें खिराजे अक़ीदत पेश कर रहे हैं। 
उन्होंने अपनी बाहों से मेरी गर्दन के चारों तरफ घेरा बनाया और दबी सी ज़ुबान में बोलीं, ‘ज़मा हबीब...मतलब ज़माने के दोस्त।
उन्होंने अपनी बाहों से मेरी गर्दन के चारों तरफ घेरा बनाया और दबी सी ज़ुबान में बोलीं, ‘ज़मा हबीब...मतलब ज़माने के दोस्त। - फोटो : twitter
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विस्तार

ये बात सितंबर 2000 की है। चैनल नाइन (मेट्रो गोल्ड) शुरू हो रहा था। होटल रीजेंट (जिसे अब ताज लैंड्स एंड के नाम से जाना जाता है) में उन्होंने लॉन्च पार्टी रखी थी। दो धारावाहिकों के लेखकों के तौर पर मुझे भी न्यौता आया (जी हां, ये उन दिनों की बात है जब लेखकों को भी बुलौवा आता था)।

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वहां उन्होंने एक बड़ा सा स्क्रीन बनाया था जिस पर आने वाले धारावाहिकों के प्रोमो एक के बाद एक लगातार चल रहे थे। मैं एक कोने में बैठ गया और अपने दोनों शोज के प्रोमो देखने लगा, जब भी प्रोमो में मेरा नाम आता, मेरे चेहरे पर एक दमक अपने आप आ जाती (जी हां, ये उन दिनों की बात है जब लेखकों का नाम भी प्रोमो में रखा जाता था)।


और जब वे आईं तो..
पूरी तरह से एकाग्र और अपने ख्यालों में डूबा, मैं भूल ही गया कि मैं कहां हूं और फिर एक महिला आईं और मेरे बगल में बैठ गईं। बड़े ही दुलार और प्यार से उन्होंने पूछा, ‘क्या देख रहे हैं?’ मैं पलटा और ये देख कर विस्मित सा हो गया था कि जो मेरी बगल में आकर बैठी थीं, वह सुरेखा सीकरी थीं। एक बेहद चुस्त लाल जैकेट और पैंट पहने, वह मुझे देख मुस्कुरा रही थीं। मुझे तो अपनी आंखों पर यक़ीन ही नहीं हुआ।

उन्होंने सवाल दोहराया, ‘क्या हुआ? वहां क्या देख रहे हैं ऐसे? क्या ख़ास है?’ 

मैंने बताया उन्हें, ‘अपने शोज के प्रोमो देख रहूं। अपना नाम देख रहा हूं।’ उन्होंने आंखें मटकाई और पूछा, ‘अच्छा, तो आप राइटर हैं? बहुत ख़ूब। क्या नाम है आपका?’ ‘ज़मा...ज़मा हबीब’, मेरे मुंह से निकला। उनकी आंखों में चमक सी दिखी मुझे। उन्होंने अपनी बाहों से मेरी गर्दन के चारों तरफ घेरा बनाया और दबी सी ज़ुबान में बोलीं, ‘ज़मा हबीब...मतलब ज़माने के दोस्त...ज़माने के प्यारे...माशाअल्लाह! कहां के हैं?’ 

मैं थोड़ा सा असहज महसूस कर रहा था। मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि वे मेरे गले का घेरा अपनी बाहों से बना लेंगी। मैंने सकुचाते हुए जवाब दिया, ‘बेसिकली तो बिहार से हूं, पढ़ाई कढ़ाई कोलकाता में हुई, ग्रैजुएशन मैंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से किया है।’

अब तो वह मेरे ऊपर पूरी ही झुक गईं, ‘एएमयू से पढ़े हैं? वहां मेरी बहन हैं...मैं भी एएमयू से पढ़ी हूं...आपको पता है मेरा नाम ज़ुलेखा है।’ अब मैं वो क्या कहते हैं उसे, पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था और साथ ही बहुत ही बेचैनी भी महसूस कर रहा था। मुझे लगा कि उन्होंने चढ़ा रखी है। और, इसके पहले कि मैं होश संभाल पाता, वह बोलीं, ‘चलिए डांस करते हैं।’ मैं तो हिल गया। उनकी तरफ हैरानी भरी नज़रों से देखने लगा। सुरेखा जी मुस्कुराईं और फिर बोलीं, ‘चलिए भाई...राइटर्स को भी डांस करना चाहिए।’ 

और फिर वे मुझे अपने साथ ले गईं 
एक तरह से वह मुझे घसीटते हुए डांस फ्लोर पर ले गईं और मुझे अपने साथ नचाया भी। मैं ठीक से सोच नहीं पा रहा था। खुद पर शर्म सी आ रही थी तो जैसे ही मौका मिला मैं डांस फ्लोर से सरक गया। दूर जाकर एक कोने में बैठा ही था और कोशिश कर रहा था कि अभी अभी जो मेरे साथ हुआ है, उसको समझ सकूं। सांसें अपनी नॉर्मल स्पीड पर आई ही थीं, मैंने देखा कि वह खड़ी हैं ठीक मेरे सामने। यूं लगा जैसे हलक में कुछ अटक गया है।

वह मुस्कुराईं और बोलीं, ‘क्या तुम्हें कुछ अटपटा लग रहा है। ओके, चलो बातें करते हैं। अलीगढ़ बतियाते हैं।’ मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था और हम बातें करते रहे। और, तब मुझे उनमें अपनेपन का पहला एहसास हुआ। जैसे-जैसे वह बातें करती गईं, उनके कला के बारे में ज्ञान को जानकर मेरी आंखें फैलती चली गईं। उन्होंने अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताया। घर, पढ़ाई लिखाई, वगैरह वगैरह..!
 

धारावाहिक ‘बालिका वधू’ जिसने वाक़ई उनके कला कौशल को सही तरीके से प्रदर्शित किया।
धारावाहिक ‘बालिका वधू’ जिसने वाक़ई उनके कला कौशल को सही तरीके से प्रदर्शित किया। - फोटो : Social Media

फिर तो जैसे कई गिरहें खुलती चलीं गईं 
वह धीरे-धीरे खुल रही थीं। मेरे सामने। एक बिल्कुल अनजान शख़्स के सामने। ऊपरवाला ही जाने क्यों? लेकिन तब तक मैं भी उनके साथ सहज महसूस करने लगा था। मुझे भी उनका साथ अच्छा लगने लगा था। मुझे समझ आया कि ये एएमयू कनेक्ट जैसा कुछ है। फिर उन्होंने बार काउंटर पर खड़े अपने पति हेमंत रेगे को आवाज़ लगाई और मेरा उनसे परिचय कराया। दोनों ने मुझे उस पार्टी का हिस्सा बना लिया जिसके लिए कुछ देर पहले ही मैं खुद को अनफिट पा रहा था।

कट टू, दो साल बाद, मैं ‘दि सुरेखा सीकरी’ के साथ काम  कर रहा था। मेरे दोस्त रवि ओझा और संजय सोलोमन ईटीवी हिंदी के लिए एक शो बना रहे थे जिसका नाम था ‘फिर भी’। मैं सिर्फ ये शो लिख ही नहीं रहा था बल्कि इसका अहम हिस्सा भी बन चुका था। शो में शानदार कास्ट थी जिसमें शामिल थे, सुरेखा सीकरी, सादिया सिद्दीक़ी, मेघना मलिक, ज्योति डोगरा, नेहा शरद, दिनेश ठाकुर, मानव कौल, सुरुचि औलख और जैमिनी पाठक वगैरह वगैरह...।

मैं सुरेखा सीकरी को अपनी लिखी लाइनें बोलते देखकर अभिभूत! मुझे अब भी याद है एक सीन था जिसमें वह अपने पोते को समझाती हैं कि ज़िंदगी आगे बढ़ते रहने का नाम है। मैंने वह सीन फीनिक्स की उपमा के हिसाब से लिखा था और उनको वह सीन इतना पसंद आया कि उन्होंने आवाज़ लगाई, ‘ज़मा, इधर आइए।’ मैं उनके पास गया और उन्होंने मुझे अपनी बाहों में ये कहते हुए भर लिया, ‘जीते रहिए। अल्लाह करे ज़ोर ए क़लम और ज़्यादा।’ वही शख्सियत जिसने कभी मुझे अपने साथ नचाया था, मुझे एक मां की तरह दुआएं दे रही थीं।

जाने कितने दिन बीत गए वैचारिक चर्चाओं को लेकर और शामें भी अनगिनत, बातें होंती, मस्ती चलती और साथ में मयखाने के दौर भी चलते। वह मुझसे कविताएं सुनती थीं। और, फ़िर खुद भी फैज़ की शायरी पूरे अंदाज़ से सुनातीं। इन दिनों की पार्टी इवनिंग्स की जैसी नहीं थी तब की ये शामें। वह समय ही अलग था। हम सिनेमा, कला, साहित्य, कविता सब पर बातें करते। उनके पति हेमंत रेगे हमारी बातचीत सुनते और हमेशा मंद मंद मुस्कुराते दिखते। वह हमारे धारावाहिक का प्रोडक्शन संभालते थे।

मुझे हमेशा लगता रहा कि सुरेखा सीकरी को वह नहीं मिला जिसकी वह हक़दार थीं। उनको बेहतर रोल मिलने चाहिए थे। फ़िल्म ‘सरफरोश’ में उनका सिर्फ़ एक सीन था, सिर्फ़ एक लाइन। लेकिन उस एक लाइन का भी जो असर उन्होंने पैदा किया और जिस भाव के साथ वह लाइन उन्होंने बोली, उसे बस महसूस किया जा सकता है। ‘मम्मो’ और ‘हरी भरी’ में उनकी प्रतिभा निखरकर सामने आई। लेकिन, एक बार फ़िर मुझे लगा था कि उन्हें और अच्छा काम मिलना चाहिए।

और, फिर आया धारावाहिक ‘बालिका वधू’ जिसने वाक़ई उनके कला कौशल को सही तरीके से प्रदर्शित किया। वह धमाका थीं। और, कौन भूल सकता है फ़िल्म ‘बधाई हो’ में उनका अभिनय? यह अद्वितीय रहा। कोई दूसरा उनकी जगह नहीं ले सकता। कोई नहीं, मतलब कोई नहीं!
 

अलविदा, सुरेखा जी! आप सिर्फ मेरी पसंदीदा कलाकारों में से ही एक नहीं हैं बल्कि आपने मेरे दिल में एक ख़ास जगह बनाई है ज़िंदगी के उन लम्हों के चलते जिनकी यादें मैं हमेशा अपने सीने में छुपाए रखूंगा। बहुत शुक्रिया। प्यार और सम्मान के साथ!

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