Ram Mandir 2024: विश्व की आस्था का केंद्र हैं राम, आखिर क्यों अलग हैं 'तुलसी के राम'
तुलसीदास लिखते हैं कि 'समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।' राम के नाम और राम के रूप में छोटे-बड़े का कोई प्रश्न नहीं है। गांधी जी राम के दोनों रूपों को स्वीकारते हैं।
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तुलसीदास भक्त कवि थे और रामकथा को देखने और उसे बुनने की उनकी दृष्टि भी एक भक्त की थी। तुलसी के राम पर जब भी बात की जाती है तो हमें उनका प्रवेश भी स्मरण रखना चाहिए। क्योंकि कोई भी कृति अपने समय काल परिवेश से विलग नहीं होती है उसका आरम्भ ही अपने प्रवेश के सामाजिक, राजनैतिक घटनाक्रम के कारण होता है। ऐसे में तुलसी के राम को कैसे उनके मध्यकालीन सामाजिक बोध और लोकाचार से अलग किया जा सकता है?
हमारे लोक में कथाओं का अथाह संसार विराजमान है। मगर उसमें से कुछ ही कथाएं वैश्विक स्वरूप धारण कर पाती है। उन्हीं में से एक तुलसीदास के राम है। जो भारतीय संस्कृति और लोक में इतनी गहराई से रच बस गए हैं कि उन्हें विलग नहीं किया जा सकता है। तुलसीदास के राम मात्र एक चरित्र नहीं है, वह सृष्टि के व्यवस्थापक है। सगुण और दोनों ही रूपों में विराजमान है। वह ब्रह्म भी है और मानव भी।
वह संपूर्ण कलाओं में दक्ष, राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, समाजसुधारक, नारी सम्मान के रक्षक, पिता के वचनों के रक्षक है, निर्भीक, संरक्षक, खल संहारक है, प्रज्ञा हितैषी है, नीति-निपुण शासक है। तुलसी के राम लोकरंजक और रक्षक है। वह सामान्य लोक-जीवन की प्रेरणा का स्रोत है। ‘सम भाव सदा वैभव विपदा तथा नहीं राग न लोभ मान सदा’ राम ‘योगी, संयमी और निरभिमानी पुरुष है। इस तरह का चरित्र लोक में अन्य कहीं नहीं मिलता है। उसी प्रकार उनके ‘राम राज्य’ की स्थापना भी उनके जीवन दर्शन को अपनाकर ही संभव है।
राम संपूर्ण विश्व की आस्था का केंद्र है। रमन्ते योगिन: यस्मिन स: राम:-वस्तुत:जो रमता है वही राम है।” वेद व्यास और वाल्मीकि से लेकर आधुनिक युग तक में रामकथा के विविध रूप उसके प्रति आस्था का स्वरूप देखा जा सकता है। मध्यकाल में कबीर और तुलसी के राम तो आधुनिक काल में गाँधी के राम ‘रामकथा’ के व्यापक परिदृश्य में राम की महत्ता को प्रदर्शित करता है। कबीर लिखते हैं कि ‘दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना। राम नाम का मरम न जाना।’
तुलसीदास लिखते हैं कि 'समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।' राम के नाम और राम के रूप में छोटे-बड़े का कोई प्रश्न नहीं है। गांधी जी राम के दोनों रूपों को स्वीकारते हैं। डॉ. कमल किशोर गोयका लिखते हैं कि 14 अप्रैल 1933 को लिखते हैं कि, “मेरा राम दशरथनंदन है सही, लेकिन वह उनसे भी बहुत अधिक है। वही सच्चिदानंद पूर्ण ब्रह्म है”।तुलसीदास के राम लोक में व्याप्त है। उनकी यही लोक ग्राह्यता उन्हें व उनके काव्य को लोक में विशिष्ट बनाती है।
विश्व में राम कथा का व्यापक स्वरूप मिलता है। भारत के परिदृश्य में अनेक भाषाओं में यह रामकथा कहीं गई है। लेकिन लोक में तुलसी के राम ही सर्वाधिक स्मरण किये जाते हैं क्योंकि यह ‘राम/ उत्तर से दक्षिण तक आमजन का प्रतिनिधित्व करते हैं उनके लिए एक आदर्श मनुष्य की परिकल्पना गढ़ते हैं। ऐसा मनुष्य जो परिवार व समाज व राज्य के प्रति जिम्मेदारियों से भागता नहीं है जिसके लिए पारिवारिक संबंधों की महत्ता है और उनके निर्वहन के लिए वह सत्ता तक का परित्याग कर सकता है। जो कि मध्यकालीन अराजक परिवेश में एक तरह की तुलसीदास की परिकल्पना ही थी। जिसे वह अपने आराध्य राम के चरित्र के माध्यम से स्थापित करना चाहते थे।
यही कारण भी है कि लोक में तुलसीदास के राम सदैव याद किए जाते हैं। संबंधों की परिपाटी में उनकी तुलना ‘राम’ से की जाती है। तुलसी के राम मानव भी है और ब्रहम स्वरूप भी। वह लोक कल्याण के लिए अवतार भी धारण करते हैं और लोक का कल्याण करते हैं। वह वेद शास्त्र, पुराण, धर्म, संस्कृति, जीवन मूल्यों और आदर्शों का समुच्य है। क्योंकि वह ब्रहम स्वरूप है “मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी” और मानव भी “ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सो दशरथ अजिर बिहारी”।
तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस केवल रामायण की रामकथा का एक परिशिप्त मात्र नहीं है, बल्कि यह लोक की संवेदनाओं से पाठक को जोड़ती है, इसकी अवधी भाषा व सरल दोहा चौपाई में लिखे गए छंद इस महाकाव्य को अन्य रामकथा से संबंधित महाकाव्यों से बेहतर तरीके से लोक से जोड़ता है। क्योंकि उनकी भक्ति का संबंध मानवता व करुणा से है। यही कारण है कि उनके संपूर्ण काव्य में मानवीय मूल्यों, लोकाचार, करुणा प्रेम का अद्भुत समागम देखने को मिलता है।’
भक्तिकाव्य की सामाजिक सांस्कृतिक चेतना नामक पुस्तक में लेखक प्रेमशंकर ‘राम मध्यकाल के जननायक शीर्षक में लिखते हैं कि-मेरा विचार है कि तुलसी भक्ति के माध्यम से मध्यकाल के लिए जिस जीवन दर्शन की तलाश कर रहे थे. उसके व्यवहारिक पक्ष के लिए उन्होंने राम की सामाजिकता को बार-बार उजागर करने की चेष्ठा की और अपने चरित्र नायक को अधिक से अधिक लोकोन्मुख किया। उनमें जो अलौकिकता है वह भी मध्यकालीन परिवेश की उपज है, पर राम की सामाजिकता को समान्य जन स्वीकारते हैं, उन्हें अपना जननायक मानते हैं।’
तुलसीदास के राम आदिकाल से लेकर वर्तमान समय तक लोक में सर्वाधिक प्रासंगिक है। समाज में मानवीय मूल्यों का ह्रास,अराजकता,नैतिक मूल्यों का विघटन, पारिवारिक संबंधों का मूल्य केंद्रित होना, आपसी अविश्वास, हिंसा, क्रोध, घृणा जैसी कितनी ही घटनाएँ हमारे समाज में घटित होती है। ऐसे परिवेश में एक ऐसा आदर्श चरित्र लोक का प्रतिनिधितत्व करता है जो लोक में लोकाचार, मानवीय मूल्य, नैतिक मूल्य, सांस्कृतिक मूल्यों की न केवल प्रतिष्ठा करता है बल्कि राजनैतिक संबंधों, राजा-प्रजा के संबंधों को एक नया रूप प्रदान करता है जो रामराज्य की नीव बनता है। जिसमें खुशहाल लोकतंत्र की स्थापना का जीवंत रूप देखा जा सकता है।
वह समाज में सत्य, संयम, सद्व्यवहार, संकल्प, शालीनता, विनम्रता, नैतिकता, प्रेम, सहचर्य को स्थापित करता है। ‘मूल्य’ मानव जीवन का आधार है। इसके बिना जीवन का निर्माण संभव नहीं है। मूल्य ही धर्म का संरक्षण करते हैं। ‘धर्म जो मनुष्य को मनुष्य से प्रेम करना सिखाए। धर्म के पालन अर्थात मूल्यों के ग्रहण करने से ही मानव के सभी तरह के दुख, विसंगतियाँ, शोक, क्रोध, हिंसा घृणा, लोभ, काम और अज्ञानता की प्रवृति का नाश हो जाता है।
‘धरम ते बिरति जोग ते ज्ञाना, ज्ञान मोच्छप्रद वेद बखाना(मानस -3-15/1)’ अर्थात धर्म का पालन करने वाले लाखों में कोई एक होता है उसी प्रकार मूल्यों को जीवन का आधार बनाने वाला भी कोई एक होता है। राम उन लाखों मानवों में से एक हैं। जिन्होंने धर्म का सम्यक पालन किया। जिनका सारा जीवन ही धर्ममय है। मूल्य जिनके जीवन का आभूषण है-नर सहस्त्र में सुनहु पुरारी, कोई एक होई धर्म व्रत धारी(मानस-7-53/1) मानव मन के आदर्श, मर्यादा, नियम, संयम और मूल्य रामचरितमानस और राम की विशेषताएं हैं।
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